स्पॉटलाइट फिल्म की कहानी 1976 के एक दृश्य से शुरू होती है जिसमें एक कैथोलिक प्रीस्ट को बच्चों के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया है | उधर पुलिसकर्मी घटना पर बात करते दिखते हैं तो दूसरी तरफ चर्च का एक बड़ा अधिकारी पीड़ित बच्चे की माँ को समझाता बुझाता दिखाया जाता है | इस दृश्य के बाद फिल्म अचानक काफी आगे आ जाती है | अब फिल्म करीब पच्चीस साल बाद 2001 में आ जाती है | यहाँ एक अखबार द बोस्टन ग्लोब का दफ्तर दिखाया जाता है जहाँ एक नया संपादक आया है |

 

Spotlight Movie Poster

इस अख़बार के संवाददाताओं में एक स्पॉटलाइट नाम की टीम होती है | ये ख़ास किस्म की कहानियों पर काम करने वाले लोग होते हैं | ऐसी कहानी जिसके तथ्यों को जानने के लिए कई लोगों से मिलना और लम्बी रिसर्च करनी पड़ती थी, स्पॉटलाइट सिर्फ उन्हीं कहानियों पर काम करती थी | नया संपादक एक ऐसे वकील की कहानी पढ़ लेता है जो कहता था कि कार्डिनल बर्नार्ड लॉ (जो बोस्टन का आर्चबिशप था) वो अच्छी तरह जानता था कि प्रीस्ट जॉन ग्योघन कई बच्चों के यौन शोषण में लिप्त था |

 

अब ये नया संपादक स्पॉटलाइट की टीम को इस कहानी की छान-बीन करने भेजता है | शुरू में स्पॉटलाइट की टीम के लोगों को लगता है कि वो एक ऐसे पादरी का पीछा कर रहे हैं, जिसे यौन शोषण करने की वजह से कई बार इधर से उधर भगाया गया है | लेकिन थोड़े ही दिनों में उन्हें समझ आ जाता है कि वो पूरे इलाके में यौन शोषण करने वाले कई पादरियों और उनको बचाने की कोशिश में लगे बोस्टन चर्च के उच्चाधिकारियों की करतूतों में तांक-झाँक कर रहे हैं | इतने बड़े स्तर पर चर्च द्वारा बच्चों का यौन शोषण सदमे वाली खबर थी |

 

थोड़ी जांच परख में ही उन्हें पता चल जाता है कि ये दो-चार घटनाओं की बात नहीं | स्टेटिस्टिक्स (सांख्यकी) करीब नब्बे ऐसे बच्चों का यौन शोषण करने शोषण करने की बात कर रही थी | एक भूतपूर्व पादरी भी इस की गवाही दे देता है | अपनी खोज बीन में स्पॉटलाइट टीम दस बीस नहीं बल्कि 87 यौन शोषण करने वाले पादरियों का नाम ढूंढ निकालती है | इसी बीच ट्विन टावर पर हमलों की वजह से ये तलाश कुछ रुक जाती है, लेकिन जब स्पॉटलाइट टीम और संपादक को पता चलता है कि आर्चबिशप को इनका पता था लेकिन उसने खबर को दबाया है तो तलाश का काम फिर से शुरू होता है |

 

उन कागज़ात की तलाश शुरू होती है जिसमें ऐसे गिरे हुए पादरियों की काली करतूतों को उजागर किया गया था | कागज़ात की मांग का मुकदमा भी स्पॉटलाइट की टीम जीत जाती है इस तरह 2002 में फिर से इस जघन्य अपराध का पीछा किया जाता है | जब खबर प्रकाशित करने लायक होती है तो स्पॉटलाइट की टीम का प्रमुख कबूलता है कि उसे 1993 में ही यौन शोषण में लिप्त 20 पादरियों की लिस्ट मिल गई थी | उस जमाने में उसकी हिम्मत नहीं पड़ी ऐसी खबर पर पड़ताल करने की |

 

अब सारे सबूतों के साथ बोस्टन ग्लोब ये खबर छापता है | खबर छपते ही सनसनी फ़ैल जाती है, अखबार के दफ्तर में फोन पर फोन आने लगते हैं | कई पीड़ित जिन्होंने अब तक डर के मारे चुप्पी साध रखी थी वो भी सामने आ जाते हैं | दुनियां भर में जहाँ जहाँ उस दौर के बच्चों के चर्च द्वारा यौन शोषण की ख़बरें आई थी, उन सभी जगहों के नक़्शे पर फिल्म ख़त्म होती है | सन 2016 में ऑस्कर जीतने वाली ये फिल्म अपने कसे हुए स्क्रिप्ट के लिए जानी जाती है | इस फिल्म को वीनस और टोरंटो फिल्म उत्सवों में भी सम्मानित किया गया है |

 

जिस सत्य घटना पर ये फिल्म आधारित है उसके लिए द ग्लोब अखबार को 2003 में सामाजिक सेवा के लिए पुल्तिज़र पुरस्कार से नवाज़ा गया था | कार्डिनल लॉ जो उस समय आर्चबिशप थे और जिन्होंने करीब सौ पादरियों के द्वारा किये यौन शोषण की खबर को दबाये रखा उन्हें बाद में वहां से हटा लिया गया | उन्हें दुनियां के सबसे बड़े चर्चों में से एक रोम के बासिलिका डी सेंटा मारिया मग्गिओरे में पदासीन किया गया |

 

इस फिल्म की कहानी, नहीं निर्मित की गई फिल्मों की ब्लैक लिस्ट पर 2013 में थी | कहानी लिखने वालों का कहना था कि उनका इरादा कोई इसाई मजहब में लोगों की आस्था डिगाने का नहीं था | वो न्यूज़रूम की ताकत की कहानी लिख रहे थे | कई इसाई संस्थानों ने माना कि फिल्म की कहानी सही है, ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें आम तौर पर दबाया छुपाया जाता रहा है | वेटिकन का कहना है कि इसाई पादरी एक दुसरे को ये फिल्म देखने की सलाह देते हैं |

 

ऑस्कर जीतने वाली फिल्मों का नाम अक्सर लोग जानते हैं, सुनते भी हैं | अगर आपने अब तक स्पॉटलाइट का नाम नहीं सुना था तो सोचिये कि क्यों एक अच्छी फिल्म का नाम नहीं सुना | ढूँढने की कोशिश भी कीजियेगा, फिर आसानी से मिलती क्यों नहीं वो भी सोचिये |

यौन शोषण के अपराधी पादरियों को चर्च की माफ़ी (देसी सी.एन.एन. पर)

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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  1. आनंद भाई हमेशा की तरह पड़ताल करती धागा धागा खोलती पोस्ट । धन्यवाद

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