वेलु नचियार रामनद राज्य की राजधानी रामनाथपुरम से शासन करने वाले राजा चेल्लामुथु सेथुपरी और रानी सकंधीमुथल की इकलौती बेटी थी। वलारी और सिलंबम जैसी युद्ध कलाओं के अलावा वो अंग्रेजी फ्रेंच, उर्दू जैसी कई भाषाएँ भी जानती थी। उनकी शादी शिवगंगे के राजा से हुई जिस से उन्हें एक बेटी थी। आजादी के लिए इसाई हमलावरों के खिलाफ लड़ने वाली पहली रानी, दक्षिण भारत की वेलु नचियार थी। वो 1750-1800 के दौर की थीं, यानि भारत के पहले बड़े स्वतंत्रता संग्राम से करीब सौ साल पहले लड़ रही थीं।

अर्कोट के नवाब के साथ मिलकर इसाई हमलावरों ने उनके पति को मार डाला तो उन्हें युद्ध में शामिल होना पड़ा। अपनी बेटी के साठ वो कोपल्ला नायक्कर के संरक्षण में डिंडीगुल भाग गई और आठ साल वहीँ से संघर्ष किया। इसी दौरान उन्होंने गोपाल नायक्कर और हैदर अली से भी संधि की और 1780 में उनके आक्रमण कामयाब होने लगे। ये हमले महत्वपूर्ण क्यों हैं ? इसलिए क्योंकि इन आक्रमणों में पहले आधुनिक काल के युद्धों में पहले हिन्दू आत्मघाती हमले का जिक्र यहीं मिलता है। फिरंगियों से अपना राज्य वापस लेने के लिए रानी वेलु नचियार ने सबसे पहले आत्मघाती हमले और महिलाओं की सैन्य टुकड़ियों का इस्तेमाल किया था।

अपनी गोद ली हुई बेटी उदैयाल के नाम पर ही उनकी स्त्री सैन्य टुकड़ी का नाम उदैयाल था। उन्होंने ढूंढ निकाला कि फिरंगियों ने अपना गोला बारूद किले में कहाँ इकठ्ठा कर रखा है। रानी की बेटी, उदैयाल ने शरीर पर तेल डाला और गोला बारूद के गोदाम में खुद को आग लगा कर घुस गई। बारूद का भयावह विस्फोट और तोपों के नाकाम होते ही रानी की जीत पक्की हो गई थी। रानी वेलु नचियार इसलिए भी महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि तमिल लोककथाओं और लोकगीतों की ये नायिका भारत की वो इकलौती रानी थी जिसने फिरंगी भेड़ियों के जबड़े से अपना राज्य वापस छीन लिया था। उनके अलावा किसी ने अपना राज्य फिरंगियों से वापस जीतने में कामयाबी नहीं पाई थी।

भारत सरकार द्वारा जारी रानी वेलु नचीनयार का डाक टिकट

1780 में ही मरुदु बंधुओं को उनके इलाके के काम-काज सम्बन्धी अधिकार उन्होंने दिए थे। बाद में उनकी बेटी वेल्लाची ने 1790 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में शासन संभाला। रानी वेलु नचियार की मृत्यु 25 दिसम्बर, 1796 को हुई थी।

रानी वेलु नचियार और उनकी बेटी उदैयाल की कहानी इसलिए याद आई क्योंकि भारतीय हिन्दू बार बार आत्मघाती फिदायीनों का हमला झेलते तो हैं, लेकिन खुद उसका इस्तेमाल करना, या उसे पहचानना भूल जाते हैं। वो भूल जाते हैं कि जो खुद के पेट पर बम बांध कर लोगों को मारने पर तुला हो, उसके मानवाधिकारों की बात करना मतलब उसके दर्जनों शिकारों के मानवाधिकारों से इनकार करना है। मानवाधिकार हैं भी तो पहले किसके हैं ? शोषित-पीड़ित आम नागरिक के जो कानूनों का पालन करता देश का संविधान मान रहा है या उसके जो कानूनों को ताक पर रखकर कत्ले-आम पर अमादा है ? अपराधों पर जेल जाता तो भी वोट देने जैस नागरिक अधिकार नहीं रहते, ऐसे व्यक्ति के मानवाधिकारों की जिम्मेदारी राज्य पर कैसे है ?

फिदायीन हमलावर को पहचानना इसलिए भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि वो आतंक फैलाने के लिए आम लोगों की निहत्थी भीड़ पर ही हमला करेगा। वो अपने आकाओं को बचाने के लिए ऐसे हमले कर रहा है। उसे अपनी जिहादी सोच फैलाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों को डराना है। वो विरोध के हर स्वर को कुचल कर खामोश कर देना चाहता है। वो मीडिया मुगलों जैसा है जो आज अंकित सक्सेना की हत्या पर दोमुंहा रवैया दिखा कर आपका निशाना बदलना चाहते हैं। मुद्दा था कि ऑटो रिक्शा वाले रविन्द्र, डॉ. नारंग, चन्दन गुप्ता सबकी हत्या में जो सच दिख रहा है, उसे देखने से इनकार क्यों किया जा रहा है ? आई.एस.आई.एस. जैसा सर कलम करने की घटनाओं में इस्लामिक जिहाद के सच की तरफ आँखे खुलती क्यों नहीं हैं ?

आप सोचते हैं कि तैरना नहीं आता तो क्या ? आपको कौन सा समंदर में जाकर गोता लगाना है ! लेकिन यहाँ समंदर तो घर में घुस आया है मियां ! सवाल ये भी है कि मियां अब तैरना सीखेंगे या सेकुलरिज्म की पट्टी आँख पर बांधे रखनी है !

दिल्ली के अंकित सक्सेना की मौत और पेड मीडिया के बर्ताव पर अजित भारती का लेख

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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