दैनिक पूजा पाठ तथा अनुष्ठान में सर्वाधिक महत्व किसी शब्द का है तो वह है “ॐ”। भगवान् शिव को समर्पित षडाक्षर मन्त्र ॐ नमः शिवाय का प्रथम अक्षर ॐ है। ॐ प्रणव है, त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) का नाश करने वाला मन्त्र है। संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार ॐ ‘अ’, ‘उ’, ‘म्’ के संयोजन से बना है। शिव पुराण में बिंदी और नाद को भी ॐ का अंग माना गया है। ॐ वेदत्रयी (ऋक्, यजुः, साम्) एवं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक है। शिवपुराण के अनुसार प्रणव के छः अर्थ (स्वरूप) हैं: मंत्र, यंत्र, देवता, प्रपंच, गुरु तथा शिष्य। ‘सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः…’ आदि जो पाँच मंत्र हैं श्रुति (वेद) ने प्रणव को इन सबका वाचक कहा है।

 

लिंगपुराण में भी ॐकार की वृहद् विवेचना है। परन्तु क्या आप जानते हैं कि रामायण में श्रीराम को भी ॐ कहा गया है! छान्दोग्य उपनिषद् में ॐ का एक अर्थ उद्गीथ है। उत् अर्थात् सूर्य, गी अर्थात् वायु, थ अर्थात् अग्नि। ऐसे ही ॐ के कई अर्थ हैं। आदरणीय Nityanand Misra जी ने अपनी सुंदर तथा महत्वपूर्ण पुस्तक “The Om Mala” में ॐ के 109 अर्थ बताये हैं। जिस प्रकार एक माला में 108+1 दाने होते हैं उसी प्रकार मिश्रा जी ने ॐ शब्द के 109 अर्थों के मोती इस पुस्तक में पिरो दिए हैं। पुस्तकें कई हज़ार शब्दों की लिखी जाती हैं किंतु मैं यह देख कर चकित हूँ कि मिश्रा जी ने मात्र एक शब्द ॐ पर ही दो सौ पृष्ठ की पुस्तक लिख डाली। ॐ का एक अर्थ ‘शब्द’ भी है। मिश्रा जी ने प्रणव के एक दो नहीं अपितु 11 अर्थ बताये हैं। पुस्तक में ॐ के प्रत्येक अर्थ पर सन्दर्भ सहित सरल शब्दों में व्याख्या की गयी है। व्याकरण की दृष्टि से किस धातु से किस शब्द की उत्पत्ति हुई और वह ॐ के अर्थ में किस ग्रन्थ में किस प्रकार वर्णित है यह बहुत संक्षेप और सहज रूप से समझाया गया है।

 

ॐ के अर्थ अनादि, स्वर, अक्षर, शुक्ल, रुद्र भी हैं। ध्यातव्य है कि भाष्यकारों ने ॐ के 109 से अधिक अर्थ बताये हैं किंतु मिश्रा जी ने 109 अर्थों की माला लिख कर उन अंग्रेजी के पाठकों पर उपकार किया है जो वैदिक वाङ्मय से परिचित नहीं हैं। मिश्रा जी से अनुरोध है कि वे ॐ माला का हिंदी अनुवाद शीघ्र ही लिखें ताकि हिंदी के पाठकों को भी ॐ के विभिन्न अर्थों का ज्ञान हो सके।

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