रानी पद्मिनी के जौहर को इतिहास से मिटा कर “पद्मावती” करने की कुत्सित साजिशों के दौर में याद दिलाते चलें कि तीन जौहर का साक्षी सिर्फ चित्तौड़ ही नहीं रहा। तीन जौहर भोपाल के पास मौजूद रायसेन के दुर्ग की दीवारों ने भी देखे हैं। गौरतलब है कि एक भारतीय राजा के दुसरे पर आक्रमण करने और जीतने पर “जौहर” कभी नहीं हुए। आखिर विदेशी हमलावरों के ही हमले पर “जौहर” क्यों होते थे ? इतिहास को लुगदी साहित्य से नीचे के स्तर पर धकेल ले गए आयातित विचारधारा के पोषक इसका जवाब नहीं देंगे।

 

सिर्फ वही दोषी हों, ऐसा भी नहीं है। जब उन्होंने “द ग्रेट मुग़ल्स” कहा तो चुप रहकर मुस्कुरा कर सुन लेने वाले भी आतातायियों के महिमामंडन के बराबर के दोषी है। मेरे बस में क्या है, फण्ड नहीं, संस्था नहीं, संगठन नहीं, जैसी सोच के साथ रुके, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाले भी उतने ही कायर हैं। रायसेन का किला बिलकुल भोपाल के पास है। ऊँची पहाड़ी पर है, और दुर्गम रास्ते से वहां अभी भी पैदल जाना पड़ता है। वहां एक दशक से किसकी सरकार है ये याद दिलाना जरूरी नहीं।

Pool at Raisen Fort, near Bhopal ((Madhya Pradesh) [Image courtesy : Malhar Blog]
स्थानीय नागरिकों ने वहां जाकर उसकी सौ पचास तस्वीरें इन्टरनेट पर क्यों नहीं डाली, किसने उनका हाथ पकड़ रखा था पता नहीं। मुग़ल हुमायूँ के कारण यहाँ तीन जौहर हुए थे। पहला 1528 में रानी चंदेरी के नेतृत्व में हुआ। मुग़ल सेना के लौटते ही इलाके के लोगों ने फिर मुग़ल हुक्म मानने से इंकार कर दिया। फिर हमला हुआ और लम्बे समय किले की घेराबंदी के बाद रानी दुर्गावती के साथ रायसेन के सात सौ वीरांगनाओं ने 1532 में दूसरी बार जौहर किया, लक्ष्मण तुअर के नेतृत्व में पुरुषों ने साका किया। मुग़ल सेनाओं के लौटते ही फिर बगावत का बिगुल फूंक दिया गया। रानी रत्नावती के नेतृत्व में तीसरा जौहर 1543 में हुआ था।

 

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।। (भगवद्गीता 2.29)

जौहर की बात आते ही भगवद्गीता का श्लोक याद आता है जिसमें कहा गया है कि कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है। कोई इसका आश्चर्य की तरह वर्णन करता है फिर कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है और इसको सुन करके भी कोई जानता-विश्वास नहीं कर पाता। रानी चंदेरी, रानी दुर्गावती, रानी रत्नावती और उनके साथ वीरगति को प्राप्त हुई वीरांगनाओं के लिए जो श्रद्धा होती है उसके लिए शब्द कम होंगे।

 

हाँ, अपने ही इतिहास के प्रति ऐसे गाफ़िल पड़ी कौम के लोगों को भी मेरा पाव भर नमन रहेगा।

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