हिन्दू धर्म और इस्लाम मजहब में तमाम भिन्नताओं सहित एक प्रमुख अंतर है। वह ये है कि हिन्दू धर्म में कई रास्ते बताये गए हैं जो अंततः एक जगह जाकर मिलते हैं जबकि इस्लाम में बताये गए अलग-अलग रास्ते कई अलग मंज़िलों तक पहुँचाते हैं। यह इस्लाम के अनुयायी को तय करना पड़ता है कि उसे कहाँ पहुँचना है। जनाब आरिफ मोहम्मद खान साहब उन राजनीतिज्ञों में से हैं जिन्होंने लिबरल होने का रास्ता अख्तियार किया और अपनी ही कौम के मुल्लों से लड़ बैठे। जब राजीव गाँधी ने शाहबानो केस में न्यायालय का फैसला पलटने के लिए संसद में बिल लाना मंजूर किया तब उसी समय आरिफ मोहम्मद खान राजीव गाँधी सरकार के मंत्रिमंडल से अपना इस्तीफा वहीं संसद में बैठ कर लिख रहे थे। दरअसल भारत में मौजूद दो अब्राहमिक रिलिजन ईसाईयत और इस्लाम में फ़र्क सिर्फ इतना है कि एक रिलिजन का इस्तेमाल सियासी ताक़त पाने के लिए करता है, और दूसरा सियासत का इस्तेमाल रिलिजन के प्रसार के लिये करता है। भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम के कट्टरपंथी अनुयायियों ने सियासत का इस्तेमाल मज़हबी विचारधारा के प्रसार के लिए किया है। इस लिहाज से साल 1986 में दो बातें एक साथ हुईं। हमेशा की तरह राजनैतिक शक्ति ने इस्लाम की कट्टरपंथी विचारधारा का समर्थन किया और इसी कुत्सित विचारधारा के विरोध में आरिफ साहब ने लम्बी लड़ाई छेड़ दी जिसमें एक छोटी सी जीत हाल ही में प्राप्त हुई है। यह तो तीन तलाक के मसले की बात हुई लेकिन अपनी पुस्तक ‘Text and Context: Quran and Contemporary Challenges” में आरिफ साहब ने और भी बहुत सारी बातें कही हैं।

किताब के शीर्षक से यह न समझें कि यह क़ुरान को समझने के लिए लिखा गया कोई इंट्रोडक्शन है। यह किताब क़ुरान पर नहीं लिखी गयी है और न ही इस्लाम को पूरी तरह परिभाषित करने का दावा करती है। यह किताब आरिफ साहब के अंग्रेजी लेखों का संकलन है और ढेर सारी जानकारियों का खजाना है। ज्यादातर लेख पूर्व में Covert मैगज़ीन और इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हो चुके हैं। करीब तीन सौ पेज की इस किताब में आरिफ साहब के 78 लेखों को आठ सेक्शन में विभाजित किया गया है: Education & Knowledge, History, India, Islam, Muslim Personal Law, Muslim Society, Pakistan, Terror & Jihad. इसमें से मुस्लिम पर्सनल लॉ पर लिखे गए 8 लेख उनके लिए उपयोगी हैं जिन्हें इस विषय की कोई जानकारी नहीं है। यहाँ यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि यह किताब किसी एक विषयवस्तु की सम्पूर्ण विवेचना नहीं करती। एक विद्वान और पत्रकार के तौर पर आरिफ साहब के लेख इस्लाम की अंतिम किताब पर कोई अंतिम राय नहीं देते लेकिन पाठक को जागरूक होने का पूरा मौका देते हैं।

आरिफ साहब बड़ी संजीदगी और साफगोई से इसका प्रमाण दिया है कि भारत का ज्ञान विज्ञान पुरातन काल में अरब गया था। वे लिखते हैं कि आज कश्मीर के निवासियों को प्राचीन कश्मीरी ऋषियों को भूलना नहीं चाहिये। आरिफ साहब रंगनाथ मिश्रा आयोग और सच्चर समिति की सिफारिशों के औचित्य पर भी पूरी बेबाकी से ऊँगली उठाते हैं। पायनियर में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने वन्दे मातरम की प्रशंसा की है और एक अन्य लेख में खिलाफत आंदोलन की भर्त्सना भी की है। कहीं-कहीं आरिफ साहब इंदिरा गाँधी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की तारीफ भी करते हैं। कुल मिलाकर यह किताब किसी हिन्दू से ज्यादा एक मुसलमान द्वारा पढ़ी जाने लायक है बशर्ते आज का मुसलमान ओवैसी जैसों को अपना लीडर मानना बन्द कर दे और दिमाग खोलकर आरिफ मोहम्मद खान साहब के तर्कों को पढ़ना स्वीकार करे। एक जागरूक हिन्दू आरिफ साहब की इस किताब को साफ मन से पढ़े तो उसे एक लिबरल मुस्लिम विद्वान का रास्ता समझ में आयेगा जिस पर आरिफ साहब अपनी कौम के जाहिल, मूर्ख लोगों को चलाना चाहते हैं।

[नोट:- मेरी वॉल पर जारी #पढ़ना_तो_ये_भी_है शृंखला में अगस्त 2017 की यह दूसरी पुस्तक है जो Rupa Publication से 2010 में प्रकाशित हुई है। यह किताब शायद हिंदी में उपलब्ध नहीं है और नेट पर डाउनलोड के लिए भी नहीं है।]

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