उनके पिता ब्रह्मसमाजी थे जिनसे उनकी मुलाकात व्यस्क होने के बाद ही हो पाई। कम्युनिस्ट शासित केरल के एक छोटे से गाँव आयेमेनम में वो अपनी माँ के पास, एक सिरियन क्रिस्चियन परिवार में ही पली बढ़ी। अकेली इसाई माँ के पास, पिता के बिना, गाँव में बड़े होना कोई बहुत आसान अनुभव वैसे ही नहीं रहा होगा। इसके ऊपर से उन्हें इसाई जात-पात और छुआछूत का बचपन से ही सामना करना पड़ा। गाँव के अछूत इसाई ‘परावन’ लोगों का गिरजाघर अलग था। वहां अछूत ‘परवान’ पादरी, अछूतों के समुदाय को ईसा मसीह के प्रेम और समानता के सिद्धांत सिखाते।

इसाई बिरादरी के बराबरी के दावों के वाबजूद जातीय भेदभाव वहां नाम में दिखता, एक दुसरे को संबोधित करने के तरीकों में नजर आता, कपड़ों में दिखाई देता, शादियों में होता, भाषा जिसमें बात होती उस से भी समझ में आता था, काम में तो खैर होता ही था। सुज़न अरुंधती रॉय की शिकायत थी कि इन सब के बाद भी स्कूल की किताबों में कभी उन्हें जातिवाद के बारे में पढ़ने को नहीं मिला। काफी बाद में अम्बेडकर साहित्य पढ़ते समय उन्हें इस विषय पर चर्चा देखने को मिली।1

सुज़न अरुंधती रॉय का जन्म शिल्लोंग(मेघालय) में हुआ था, मगर जब वो दो साल की थी तभी तलाक की वजह से उनकी मलयाली सीरियन इसाई माँ और ब्रह्मसमाजी पिता अलग हो गए थे। अपने भाई और माँ के साथ वो कुछ दिन अपने नाना के पास ऊटी (तमिलनाडु) में रहीं और फिर जब उनकी माँ ने केरल में ही स्कूल खोला तो वो उनके साथ आ गई। कोट्टयम और निलगिरी जैसी जगहों पर अपनी स्कूल की पढ़ाई करने के बाद, आज की समाजवादी और प्रगतिशील मानी जाने वाली सुज़न अरुंधती रॉय ने समाजशास्त्र या भूगोल जैसे विषयों की पढाई नहीं की। वो दिल्ली के स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में आर्किटेक्चर पढ़ीं।

इसी कॉलेज में उनकी मुलाकात गेरार्ड डी कुन्हा से हुई। आज वो प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी के लिए “नृत्यग्राम” बनाने के लिए जाने जाते हैं(1990 में सम्मानित), हम्पी के कन्नड़ यूनिवर्सिटी के मुख्य भवन का डिज़ाइन भी उन्होंने ही बनाया था। कर्णाटक के बेल्लारी में जिंदल विद्यानगर या जे.एस.डब्ल्यू. टाउनशिप के लिए उन्हें 1998-99 में प्रधानमंत्री के राष्ट्रिय शहरी योजना का पुरस्कार भी मिला है। गेरार्ड से सुज़न अरुंधती रॉय की शादी के बाद दोनों कुछ दिन दिल्ली में और फिर गोवा में रहे। ये शादी टिकी नहीं, सन 1977 में हुई इस शादी के चार साल बाद ही दोनों का सम्बन्ध-विच्छेद हो गया।2

गोवा से दिल्ली लौटने पर आर्थिक तंगी के इस दौर में सुज़न अरुंधती रॉय फिल्मों और टेलीवीजन के लिए स्क्रीनप्ले भी लिखती रहीं। सन 1984 के इस दौर में उन्होंने कुछ फिल्मों में काम भी किया। इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात प्रदीप कृषन से हुई और दोनों ने शादी कर ली। सुज़न को 1988 में “इन व्हिच एनी गिव्स इट दोज़ वन्स” (In Which Annie Gives It Those Ones ) के लिए बेस्ट स्क्रीनप्ले का नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिला था। एन.डी.टी.वी. के मुखिया प्रणय रॉय की रिश्तेदार सुज़न अरुंधती रॉय के ये कुछ साल आर्थिक तंगी के रहे और उन्होंने गुजारे के लिए एरोबिक्स की ट्रेनिंग भी दी।

सुज़न अरुंधती रॉय को पहली बार प्रसिद्धि तब मिलनी शुरू हुई जब वो शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन के विरोध में उतर आईं। इस फिल्म से उनके विरोध का मुद्दा ये था कि एक जीती जागती औरत के बलात्कार को नाटकीय रूप से शेखर कपूर ने फिल्म में दिखाया था। अपने लेख “द ग्रेट इंडियन रेप ट्रिक” (The Great Indian Rape Trick) में उन्होंने शेखर कपूर को फूलन देवी का शोषण और गलत तरीके से उनके जीवन को प्रदर्शित करने का दोषी ठहराया। यही सन 1994 में उनकी प्रसिद्धि की शुरुआत थी, और शायद यहीं से विरोध के जरिये प्रसिद्धि को तौर-तरीके की तरह सुज़न ने अपना लिया। उनकी दूसरी शादी भी टिकी नहीं।3, 4

इसी दौर में यानि सन 1992 में उन्होंने अपने पहले उपन्यास पर काम करना शुरू कर दिया था, जो कि 1996 में पूरा हो गया। अगले साल जब ये प्रकाशित हुआ तो भारत की आजादी के पचास साल पूरे हुए थे। “गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स” नाम का ये अंग्रेजी उपन्यास तेजी से विश्व बाजार पर छाया और सुज़न अरुंधती रॉय अचानक जाना माना नाम हो गया। कई विदेशी प्रकाशनों में इस उपन्यास की जबरदस्त तारीफ हुई और थोड़े समय बाद इसे बुकर प्राइज से भी नवाज़ा गया।5 इस उपन्यास में यौनिकता के वर्णन के लिए उस दौर के केरल के मुख्यमंत्री इ.के.नयन्नार ने भी इस उपन्यास की जमकर आलोचना की थी और सुज़न अरुंधती रॉय को इसके लिए अश्लीलता का मुकदमा भी झेलना पड़ा था।6

अपने उपन्यास के बाद के दौर में यानि 1997 के बाद से सुज़न अरुंधती रॉय को उनके लेखन के लिए नहीं बल्कि अलग अलग मुद्दों पर उनके विरोध के लिए जाना गया। तब से अब तक के बीस साल में करीब आधा दर्जन से अधिक मुद्दों पर उन्हें जनभावनाओं के खिलाफ वकालत करते पाया गया। सन 1998 में उन्होंने “द एंड ऑफ़ इमेजिनेशन” नाम का लेख लिखा जिसमें उसी दौर में हुए भारत के परमाणु विस्फोटों के बाद भारतीय परमाणु नीति की आलोचना थी। जहाँ सारा देश इसे उपलब्धि मान रहा था, वहीँ “द कास्ट ऑफ़ लिविंग” नाम के अपने लेखों के संग्रह में सुज़न, भारत की परमाणु नीतियों से लेकर पनबिजली योजनाओं तक की बुराई कर रही थी। अपनी अमानुषिक विचारधारा की कैद में पड़ी सुज़न अरुंधती रॉय 2001 में भारतीय संसद पर हमला करने वाले आतंकी को युद्धबंदी और उसकी फांसी को गलत ठहराती दिखीं।7

इन सालों में उनके प्रलाप का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों में पर्यावरण पर लिखने वाले और इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी रहे। गुहा के मुताबिक मैनिकेस्म (एक किस्म की विचारधारा) से ग्रस्त सुज़न चीज़ों को इतना सरल और सीधा बनाना चाहती हैं, जितना वो होता नहीं। मुद्दों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के सुज़न के रवैये से पर्यावरण की बात करने वाले लोगों का बहुत नुकसान हुआ है। रामचंद्र गुहा का मानना था कि नर्मदा बचाओ आन्दोलन के एक मामले की सुनवाई कर रहे सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीशों के प्रति सुज़न का बयान गैरज़िम्मेदार था और ऐसी हरकतों से पर्यावरणविदों की विश्वसनीयता आम जनता में घटती है।8

इतने पर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्होंने जोर्ज बुश के भारत आने का विरोध किया ही होगा,9 इसके अलावा बाकी प्रगतिशीलों की तरह वो इसराइल की विरोधी भी हैं। आम तौर पर, या कहिये कि पाकिस्तानी कलाकारों का मामला हो तो ख़ास तौर पर, जो प्रगतिशील जमात कला-साहित्य-गायन-नृत्य-नाटक सबको देश और धर्म की सीमाओं के परे मानती है और जोर शोर से कलाकारों को आने देने की वकालत करती है, उन्ही के साथ मिलकर सुज़न अरुंधती रॉय इसराइल के राजनैतिक और सांस्कृतिक संस्थानों के बहिष्कार की वकालत कर चुकी हैं। अगस्त 2006 में इसराइल को लेबनोन युद्ध का युद्ध अपराधी घोषित करते एक ख़त पर नॉम चोमस्की और होवार्ड ज़िन्न जैसे प्रगतिशीलों के आलवा उन्होंने भी दस्तखत किये थे।

सन 2007 में एक संस्थान “कुईर्स अंडरमाइनिंग इसरायली टेररिज्म” के झंडे तले सौ से ज्यादा लेखक और कलाकार इकठ्ठा हुए थे। सन फ्रांसिस्को के अंतर्राष्ट्रीय समलैंगिकों के फिल्म महोत्सव में इन सब ने इसराइल से कोई स्पांसरशिप न लेने के लिए दबाव बनाया। सुज़न अरुंधती रॉय भी इन लेखक कलाकारों में शामिल थी, वो भी इसराइल को सांस्कृतिक-कला आयोजन से बाहर रखना चाहती थी।10 इसके बाद के दस साल में सुज़न का विरोध मोटे तौर पर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की ओर ही केन्द्रित रहा है। इस दौरान उन्होंने नक्सलियों को गांधीवादी करार दिया, जिसके लिए उनकी काफी खिल्ली भी उड़ी।11

नक्सलियों, कश्मीरी अलगावादियों के समर्थन, इसराइल और अमेरिका की निंदा जैसे स्थापित प्रगतिशील विरोधों के बीच 2008 में मुंबई पर आतंकवादी हमला हो गया। इस बार मुंबई हमलों के दोषी का मूर्खतापूर्ण बचाव करने पर कर्कश और बेसुरी सुज़न अरुंधती रॉय की बातों को एक दूसरी ख्याति प्राप्त लेखिका तवलीन सिंह ने मानसिक दौरों का प्रलाप कहा।12 विरोध के जरिये ही अपनी पहचान कायम रखने पर अमादा सुज़न अरुंधती रॉय को अगला मौका तब मिला जब अन्ना हजारे का आन्दोलन छिड़ा। पूरा देश जब भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे इस आन्दोलन को नैतिक या सक्रीय समर्थन दे रहा था तो सुज़न अन्ना हजारे के विरोध में उतर आईं। जिन्हें इस आन्दोलन की सफलता पर संदेह था, वो भी इसे गलत नहीं कह रहे थे। सुज़न ने अन्ना हजारे को भी सांप्रदायिक घोषित कर डाला।13

इस पूरे विरोध की वकालत में अगर आप गौर करेंगे तो सुज़न अरुंधती रॉय का लिखने का काम लगातार जारी रहा है। इस पूरे दौर में उन्होंने उपन्यास भले ना लिखे हों, लेकिन आतंकियों तक की वकालत से लेकर देश के टुकड़े करने तक को उनका समर्थन उनकी दर्जन भर किताबों में नजर आया। उनके लेख बड़े प्रकाशनों में मीडिया मुग़ल छापते रहे हैं, उनके भाषण, संवाद भी जारी रहे। लिबरल लॉबी की आर्थिक राजनैतिक शक्ति का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि कश्मीरी अलगाववादी गिलानी, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एस.ए.आर गिलानी (जिसे सबूतों की कमी की वजह से संसद हमले वाले मामले में छोड़ा गया था), कश्मीर यूनिवर्सिटी के कानून के प्रोफेसर शेख शौकत हुसैन, शुद्धब्रत सेनगुप्ता और सुजातो भद्रा जैसों पर से देशद्रोह का मुकदमा भी कांग्रेस सरकार वापिस ले चुकी है।14

इन सब विवादों में उनकी किताबों को कितना फायदा हुआ मालूम नहीं। इस से भाषण और अतिथि वक्ता के तौर पर समारोहों में उन्हें बुलाये जाने के लिए वो कितनी प्रासंगिक बनी रहीं, इस पर टिप्पणी करना भी बेकार ही होगा। हाँ, इस बीच अक्टूबर 2016 में खबर आई कि पेंगुइन इंडिया और हैमिश हैमिलटन यू.के. उनके दुसरे उपन्यास “द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हप्पिनेस” (The Ministry of Utmost Happiness) जून 2017 में प्रकाशित करेंगे।15 मुश्किल से महीने भर बाद आने वाले इस ताजा विवाद को प्रचार के ओछे (अगर घृणित नहीं) तरीके से ज्यादा नहीं माना जा सकता। ये प्रयास सुज़न अरुंधती रॉय को बी ग्रेड हिंदी सिनेमा की उन तरीकों के स्तर पर ले आता है जिनके पास परोसने के लिए कला नहीं होती। जिस्म की नुमाइश और सस्ते विवादों को साहित्य में उतारने के लिए अकेले इस एक उपन्यास की चमत्कारी लेखिका को ही नहीं, उनके समर्थन में एक चमत्कार पर संत करार दे रहे, और जायज विरोध के बदले चुप्पी साध रहे प्रगतिशील जमात को भी बराबर का दोषी माना जाना चाहिए।
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1. सुज़न अरुंधती रॉय के लेख “The Doctor and the Saint: Ambedkar, Gandhi and the Battle Against Caste”. (Caravan. March 2014) से
2. सिद्धार्थ देब के न्यू यॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख, “Arundhati Roy, the Not-So-Reluctant Renegade से
3. “Arundhati Roy, Author-Activist” , @ India Today
4. सुज़न अरुंधती रॉय का लेख, The Great Indian Rape-Trick Archived @ SAWNET -The South Asian Women’s NETwork
5. “The scene is set for the Booker battle”. BBC News. 24 September 1998
6. एलिसबेथ बुमिलर के 29 जुलाई 1997 के लेख A Novelist Beginning with a Bang. New York Times
7. सुज़न अरुंधती रॉय के द गार्डियन में प्रकाशित लेख, The hanging of Afzal Guru is a stain on India’s democracy से
8. रामचंद्र गुहा के 17 दिसम्बर 2000 को द हिन्दू में प्रकाशित, “Perils of extremism” से
9. अरुंधती रॉय के 28 फ़रवरी 2006 को द हिन्दू में प्रकाशित आलेख, “George Bush go home” से
10. मैथ्यू एस. बज्को के 17 मई 2007 में द बे एरिया रिपोर्टर में प्रकाशित, “Political Notebook: Queer activists reel over Israel, Frameline ties” से
11. “Walking With The Comrades” मार्च 2010 में आउटलुक की कवर स्टोरी
12. तवलीन सिंह के द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित आलेख “The Real Enemies”. से
13. सुज़न अरुंधती रॉय के 21 जून 2011 को द हिन्दू में प्रकाशित आलेख, I’d rather not be Anna से
14. Human Rights Watch में प्रकाशित खबर, “India: Drop Sedition Charges Against Cartoonist”.
15. All about Arundhati Roy’s second novel, The Ministry of Utmost Happiness

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

3 COMMENTS

    • जरूर मान सकते हैं, बस मान लेने में समस्या ये है कि ये जो लिखा हुआ है, वो विचार या मंतव्य नहीं जो किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लिखा जा सके | ये शुद्ध तथ्य हैं, कौन सा सन्दर्भ कहाँ से लिया गया है वो नंबर और फुटनोट के जरिये दर्शाया गया है |

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