जब इतिहास की बात होती है तो आम तौर पर लोग हड़प्पा-वैदिक युग, बाबर-औरंगजेब, या ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजों के शासन काल का दौर समझते हैं। आज जब भारत को आजाद हुए सात दशक हो गए हैं तो तीन पीढ़ियाँ बीत गई हैं, ये किसी का ध्यान ही नहीं जाता। पचास साल पहले की बातें भी आज इतिहास ही होती हैं। सत्तर के दशक के किस्से सुनकर कई लोग अचंभित होंगे, पूछेंगे ऐसा भी होता था क्या ? अगर राहुल गाँधी ने “आलू की फैक्ट्री” ना कहा होता, तो हजम करना मुश्किल था कि राजपरिवार का कोई ऐसे बयान भी दे सकता है। शुक्र है वो बोले और लोगों को कहानी सच्ची लगने लगी।

अगर बदलावों का दौर देखें तो सत्तर का दौर सबसे ज्यादा उलटफेर का रहा है। पड़ौसी मुल्कों से युद्ध का आह्वाहन करते लोगों को ये दौर अगर याद होता तो वो युद्धोन्मादी भी नहीं होते। सत्तर के दौर के जे.पी. आन्दोलन से जो विनाश शुरू हुआ वो बिहार आज तक झेल ही रहा है। इस दौर पर पहले “मेरे अपने” और बाद में “हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी” जैसी फ़िल्में बनी हैं। छात्र आन्दोलन और उसके नतीजे इनमें अच्छे से मालूम पड़ते हैं। लेकिन कैसी उलट-फेर से नतीजे ऐसे निकले थे, ये मालूम करना हो तो आपको किताबें पढ़नी होंगी।

सत्तर के जिस दौर की हम बात कर रहे हैं, उसी दौर में आज की मशहूर पत्रकार तवलीन सिंह ने पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करना शुरू किया था। इसी दौर के राजनैतिक और सामाजिक हलचलों पर उनकी किताब है “दरबार”। जैसा की नाम से जाहिर है ये एक ही विशिष्ट राजवंश और उसके दरबारियों की कहानी है। राजपरिवारों के ख़त्म होने पर जो राजनैतिक परिवार सत्ता में आ गया था, ये उसके बनने-बिगड़ने-फिर बनने की कहानी है। राजनीती में वंशवाद, पेड मीडिया के काम काज और इनके अलवा विपक्ष की भूमिका पर इस किताब में गंभीर सवाल उठाये गए हैं।

मोटे तौर पर इस किताब में क्या है वो समझाना है तो कहना होगा की १९७०-८० के दशकों की किताब है। इसकी शुरुआत होती है गैर कांग्रेसी पार्टियों के उदय की दास्ताँ से और आगे जे.पी. और सम्पूर्ण क्रांति की तरफ बढ़ती है। वहां से फिर ये इमरजेंसी के दौर में जाती है, इंदिरा गाँधी के सत्ता से बाहर होने की बातें, फिर जनता पार्टी के अंतर्कलह और इंदिरा गाँधी की वापसी पर आती है। दिल्ली दरबार के आस पास लिखी गई है इसलिए वहां से ये पंजाब के आतंकवाद और फिर इंदिरा गांधी की हत्या पर जाती है। राजीव गांधी की “स्वच्छ छवि” से आगे ये बोफोर्स घोटाले में इस मूरत के टूटने पर जाती है। राजीव गाँधी की हत्या के दौर पर ये किताब ख़त्म हो जाती है।

कई छोटे छोटे वाकये कहानी में बीच बीच में मौजूद हैं। संजय गांधी के आदेश पर लोगों को जबरन पकड़ कर नसबंदी करने के वाकये हैं, ७७ (सतहत्तर) के दौर में अटल बिहारी वाजपेयी का एक प्रखर वक्ता के तौर पर उभारना भी है। चुनावों में कैसे सैय्यद अहमद शाह बुखारी और अन्य मुस्लिम नेता, आरएसएस के साथ मिलकर इंदिरा के खिलाफ लड़े वो भी है। उस दौर के एक मशहूर व्यंगकार थे शरद जोशी जिन्होंने राजीव गाँधी के एक बयान पर “पानी की समस्या” नाम का व्यंग लिखा था। उसका जिक्र भी आता है। निजी स्वार्थों और एक ख़ास विचारधारा की समर्थक ना होने के कारण तवलीन सिंह की इस किताब के नाम से भी अक्सर कुछ लोग परहेज़ रखते हैं।

मौका मिले तो “दरबार” पढ़िए, अंग्रेजी में ये करीब ढाई सौ रुपये की और कुल जमा सवा तीन सौ पन्नों के लगभग की अच्छी किताब होती है। ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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