हाल में वायान्नाड की रैली की तस्वीरों से दक्षिण भारत का एक इलाका दिख गया। इससे जुड़े विवाद के क्रम में एक पत्रकार ने जब कांग्रेसी नेता जी से बात करते हुए उनका परिचय दिया तो वो फ़ौरन बोल पड़े कि नहीं मैं तो तमिलनाडु से हूँ! इससे हमारा ध्यान दो चीज़ों पर चला गया। पहला तो ये कि दिल्ली को ही भारत मानने वाले ल्युटियन पक्षकारों के लिए शायद तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु बोलने वाले सभी मद्रासी ही होते हैं। भारत में विविधताएँ होती हैं, उसे समझने या मानने की इन्हें जरूरत ही नहीं लगी। ये जानी-समझी बात थी इसलिए ध्यान देने लायक नहीं थी।

ध्यान देने लायक बात ये थी कि कुछ दिन पहले किसी ने बच्चों के लिए किताबों के बारे में पूछा था। यहाँ एक साथ कई बातें याद आ जाती हैं। पहली तो ये कि बच्चों के लिए हाल के दौर में कोई अच्छी हिन्दी की किताब लिखी गयी हो और प्रसिद्ध हुई हो ऐसा याद नहीं आता। दूसरी ये कि कोई पुस्तक सिर्फ आज के लिए देना चाहते हैं, या हमेशा के लिए, ये भी सोचना होगा। कॉमिक्स की तरह एक बार पढ़कर छोड़ दी गयी और जिन्दगी भर सहेजी गयी, बार-बार पढ़ी जाने लायक पुस्तक अलग-अलग होंगी। तीसरा ये कि भारत सांस्कृतिक रूप से भी बहुत बड़ा है और अपने क्षेत्र के बाहर की बातें भी मालूम होनी चाहिए।

जैसे हिन्दी में कबीर या सूरदास के दोहे पढ़ाये जाते हैं, वैसे ही दक्षिण भारत में तिरुवल्लुवर, तमिल में लिखा करते थे। कबीर, मीरा जैसे संतों की तरह वो भक्तिकाल के नहीं थे। उनके जन्म का समय पक्का-पक्का तय नहीं हो पाया है और अलग-अलग लोग उन्हें दूसरी शताब्दी ईसापूर्व से लेकर चौथी शताब्दी तक का भी मानते हैं। उनकी लिखी थिरुकुरल या कुरल का करीब चालीस भाषाओँ में अनुवाद हो चूका है। कुरल एक ऐसा वाक्य होता है, जिसमें सात शब्द (क्रिस) होते हैं। चार पहले हिस्से में और तीन शब्द मिलकर एक कुरल बनता है। इस किताब में ऐसे ही कुरल संग्रहित हैं, इसलिए इसका नाम थिरुकुरल है।

तमिल में त का उच्चारण थ जैसा भी होता है, इसलिए तिरुवल्लुवर नाम भी देवनागरी में लिखा हुआ पाया जाता है। इस संग्रह में 40 कुरल इश्वर, बारिश, सन्यासियों और धर्म पर तो 200 परिवार और घरेलु मामलों पर हैं। 250 राज्य और राजसी गुणों पर, 100 मंत्रियों से सम्बंधित, 140 कुरल धार्मिक सिद्धांतों जैसे करुणा, दान, व्यवहार इत्यादि पर हैं। 130 कुरल नैतिकता से सम्बंधित हैं और 220 शासन व्यवस्था पर। ये कुरल भक्तिकाल से पहले लिखे गए थे इसलिए हिन्दुओं के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पर इसमें बात की गयी है। 250 कुरल पति पत्नी के संबंधों और मानवीय प्रेम पर हैं।

ये पुस्तक कोई आसमानी किताब होने का दावा नहीं ठोकती, इसलिए कूढ़मगज नहीं बनाएगी। ये उपासना की बात करती है, लेकिन किसी एक को सही और बाकी सबको गलत नहीं बताती, इसलिए असहिष्णु भी नहीं बनाएगी। ये दान की महत्ता तो बताती है लेकिन कई दूसरी किताबों जैसा, उसके बदले में धर्म परिवर्तन करवाने या अपने ही लोगों को देने की बात नहीं करती इसलिए अपने पराये का भेद करना भी नहीं सिखाएगी। ये सीखने और स्वाध्याय की महत्ता बताती है, लेकिन कौन सी किताब पढ़ी जाए इसपर कोई नियम लागू नहीं करती, इसलिए किसी पुस्तक या पुस्तकालय को जलाना भी नहीं सिखाएगी। कहते हैं कि थिरुकुरल में ‘तमिल’ शब्द एक बार भी नहीं आता, इसलिए ये क्षेत्रवाद भी नहीं सिखाएगी।

इतनी वजहें काफी न हों तो बता दें कि इस अनुवाद की तारीफ महर्षि एपीजे अब्दुल कलाम कर रहे होते थे। उन्होंने इसकी प्रस्तावना भी लिखी है। इसके बारे में वो कहते हैं कि ये अनुवाद ख़ास इसलिए है क्योंकि इसमें सरलता को बरकरार रखते हुए कुरल की काव्यात्मकता को छोड़ा नहीं गया है। हाँ कीमत के हिसाब से देखें तो हमारा मानना है कि एक रुपये में कम से कम दो पन्ने आने चाहिए और करीब तीन सौ रुपये में तीन सौ के लगभग पन्नों की ये किताब हमें महंगी लगती है। फिर सवाल ये भी है कि एक बार खरीदी गयी ये किताब कई पीढ़ियों के काम आएगी तो बहुत महंगी भी नहीं कह पाते।

बाकी थिरुकुरल को तमिल में ‘पोय्यामोली’ (मिलता जुलता उच्चारण) भी बुलाते हैं। इस तमिल शब्द का मतलब रामबाण जैसा होता है, यानी ऐसे शब्द को कभी बेकार नहीं जाते। मजहब या रिलिजन के बंधनों से अलग धर्म की उन्मुक्तता समझनी हो, तो घर में ये किताब भी रखनी चाहिए।

(अमेज़न के लिंक से इस किताब का मेरा अंग्रेजी रिव्यु दिखेगा, अमेज़न की साईट पर जाएँ तो कृपया मेरे लिखे चार लाइन पर Found Helpful को Yes जरूर कर दें)

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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