सोचिये कि अभी जिन शहरी नक्सलों को पकड़ा गया, उन्हें क्या पहली बार पकड़ा गया है? इस से पहले उनकी गिरफ्तारियां हुई हैं या नहीं हुई हैं? अब जब आपको पता है कि वो पहले भी पकड़े जा चुके, पुराने अपराधकर्मी हैं तो ये भी समझ में आ गया होगा कि ये बरसों लड़ते रहने का गुण भी रखते हैं। लम्बे समय तक जारी रहने वाली लड़ाई में मासूम, निरीह हिन्दुओं की क्या हालत होती है इसे कल वाले सर्वेक्षण से समझा जा सकता है।

 

सर्वेक्षण में सात सवाल थे और अंतिम सवाल तक पहुँचने में ही लोग थकने लगे थे। सातों सवाल और उनके जवाब पढ़ने वाले को आराम से समझ में आ जाना चाहिए कि ये कोई सवाल नहीं हैं। पर-गतिशील दूसरे की नक़ल बिना अकल लगाए करने लगते हैं (जैसे कौवा हंस की नक़ल में दूसरी सी चाल चलने लगता है वाली कहावत है)। इसका नतीजा ये होगा कि उनकी सोच काफी बहकी हुई सी होगी। वो हंसुवे की शादी में खुरपी के गीत गायेंगे। खुद को पर-गतिशील, शहरी नक्सल सिद्ध करने के लिए अफीम के नशे जैसा बर्ताव करना था!

 

सातवें सवाल में भारत की सबसे बड़ी समस्याएँ पूछी गयी हैं, वो बागों में दबे पाँव घुसे आ रहे फासीवाद के क़दमों की आहट हो सकती है। अफीम के नशे में हेल्लयुसिनेशन होता है और शहरी नक्सल को बेवजह आवाजें सुनाई देने या डरावनी शक्लें दिखने का वहम होना चाहिए। भारत में मानसिक रोगों के प्रति बहुत जागरूकता नहीं है, इसलिए अजीबोगरीब हरकतें करते मनोरोगी अक्सर पीट भी दिए जाते हैं। इस वजह से शहरी नक्सल के लिए “असहिष्णुता” भी एक बड़ी समस्या होती।

 

करीब 37.5% लोगों ने इस सवाल के जवाब में “रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार” जैसी जमीनी समस्याओं का जिक्र किया है, जो कि शहरी नक्सल बनने के लिए बिलकुल गलत जवाब है! सर्वेक्षण लोकतान्त्रिक ढंग से सबके लिए खुला था, इसलिए कुछ(12.5%) “बागों में बहार है” लिखने वाले अराजक तत्व भी घुस आये थे। छठा सवाल पेड मिडिया और खरीदे जाने वाले समाचार से सम्बंधित था। मीडिया की पढ़ाई के अच्छे संस्थान कम ही हैं, इसलिए पढ़ाई के बाद जहाँ छात्र नौकरी ढूँढने जाते हैं वहां कोई न कोई उन्हें पहले से ही पहचान रहा होता है।

 

अब तो सोशल मीडिया का ज़माना है, इसलिए नौकरी देने से पहले आपकी सोशल मीडिया प्रोफाइल भी छान ली जाएगी। आप उनकी विचारधारा के नहीं हैं तो आपको नौकरी नहीं मिलेगी। कोशिश कर के देखिये, पुराने संस्थानों में दस ऐसे पत्रकारों का नाम गिनाने की कोशिश कीजिये जो खुलकर खुद को हिन्दू बता देंगे। मेरे ख़याल से आप तीन नाम गिनाकर अटक जायेंगे (फिर भी प्रयास कीजियेगा)। अगर ये विकल्प ना हो तो सफ़ेद झूठ बोलने का सामर्थ्य और बेशर्मी का होना महत्वपूर्ण है। विचारधारा सिखाई जा सकती है, बेशर्मी से झूठ बोलना एक नैसर्गिक गुण है जो अनुवांशिक होता है, सिखा नहीं सकते।

 

यही कारण है कि जब आप पत्रकारिता जगत के बड़े नाम सोचेंगे तो आपको कई खानदानी पत्रकार मिलेंगे। 45.7% लोगों ने बेशर्मी से झूठ बोलने को एक प्रमुख गुण माना है, 13% लोग जानते हैं कि लाल हुए बिना नौकरी मिलना ही मुश्किल है। करीब 24% लोग जो “सरकारी नीतियों में कमी ढूँढने” को गुण मान रहे हैं, वो पत्रकारिता का सचमुच का गुण बता रहे हैं। इस किताबी सच्चाई का जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं। ऐसी सोच के साथ आप शहरी नक्सल नहीं बन सकते।

 

पांचवां सवाल संविधान के मुताबिक मौलिक कर्तव्यों का था। पांचवे प्रश्न तक पहुँचने में थकान कम हुई होगी इसलिए यहाँ सही जवाब दिखते हैं। 47.9% लोग जानते हैं कि गोएब्बेल्स के सिद्धांतों का पालन करते हुए विरोधी के तर्क पर नहीं, सीधा-सीधा विरोधी के व्यक्तित्व पर हमला करना होता है। “नेम-कॉल्लिंग” तकनीक से उसके लिए “भक्त”, “संघी” जैसे विशेषण जुटाना ही वास्तव में कर्तव्य है। ये संविधान में लिखा था या नहीं उस से क्या मतलब? इसलिए जिन 41.7% लोगों ने पूछा है कि कर्तव्य कैसे? वो भी सही जवाब दे रहे हैं।

 

चौथे सवाल के नारे में बाकी का आधा हिस्सा पूछा गया था। ये नारा बेशर्मी का भी ज्वलंत नमूना है, जिसमें धर्म को अफीम बताने वाले अपने नारों में मजहबी प्रतीकों का इस्तेमाल करते दिखते हैं। 42% लोगों को पता था कि ये नारा क्या है। उस से भी आगे बढ़कर कश्मीर के इस्लामिक इलाके में लगने वाले नारे को भी 22% लोगों ने पहचान लिया। करीब 22% लोगों ने जो #हिंसा_हल्ला बताया है वो बिलकुल गलत जवाब है। कॉमरेड हिंसा करते जरूर हैं, लेकिन नारों में वो हमेशा प्रेम-सौहार्द्य की बातें करेंगे। शहरी नक्सल होने के लिए चाशनी में डूबी जबान एक प्रमुख लक्षण है।

 

तीसरे सवाल में जहाँ बॉलीवुड कलाकार के काम के बारे में पूछा गया है, वहां शायद 18% लोगों ने “काम” का गलत मतलब समझ लिया। गलत मतलब निकालकर मासूम नौजवान भटक जाते हैं और वो सनी लियॉन का विकल्प चुन लेते हैं। 44% लोगों ने बिलकुल सही जवाब “स्वरा भास्कर” आसानी से चुन लिया है। 36% लोगों ने बिलकुल ही उल्टा अनुपम खेर को चुन लिया है। इन छत्तीस प्रतिशत की शहरी नक्सल होने की तो कोई संभावना नहीं रहती। उस से पहले वाला सवाल थोड़ा किताबों के बारे में था।

दूसरे सवाल के जवाब में जिन 27.5% लोगों ने भारत का संविधान कहा है, उन्हें बता दें कि कॉमरेड पढ़े लिखे नहीं होते। 45.1% लोग जानते हैं कि सर पर किताब पटकने से आसान किसी को “संघी” कहकर सिरे से ख़ारिज कर देना होता है। खुद को पढ़ा लिखा सिद्ध करने के लिए कभी कभी शहरी नक्सल एक लाल किताब से उदाहरण देते हैं। ये जवाब देने वाले 21.6% लोग भी काफी हद तक सही हैं। शहरी नक्सलों वाली धूर्तता का सबसे अच्छा नमूना वो 5.9% लोग पेश कर रहे हैं जिन्होंने चंद्रकांता संतति बताया। अनर्गल उदाहरण देकर विरोधी को सर धुनने के लिए मजबूर कर देना भी शहरी नक्सल का एक गुण होगा।

 

 

कुख्यात संगठन आल इंडिया सेक्सुअल अस्सौल्टर्स (AISA) के एक नेता जिसका नाम भी संगठन के गुणों के अनुरूप “अनमोल रतन” था, उसे बलात्कार के जुर्म में गिरफ्तार किया गया। जांच में पता चला था कि उसने “सैराट” फिल्म देने के बहाने से युवती को अपने कमरे तक बुलाया था। #UrbanNaxal को कम से कम इतना तो पता होना ही चाहिए कि युवती को “सैराट” फिल्म देने के बहाने बुलाना है। ये हमने पहले भी बता दिया था इसलिए इसका जवाब ढूंढना मुश्किल नहीं होना चाहिए था।

 

बार-बार हरने के बाद हार को अपनी “नैतिक जीत” बताना और दशकों तक प्रयास करते रहना हमलावर शहरी नक्सलों का प्रमुख गुण है। दूसरे कोई गुण ना हों, तो भी बस इस एक से आपका काम बन सकता है! आपको विवेक अग्निहोत्री की अर्बन नक्सल्स पढ़नी चाहिए! बाकी प्रयास छोड़ने वालों के लक्षण तो हमें पहले ही ठीक ना लग रहे थे, इनसे ना हो पायेगा!

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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