जैसे ही शकुनी का नाम लिया जाता है वैसे ही पुराने वाले महाभारत का गूफी पेंटल याद आ जाता है। एक आँख जरा सिकुड़ी हुई, पासे रगड़ता, धूर्तता की नित नयी योजनायें बनता शकुनी ! क्या हमेशा से ऐसा ही रहा होगा शकुनी ? जवानी के दिनों से ही ऐसे कुकृत्यों की योजना बनता हुआ ? लोगों को बहकाता भड़काता हुआ ? नहीं शकुनी हमेशा से ऐसा नहीं था। किसी ज़माने में वो बड़ा ही भला सा युवक हुआ करता था। अपनी बहनों का प्रिय पात्र भी था। जब भीष्म अंधे धृतराष्ट्र के साथ उसके विवाह का प्रस्ताव लेकर आये तो गान्धार कोई शक्तिशाली देश नहीं था। भीष्म जहाँ अपने समय के सबसे धुरंधर योद्धा थे वहां गान्धार का कोई भी योद्धा उनके आस पास का भी सामर्थ्य नहीं रखता था।

मजबूरन गान्धारी कि शादी तो धृतराष्ट्र से करवानी पड़ी गान्धार के राजा को लेकिन शकुनी से ये बात हजम नहीं हुई। वो शक्ति का प्रयोग करने में असमर्थ था, शायद उम्र में भी कोई 15–16 का ही रहा होगा। इसलिए वो गान्धारी के साथ ही हस्तिनापुर चला आया। बरसों वो कौरवों को भड़काता रहा, उनके कानों में विष घोलता रहा। अगर कौरवों कि कोई भी दुष्टतापूर्ण हरकत देखेंगे तो दरअसल वो उनकी खुद की नहीं थी। हरेक शकुनी की ही सिखाई हुई थी। शकुनी ने कौरवों के विनाश की कहानी बरसों पहले गान्धार से आते समय ही लिख डाली थी।

Hard Power यानि शक्ति, सेना, हथियारों का इस्तेमाल जब नहीं किया जा सकता है तो ऐसे ही Soft Power यानि की प्रचार तंत्र, झूठ, छल का इस्तेमाल करते हैं। आने वाली पीढ़ी को, बच्चों को, जो की थोड़े कम समझदार होते हैं उन्हें भड़काया जाता है। अब जैसे बौद्ध धर्म का उदाहरण देख लीजिये। ऐसा सिखाया जाता है जैसे की हिन्दुओं में जात–पात नाम की बहुत बुरी सी एक चीज़ होती है। इस से मुक्ति पाने का तरीका बौद्ध धम्म है ! लेकिन थोड़ी सी जांच पर ही आपको सच्चाई दिख जाती है।

आज की तारीख में श्री लंका में गोयिगामा सबसे शक्तिशाली ऊँची जाति होती है। जैसे एशिया के कई मुल्कों में हॉनर किल्लिंग होती है वैसे ही किसी ऊँची जाति की महिला से सम्बन्ध रखने वाले नीची जाति वाले को श्रीलंका में भी मारा जाता है। जापान में सातवीं सदी की किताबें जैसे की Wagatsuma में देखिये तो अछूतों का रिकॉर्ड और जिक्र दिख जायेगा। कोरिया में जातिप्रथा और अछूतों का जिक्र नौवीं शताब्दी से मिलता है। भारत की जिन किताबों में आपको जातिवाद बताया जाता है उनमें से कोई भी दसवीं शताब्दी से पहले की नहीं है ! मतलब तुर्क / अफगानी हमलावरों के आने के बाद का काल और उन्होंने कम ही हिन्दू राजाओं को हटाया था। जिनको उन्होंने हटाया था उनमें से कई बौद्ध और जैन राजवंश थे।

तो ये होता है सॉफ्ट पॉवर के इस्तेमाल का तरीका। ये जो दलित चिन्तक आपके बच्चों को बौद्ध धम्म की अच्छाई गिना रहे हैं, वो दरअसल शकुनी वाला ही तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं। अपने बच्चों को शकुनी से बचाने की भी सोच सकते हैं आप, या धृतराष्ट्र कि तरह अंधे हैं तो कोई बात नहीं। अगर कहीं आप गान्धारी की तरह आँखों पर पट्टी बांधना चाहते हैं तो कोई बात नहीं। आप अपनी आँख पर पट्टी बाँधने के लिए तो स्वतंत्र हैं !!

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