वो जो प्रेरणा देने वाले किस्से इधर उधर से, कभी व्हाट्स एप्प तो कभी ईमेल में फॉरवर्ड होकर आते रहते हैं उन्हीं में से एक किस्सा था लोहे और सोने का। कुछ महीने पहले पढ़ा था। इसमें किसी तरह से एक सुनार की दुकान के पास ही एक लुहार की दुकान होती है। पता नहीं कैसे पड़ोस की दुकानों में होने की वजह से सोने को लुहार की दुकान से लोहे के पीटे जाने की जोरदार आवाज़ आती थी। लेकिन लोहा सुनार की दुकान से हल्की फुल्की सी टन्न टन्न ही सुन पाता था।

 

एक दिन जब लोहे और सोने की मुलाकात हुई तो सोने ने लोहे से कहा, मित्र धातु तो तुम भी हो मैं भी हूँ ! गहने बनाने के लिए मुझे भी गर्म कर के पीटा जाता है, तुम्हें भी कुछ ना कुछ बनाने के लिए गर्म कर के पीटते हैं। फिर ऐसा क्यों कि जब तुम पिटते हो तो इतने जोर जोर की आवाज़ आती है ? मैं पिटता हूँ तो इतना शोर तो नहीं होता। लोहा मुस्कुराया, बोला भाई तुम्हें सोने की हथौड़ी से नहीं पीटा जाता ना ! लोहे की हथौड़ी से पीटते हैं। जब अपने ही हथियारों से खुद पर ही चोट होती है तो दर्द भी ज्यादा होता है। इसलिए मैं पिटता हूँ तो ज्यादा चीखता हूँ, तुम कम !

 

अब ये कहानी तो अजीब सी है। मतलब लोहा और सोना आपस में बातें कैसे कर सकते हैं ? लेकिन कहानी जो सन्देश देती है वो बड़ा ही साफ़ है। अपनों की पहुंचाई चोट, अपने बनाये हथियारों से हुआ दर्द हमेशा ज्यादा होता है।
इसे अगर समझना हो तो एक अंग्रेजी टर्म समझिये। एक चीज़ होती थी Unperson। वामपंथियों में किसी का जब विचारधारा से मोहभंग हो जाता था तो उसके ही गिरोह के लोग अक्सर उसकी हत्या कर डालते थे। किसी भी कम्युनिस्ट शोषित क्षेत्र में ऐसे कई लोगों के उदाहरण दिख जायेंगे। अपने ही भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में एक कानू सान्याल हुआ करते थे। वो नक्सलवाद के जनक माने जाते हैं लेकिन बाद में Unperson हो गए। कोई तथाकथित वामपंथी ना तो उनका नाम लेता है, ना ही उन से जान पहचान जैसी कोई बात कभी कबूलेगा।

 

ना नाम लेना है, ना दोस्ती, जान पहचान रखनी है, कभी सामने पड़ भी जाए तो पुराने साथी भी पहचानने से इनकार कर दें तो जाहिर है आदमी जीते जी ही मर जायेगा। ऐसे में सोचिये कि जिसे Unperson किया गया है उसे कितना दर्द होता होगा ? कल तक जहाँ सब कामरेड-साथी कहकर सर आँखों पर बिठाते थे वहां बिन-बुलाया मेहमान हो जाना सच में दुखद होता होगा।

 

कुछ आवारा देशद्रोही नारा लगाने वाले लोगों के बेल पर छूटने पर कहीं कोई शोर जो नहीं सुनाई दे रहा ना, वही Unperson करना होता है। उनके अपने ही हथियार की चोट है तो जाहिर है दर्द भी ज्यादा हो रहा होगा। जो न्यूज़ की हेडलाइन नहीं बनने का दर्द है वो कहीं कहीं रिसता दिखाई दे रहा है।

The Commissar Vanishes
The Commissar Vanishes by David King

(तस्वीर डेविड किंग की किताब The Commissar Vanishes का मुखपृष्ट है। फोटोशॉप के अविष्कार से काफी पहले से वामपंथी तस्वीरों से छेड़-छाड़ करते रहे हैं। स्टालिन के ज़माने में कैसे वामपंथी तस्वीरों के साथ “फोटोशॉप” किया करते थे उसपर लिखी गई अच्छी किताब है।)

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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