समय में परिवर्तन के साथ विक्रमादित्य #विकी हो गया था और बेताल #बेट्स (Baits)। कई प्रलोभनों से राजा विक्रमादित्य को लुभाने-फंसाने की कोशिश करते जीव के लिए फंसाने का चारा अर्थात #बेट्स नाम उचित था। हर सवाल का जवाब देते राजा विक्रमादित्य के लिए #विकी भी ठीक ही था। अब राजा मुकुट नहीं लगाते थे, वो कवच इत्यादि भी धारण नहीं करते थे, शस्त्र भी बदल गए थे। बेताल के लटकने के लिए अब सघन वन भी नहीं बचा था वो मेट्रो की सुरंग में किसी अर्ध-निर्मित सुरंग में छुपा होता था।

 

बेताल को ढूँढने निकले विक्रम मेट्रो से उतारकर भीड़ से निकलकर किनारे आ गए। अपने वोर्न लेदर के मैसेंजर बैग से उन्होंने टैब निकाला और भीड़ से किनारे आकर जी.पी.एस. सिस्टम ऑन करने की कोशिश की। कई सस्ते टैब मार्केट में आ जाने के बाद से लौंडे शो ऑफ के लिए उनका ही इस्तेमाल करते थे। पास खड़ी नवयौवनाओं को जब ओरिजनल आई पैड वाला दिखा तो पहले उन्होंने उसे ऊपर से नीचे तक नाप कर देखा, फिर उसकी ओर स्माइल फेंकने की कोशिश की।

 

जी.पी.एस. के सेट लोकेशन की मदद से अब तक #विकी ने #बेट्स की पोजिशनिंग भांप ली थी। वो मुस्कान फेंके जाने पर ध्यान दिए बिना ही लोकेशन की तरफ बढ़ गए, नवयौवनाओं के बीच से कहीं ‘एट्टीट्यूड’ शब्द सुनाई दिया। टनल में एक बीम पर लटके #बेट्स को जैसे ही खींचकर #विकी ने पीठ पर बाँधा, वैसे ही हमेशा की तरह #बेट्स बोला, राजन रास्ता लम्बा है और तुम्हारे ज्ञान से मैं परिचित हूँ! इसलिए सफ़र काटने के लिए मैं तुम्हें कथेतर सुनाता हूँ, सुनो! राजा जवाब देने पर भाग जाने की बेताल की आदत से परिचित थे, इसलिए वो चुप रहे और ‘मौन स्वीकृति लक्षणम्’ का नियम लगाकर बेताल ने अपना कथेतर शुरू किया।

 

ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के शोषणकाल में भारत का अंतिम स्वतंत्रता संग्राम हुआ और सत्ता गोरे साहबों से भूरे साहबों को हस्तांतरित की गयी। जो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के काल में कभी शासक और शासित के बीच की दिवार थी उसपर ‘समाजवाद’ नाम का नया रंग-रोगन करके, नयी बोतल में पुरानी शराब परोस दी गयी। अगर तुम्हें ज्ञात हो राजन, तो जर्मन नाज़ी पार्टी के पूरे नाम में यही ‘समाजवादी’ शब्द मौजूद था। प्राचीन काल से अबतक, जितने भी विध्वंसकारी गतिविधियाँ हुई हैं, वो सब ऐसे ही लुभावने शब्दों की आड़ में भले से लगने वाले लोगों ने की हैं, #बेट्स ने याद दिलाया।

 

ज्यादा भलमनसाहत कई बार धूर्तता का आवरण होती है, शायद इसी लिए ‘अति मैत्री चौरस्य लक्षणम्’ भी कहा जाता है। जो भी हो, धीरे धीरे तथाकथित रूप से स्वतंत्र भारत में अफसरशाही का पर्याय लालफीताशाही होने लगा। जो इस जमात से बाहर थे उन्हें शक्ति का ये स्वरुप जैसे ही सुलभ हुआ तो पहले तो दक्षिण भारतीय लोगों ने इसमें पैठ बनाई। फिर धीरे धीरे इसमें उत्तर भारतीय, ख़ास तौर पर हिंदी पट्टी के लोग भी घुसने लगे। शुरू में इनकी प्रवेश परीक्षा केवल अंग्रेजी में होती थी इसलिए हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओँ वालों को इसमें जगह नहीं मिली, फिर कई वर्ष बाद जब ये परीक्षा हिंदी में भी होने लगी तो हिंदी पट्टी वालों को भी स्थान मिला, #बेट्स बोलता गया।

 

सत्ता और शक्ति का एक हाथ से दुसरे हाथ में जाना असहज तो करता ही है। इस वजह से हाल में ही जब उर्दू और मैथिलि जैसे विषयों के छात्र प्रशासनिक सेवाओं में जाने लगे तो इसकी कसमसाहट अख़बारों में भी दिखने लगी। #बेट्स का कथेतर भी कथाओं जैसा लम्बा था! ऐसा नहीं था राजन कि प्रशासनिक सुधारों की कभी बात नहीं हुई। इसके लिए एक कमीशन तो 1966 में ही बिठाया गया था, मगर रोज़ बदलती दुनियां में भी दूसरा कमीशन 2005 में बना। बीच-बीच में छोटे-मोटे सुधार होते रहे, आयोग और सिफारिशें ऊपर नीचे दौड़ती रहीं, #बेट्स बोलता जाता था।

 

काफी कम उम्र में प्रशासनिक सेवा में भर्ती हुए लोग एक तय प्रक्रिया के तहत ही पदोन्नति पाते थे। अच्छा काम करने वालों को ज्यादा, कम करने वालों को कम मिले, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। भारत में करीब साढ़े छह सौ जिलों में सैकड़ों डी.एम., डी.सी., डी.डी.सी. आते जाते रहे और एक भी आज विकसित नहीं कहा जा सकता। हाल में ही सरकार ने एक अनोखा फैसला लिया। प्रशासनिक सेवाओं में बाहर से यानि बिना परीक्षा और बरसों के नौकरी के अनुभव की बजाय अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वालों को अलग से प्रशासनिक सेवा में भर्ती करने का इंतजाम किया।

 

सवाल ये है कि क्या ये फैसला सही होगा? व्यवस्था में रत्ती भर भी परिवर्तन न आने देने को तो उस व्यवस्था में काम करने वाले सभी उत्सुक होते ही हैं। न्यायिक सुधारों के नाम पर न्यायाधीशों, वकीलों को ऐतराज होता है। शिक्षा में सुधार इस देश में भगवाकरण कहकर ख़ारिज किया जाता है, शिक्षक, शिक्षा विभाग के अधिकारीयों की हड़ताल होती है। अस्पताल में डॉक्टर भी सेवा सम्बन्धी कानूनों में बदलाव पर हड़ताल करते हैं। फैक्ट्री और बाँध बनाने के विरोध में किसान, तो कोई फैक्ट्री नहीं बनी और उस से रोजगार नहीं, नौकरियों का सृजन नहीं हुआ तो नौकरी की मांग को लेकर तथाकथित छात्र सड़कों पर आते हैं।

 

ऐसे में प्रशासनिक सुधारों का खामियाजा क्या मौजूदा सरकार को भुगतना पड़ेगा? भारतीय लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी किसी सड़क-स्कूल बनवाने, तालाब खुदवाने में क्या होती? यहाँ तो हिन्दुओं के अपने मंदिरों का अधिकार हिन्दुओं के पास नहीं प्रशासन के हाथ में होता है! ऐसे सुधारों से जो प्रशासनिक शक्ति बाहर के लोगों के हाथ में जायेगी उसपर प्रशासनिक लॉबी की कैसी प्रतिक्रिया होगी? राजन बताओ जनता को इस फैसले को अपने हित का मानना चाहिए, या इसपर अपना सर धुनना चाहिए? ध्यान रहे राजन जो ज्ञात होने पर भी तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो फ़ौरन फटकर, तुम्हारे सर के सौ टुकड़े हो जायेंगे!

 

#विकी अबतक अधबनी सुरंग से निकलकर वापस मेट्रो स्टेशन पर आ गया था। उसने मुश्किल सवाल का जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर पहले स्माइल फेंकने वाली नवयौवना की सहेलियां अब तक जा चुकी थीं और आई पैड में फिर से नक्शा या शायद सोशल मीडिया पर कुछ देखता #विकी उसके पास आ खड़ा हुआ। युवती ने कनखियों से दोबारा विकी की तरफ देखा तो विक्रम मुस्कुराया। ‘हाय, विक्रमादित्य!’, उसने परिचय देकर बात शुरू करने की कोशिश की। सवाल का जवाब देने के बदले विक्रमादित्य को कहीं और व्यस्त देखकर #बेट्स ने सर के बाल नोच लेने की सोची।

 

विक्रमादित्य उर्फ़ #विकी या #विक्स की हरकत सही भी थी। उसने बिना बोले बता दिया था कि ‘एट्टीट्यूड’ जरा कम रहना चाहिए।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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