बचपन की बड़ी तमन्नाओं में से एक होती है बड़ा भाई होना। अगर आप छोटे हों, तो हमेशा लगता है काश मैं सबसे बड़ा भाई-बहन होता, मैं सबको हुक्म देता। ये जो सबसे बड़ा होने की तमन्ना होती है ये बड़े होने पे भी नहीं जाती। काफी साल बाद भी जब उम्र काफी बीतने पे इंसान प्रबंधन, या मैनेजमेंट जैसे शब्द सुनता है तो मोटे तौर पर उसका यही मतलब लेता है कि उसके महतात काम करने वाले जूनियर लोगों की एक टीम होगी जिसे उसे मैनेज करना होगा। ये बात बिलकुल भुला दी जाती है कि उसके ऊपर भी ज्यादा वरिष्ठ अधिकारी होंगे, उसके समकक्ष के कुछ अधिकारी होंगे और उनसे भी सम्बन्ध “मैनेज” करने पड़ते हैं।

 

घर में भी या आम समाज में हर पल आपसे नीचे के पायदान पर ही लोग नहीं होते, आपसे बड़े, आपके बराबर के भी कुछ लोग होते हैं। उनसे संतुलित सम्बन्ध ना रखें तो कोई कभी अपने हिस्से का काम आपके हिस्से थोप जाएगा, कभी कोई अपने सर का इल्जाम आपके सर मढ देगा। ये जो रोज रोज लगातार सामने दिखने वाली चीज़ होती है वो अक्सर आँखों के सामने होते हुए भी नजर नहीं आती। ये बिलकुल वैसा ही है, जैसे आप कोई नया डियो लगाएं तो थोड़ी ही देर में आपको तो खुशबु आनी बंद हो जायेगी, मगर कोई नया आने वाला उसी खुशबु को सूंघ कर पूछ लेगा (लेगी) आज कुछ नया लगाया क्या ?

 

इसे आप अभी की लोकसभा में भी देख सकते हैं। ये समझना कोई मुश्किल नहीं कि आदमी अमर नहीं होता, पैंसठ के बाद रिटायर होने की भी सोचने लगता है। ऐसे में पार्टी से अगला प्रधान कौन होगा ? सुषमा होंगी, राजनाथ होंगे, जेटली होंगे, कौन होगा ? इनमें आपस में भी राजनैतिक द्वन्द चलता होगा क्या ? जाहिर है हरेक एक दुसरे से आगे निकलना चाहता है, कौन सबसे आगे नहीं होना चाहता ? किस्मत से ऐसे मुद्दों पर भी हिंदी में किताबें नहीं लिखी गई। जबकि ऐसा भी नहीं है कि ऐसा पिछले सत्तर साल में कभी नहीं हुआ। आपसी द्वन्द में ज्योति बासु प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए। जिन राजीव गांधी की ही सरकार में, वी.पी.सिंह कभी मंत्री थे, उन्हीं पर बोफोर्स का इल्जाम लगा कर बाद में राजा मांडा प्रधानमंत्री बने। देवेगौड़ा, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह, सबकी बारी में ऐसा हुआ है लेकिन हिंदी पट्टी को ये विषय नहीं सूझा।

 

डोरिस कार्न गुडविन (Doris Kearns Goodwin) को ये विषय सूझा था, लेकिन उन्होंने अब्राहम लिंकन के ऊपर एक किताब लिखी। लिंकन का करीबी गुट, प्रतिद्वंदियों का गुट था। डोरिस ने उन्हीं पर टीम ऑफ़ रायवल्स (Team of Rivals) लिखी थी। मेरे ख़याल से लिंकन पर अलग अलग दृष्टिकोण से लिखी पचास किताबें तो जरूर होती होंगी लेकिन ये किताब लिंकन के कैबिनेट पर है। इसमें सैलमन चेज़ (Salmon Chase, Secretary of the Treasury) हैं, फिर एडवर्ड्स बेट्स (Edward Bates, Attorney General) हैं, और विलियम सेवार्ड (William H. Seward, Secretary of State) भी हैं। लगभग ये सब के सब एक दुसरे के राजनैतिक प्रतिद्वंदी थे। किताब की शुरुआत से ही (1860 से) सभी राष्ट्रपति पद के प्रतिद्वंदियों की खींचतान शुरू हो जाती है। लेखिका सबके व्यक्तित्व पर रौशनी डालती चलती है। जैसे चेज़ जो कि बात करते हुए वो बताती हैं कि चेज़ की खुद की उपलब्धियां कम नहीं थी, लेकिन उन्हें जो मौके मिले उनका पूरा उपयोग ना कर पाने का उन्हें अफ़सोस रहता था। चेज़ से थोड़े छोटे थे स्टेनटन वो गुलामी की प्रथा के सबसे बड़े विरोधी थे और उन्होंने जीवन भर इसका विरोध करने की कसम खा रखी थी।

 

स्टेनटन पहले लिंकन को किसी काम का नहीं समझते थे, लेकिन लिंकन ने अपने एक साल के कार्यकाल के बाद साइमन केमेरन को हटा कर उनकी जगह स्टेनटन को दे दी। बाद में स्टेनटन और लिंकन के कामकाजी सम्बन्ध बहुत अच्छे रहे थे। किताब आगे गृह युद्ध (Civil War) के दौर से गुजरती है, लेकिन हर लड़ाई का जिक्र नहीं करती। सिर्फ एक किताब में सभी को समेटना वो भी राजनैतिक घटनाओं के साथ, शायद संभव भी नहीं होता। इतने पर ही किताब करीब हज़ार पन्ने की हो जाती है। इसे लिखने का तरीका भी ऐसा है कि लोग इतिहास पढ़कर बोर ना हों। आमतौर पर इतिहास की किताबें काफी रूखी सूखी सी होती है, लेकिन लेखिका गुडविन को प्रचलित लेखिका ज्यादा और इतिहासकार कम माना जाता है। उनका लिखा उदासीन नजरिये वाला नहीं होता।

पूरे हजार पन्नों में सभी लोग मौजूद नहीं रहते। विरोधियों के खात्मे के एक बड़े घटनाक्रम के बाद से बेट्स किताब से गायब हो जाते हैं। सेलमन चेज़ सही चुनाव नहीं थे, बाद में लिंकन ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त कर दिया था। केमेरन को हटाकर बाद में उनकी जगह पर स्टेनटन को लाया गया। आखिर में स्थिति कुछ ऐसी थी कि ज्यादातर जिम्मेदारियां लिंकन खुद ही संभाल रहे थे। लिंकन के कई फैसले ऐसे थे जो उनके करीबी कैबिनेट के लिए भी चौंकाने वाले थे। मुक्ति की उद्घोषणा ने उनके कैबिनेट को भी हिला दिया था, यहाँ ये भी समझ में आता है कि प्रतिद्वंदियों का गुट बनाकर लिंकन ने अपने लिए कैसी मुश्किल खड़ी की थी। बेट्स और स्टेनटन इसके समर्थन में थे लेकिन चेज़ और कालेब स्मिथ विरोधी थे। लिंकन ने सारे सही ही फैसले लिए थे ऐसा भी नहीं है, उनके फैसलों में अलास्का प्रान्त भी आता था (ये नेहरु के कश्मीर फैसले जैसा था)। किताब पढ़कर अगर आपको लगे की लिंकन कोई अनजान आदमी थे जिन्हें कोई नहीं जानता था तो आप गलत सोच रहे हैं। वो खासे सफल वकील थे और रिपब्लिकन लोगों का उन्हें काफी समर्थन था। लिंकन-डगलस बहस के बाद वो देश भर में जाने जाते थे। कुछ कुछ वैसा ही जैसे कई लोग समझते थे कि मोदी को गुजरात के बाहर कोई नहीं जानता।

 

किताब लिंकन की हत्या पर ख़त्म होती है, वहां टॉलस्टॉय की एक कहानी भी है जिसमें कई नामी गिरामी लोगों के बारे में टॉलस्टॉय से सुनने के बाद काबिले का मुखिया कहता है कि चट्टान की तरह अडिग, गूंजती आवाज और मधुर हंसी वाले लिंकन के बारे में तो तुमने कुछ कहा ही नहीं ! उसकी बातों के बिना महान नामों की लिस्ट तो अधूरी है !

 

करीब पांच सौ रुपये की ये किताब हज़ार पन्नों की है। लिंकन के बारे में सब कुछ जानते हों, तब तो आपने इसे पहले ही पढ़ रखा होगा, अगर सब नहीं जानते तो आपको इस किताब को पढ़ना चाहिए। लिंकन के काल पर Tried by War, या फिर डेविड हर्बर्ट डोनाल्ड की लिंकन (Lincoln)जैसी किताबें भी हैं, उनके कातिल की तलाश करीब बारह दिन चली थी उसपर भी एक Manhunt नाम की किताब लिखी गई है (जो हमने नहीं पढ़ी)। टीम ऑफ़ रायवल्स सिर्फ 1860 से 65 तक की घटनाओं पर है। लेखिका को पुल्तिज़र मिल चुका है (जो की रूज़वेल्ट पर लिखी गई किताब के लिए मिला था), और इस किताब को लिखने में उन्हें करीब दस साल का समय लगा था। इस किताब पर स्टीवन स्पिल्सबर्ग एक फिल्म बना चुके हैं, स्पिल्सबर्ग की थी तो जाहिर है आलोचकों ने काफी सराहा था। टीम ऑफ़ रायवल्स, बराक ओबामा की प्रिय किताबों की लिस्ट पर होती है। राजनैतिक उठापटक कैसे चलती होगी, एक बड़ा नेता अपनी कैबिनेट कैसे संभालता है, ये सब जानने समझने में रूचि हो तो इसे पढ़ सकते हैं। किताब में अमेरिका के सिविल वॉर का जिक्र भी है, गुलामों की मुक्ति का भी, तो उसके बारे में भी इस से पता चलेगा। हज़ार पन्ने महीने भर में पढ़ने की हिम्मत हो तो ऐसी किताबें उठानी चाहिए। बाकी ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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