थोड़े साल पहले की बात है कि हमने एक मशहूर किताब से Ayn Rand का लिखा कुछ उठा कर अपनी एक मित्र को भेजने का प्रयास किया। गूगल ट्रांसलिटरेट को इस्तेमाल करना हाल में ही शुरू किया था और उसने अपना काम किया। Quotation के अंत में जो डैश डाल के – Ayn Rand लिखा उसे सॉफ्टवेयर ने हिंदी में कर डाला, हमने भी ध्यान दिए बगैर जब सेंड कर दिया तब देखा कि क्या कारनामा हुआ है। किस्मत से लड़की पुरानी मित्र थी और बरसों से जानती थी तो मामला “विवादित” नहीं हुआ। लेकिन उसी खींच तान में हमें पहली बार पता चला कि आयन रैंड एक महिला हैं। ऐसे ही अन्य कई नामी किताबों के लेखक नहीं लेखिका हैं ये हमें बहुत बाद में पता चला।

 

मेरी जानकारी कितनी कम होती है इस बात का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जो कि बिहार के ही थे, उनके ‘भूमिहार’ होने का पता भी हमें इसी साल चला है। स्कूल के जमाने में हमने अगाथा क्रिस्टी की किताबें पढ़ी जरूर लेकिन वो महिला है ये भी बहुत बाद में जाना। पर्ल एस. बक का महिला होना भी काफी बाद में पता चला। Somerset Maugham के नाम का उच्चारण मौघम / मौग्हम और मॉम में भी कंफ्यूज होते हैं। ज़ोर्ज ओरवेल का बिहार कनेक्शन भी नहीं पता था। इतने कम जानकार आदमी से गंभीर नारीवादी किताबों के नाम की उम्मीद तो हरगिज नहीं की जानी चाहिए। हम ज्यादा से ज्यादा महिलाओं द्वारा लिखी किताबों के नाम बता सकते हैं। उनमें भी बेल जार जैसे विख्यात नाम काफी बाद में आते हैं।

 

मेरी पहली किताब होती है “हाफ ऑफ़ द येलो सन” जिसे Chimamanda Ngozi Adichie ने लिखा था। इनका नाम भी अंग्रेजी में इसलिए है क्योंकि उसका सही उच्चारण नहीं पता। ये किताब साथ के दशक के नाइजीरिया की कहानी है जहाँ उस वक्त गृह युद्ध छिड़ा हुआ था। इस युद्ध में लाखों लोग मरे-मारे गए थे। इसके तीन मुख्य पात्र इसी युद्ध में फंसे हुए हैं। एक कम उम्र का लड़का है जो किसी गरीब से इलाके से एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के घर काम करने आया है। एक मध्यमवर्गीय युवती ओलना है जिसे अपने रिश्तेदारों का कत्लेआम झेलना पड़ा है। तीसरा एक लेखक है जो नाइजीरिया में रहता है और ओलना की जुड़वां से प्यार करता है। बदलते सामाजिक-राजनैतिक समीकरणों में इन लोगों की जिन्दगी एक दुसरे से गुंथी होती है। जातीय विद्वेष, नैतिकता, उपनिवेशवाद के खात्मे के बीच ये उनके प्यार की कहानी है। बीच बीच में अफ्रीका का भी पता चलता रहता है। ये काफी प्रशंसा पहले ही पा चुकी है, इसे बुकर जैसे अवार्ड तो नहीं मिले लेकिन कुछ भारतीय बुकर पा चुकी महिलाओं की किताब से ये कई गुना बेहतर है।

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नवयुवतियों के लिए एक और किताब होती है शेरिल स्ट्रेड की लिखी “वाइल्ड” (Wild: A Journey from Lost to Found – Cheryl Strayed) जिसपर एक अच्छी फिल्म भी “वाइल्ड” नाम से ही बन चुकी है। ये एक छब्बीस साल की युवती की कहानी है जिसकी माँ की हाल में ही कैंसर से मौत हो गई है। अचानक एक दिन इसे सूझा कि अमेरिका का पश्चिमी तट जो कि ग्यारह सौ मील लम्बा है, उसे पैदल चल के पार किया जाए। ये रास्ता एक रेगिस्तान से गुजरता है, कालेफोर्निया, ऑरेगोन, से होता हुआ वाशिंगटन जाता है। लड़की को लम्बी दूरी पैदल चल के पार करने का कोई अनुभव नहीं था, अकेले पैदल निकल पड़ना किसी लिहाज से सुरक्षित भी नहीं था। स्ट्रेड इस रास्ते को पार करने की मुश्किलों की कहानी सुनाती हैं। अचानक ख़त्म हो गए परिवार से लेकर लम्बी दूरी पैदल चलने से होने वाले पैर के दर्द तक सब कुछ। ये सफ़र पर, मनुष्य की जिजीविषा पर और जीवन के उतार से शुरू होकर चढ़ाव तक की कहानी है। फिल्म देखिये, वो अच्छी है, मौका मिले तो इस किताब को भी पढ़ लीजिये।

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तीसरी किताब फिर प्रेमकथा है, “अ टाइम ट्रैवलर्स वाइफ” जिसे ऑड्रे निफ्फेनेग्गर (Audrey Niffenegger) ने लिखा है। ये अजीब सी कहानी क्लेयर नाम की लड़की और हेनरी नाम के लड़के की है जो शादी तो करते हैं मगर पति जो था वो रह रह के गायब होता रहता है। दरअसल हेनरी को क्रोनो डिस्प्लेसमेंट डिसऑर्डर नाम की अनोखी (काल्पनिक) बीमारी है जिसके कारण उसके जीन में अजीब परिवर्तन होते रहते हैं। इसकी वजह से वो कभी भूतकाल में चला जाता है तो कभी भविष्य में पहुँच जाता है। दोनों की पहली मुलाकात तब होती है जब क्लेयर छह साल की और हेनरी छत्तीस साल का होता है। शादी के वक्त लड़की बाईस की और लड़का तीस का होता है। ऐसे ही कभी वो बूढ़ा तो कभी बच्चा होता रहता है और लड़की नॉर्मल इंसानों जैसा सीधा समय की रेखा में बढ़ती रहती है। ऑड्रे इसी पत्नी के नजरिये से कहानी सुना रही होती है जो एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश में लगी हुई है। प्रेम कथा जैसा प्लाट होने के वाबजूद ये किताब कई बार लड़कियों से ज्यादा लड़कों को पसंद आती दिखी है।

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इसलिए मेरी लड़कियों के लिए किताबों की लिस्ट पे ये तीन किताबें। ये सब ढाई सौ-तीन सौ की किताबें हैं और लड़कियों / महिलाओं को इस कीमत की किताबें “गिफ्ट” करने में आप ज्यादा संकोच नहीं करेंगे ऐसा मेरा मानना है (जो कि हर बार की तरह इस बार भी गलत हो सकता है)। फिर मेरी सलाह होगी कि किताब लाकर पहले खुद पढ़ लीजिये फिर गिफ्ट कीजियेगा, एक तो सोचने का थोड़ा वक्त मिल जाएगा। आप ये ठन्डे दिमाग से तय कर सकेंगे कि देनी भी है कि नहीं देनी। दूसरी कि यही देनी है या कोई दूसरी देनी चाहिए, पढने पर ये भी अंदाजा हो पायेगा। बाकी ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है।

[हर किताब का अपना एक पाठक वर्ग होता है, बूढ़े लोगों को इन तीनों में से कोई पसंद नहीं आएगी।]

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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