सोशल मीडिया 2014 के बाद के दौर में संदेशों के प्रचार-प्रसार के सबसे सशक्त माध्यम के तौर पर उभर आया है। अन्ना आन्दोलन में इसकी भूमिका हो, निर्भया आन्दोलन के जरिये बलात्कार कानून बदलवाने में, उसके थोड़े ही बाद के दिल्ली विधानसभा चुनावों में हो या उसी दौर के लोकसभा चुनावों में जब मोदी जी ने खुद अपनी पार्टी के उम्मीदवारों से सोशल मीडिया पर सक्रीय होने कहा, इसकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री अभी हाल में भी अपने सांसदों से सोशल मीडिया पर ध्यान देने कह चुके हैं।

 

राजनैतिक पार्टियों के पास अब अपने आई.टी. सेल हैं जो सोशल मीडिया पर अपने पक्ष की हवा बनाने का प्रयास करते हैं। करीब करीब हर नामी कम्पनी का अपना सोशल मीडिया पेज, अपना हैंडल है। सोशल मीडिया के योगदान से इनकार करने वालों की भी कमी नहीं है, वो किसी प्रशांत किशोर जैसे से कुछ नहीं होता, जमीनी काम होना चाहिए जैसे दावे करते दिखेंगे। हालाँकि फिर यही लोग उस विडियो को भी शेयर करते दिखते हैं जिसमें एक पत्रकार से बचकर भागता हुआ राहुल गांधी का सोशल मीडिया मेनेजर नजर आ रहा है।

 

जब दुनियां चाँद पर पहुँच रही हो तो पीपल के नीचे बैठे रहने पर तुले लोगों को, मवानी की मीटिंग में राहुल गाँधी के सोशल मीडिया मेनेजर की मौजूदगी के मायने हज़म करने में समय तो लगेगा ही। बदलाव आसानी से हजम नहीं होता, कई बार पसंद भी नहीं आता। युवा तो इसके साथ परिवर्तित होते भी हैं और परिवर्तन लाते भी हैं, लेकिन बुजुर्गों के लिए कई बार कठिन समस्या हो जाती है। सेकुलरिज्म के स्वर्ण काल (1980 के दौर) में बड़े हुए लोगों के लिए भगवद्गीता के अपरिहार्य परिवर्तन को स्वीकारना मुश्किल भी होता है।

 

किसी भी प्रचार की मुहीम, चाहे वो राजनैतिक हो या व्यापारिक, को देखकर सोशल मीडिया के बारे में सीखा जा सकता है। जब आप सोशल मीडिया की रणनीति को गौर से देखेंगे तो ये कई चरणों में की जाने वाली प्रक्रिया है। इसके रणनीतिकार ऐसी कुछ ख़ास चीज़ें बार बार दोहराते दिखेंगे :

 

1. अपने लक्ष्य स्पष्ट रखिये :

“आपका लक्ष्य क्या है?” यही आपकी पूरी रणनीति का आधार है। लक्ष्य से थोड़ा भी भटकना, या लक्ष्य का स्पष्ट ना होना नुकसानदेह सिद्ध होगा। आपकी दिशा, आपके उद्देश्य, और उनके आधार पर आपका रोज का सोशल मीडिया की पोस्ट, तस्वीर, विडिओ सब कुछ आपके लक्ष्य पर निर्भर है। जो लक्ष्य पूर्ती में सहायक नहीं वो समय और शायद पैसे की भी बर्बादी है। क्या करना है, और क्या नहीं करना इसे साफ़ रखने के लिए आपके पास स्पष्ट रूप से परिभाषित लक्ष्य होने चाहिए।

 

2. अपने पाठक, श्रोताओं और दर्शक वर्ग से आपका परिचय

लक्ष्य के निर्धारण के बाद ये सबसे महत्वपूर्ण है। आपके साक्षी के बारे में आप क्या जानते हैं? उसकी उम्र, पसंद-नापसंद, रहने की जगह, आय और उसके स्रोत, ऐसी कई चीज़ों पर उसका चुनाव निर्भर करेगा। वो क्या पढ़ते हैं, कैसी फ़िल्में देखते हैं, किन जगहों पर आते-जाते हैं, समाज कैसा है और उनकी पीड़ा उनकी समस्याएँ क्या हैं ? ये सारी चीज़ें पता हो तभी आप उसके लिए कोई सामग्री (content) तैयार कर पायेंगे।

 

3. सही माध्यम चुनिए

सोशल मीडिया पर एक नहीं कई जरिये हैं। लम्बे लेखों का ब्लॉग है तो दोतरफा संवाद का फेसबुक भी है, सिर्फ विडियो दिखाने वाले यू-ट्यूब हैं तो एक-दो वाक्य में बात पूरी करने के लिए ट्विटर भी है। आपके लिए कौन सा माध्यम सबसे प्रभावी होगा और क्या आपके पास जो सामग्री है उस से आपके माध्यम में काम हो सकता है ? ये आपको अपनी रणनीति में शामिल करना चाहिए।

 

4. सामग्री कहीं इकठ्ठा रखना शुरू कीजिये

अब जब आपको उद्देश्य, माध्यम, दर्शक-साक्षी पता हैं, सामग्री भी उस हिसाब से तय होने लगी है तो इस सामग्री (content) को कहीं इकठ्ठा रखना शुरू कीजिये। उदाहरण के तौर पर कई लेखों के लिंक एक गूगल शीट में रखे जा सकते हैं (जैसे मैंने रखे हैं)। आप दुसरे तरीके भी चुन सकते हैं, अपनी सुविधा और रूचि के हिसाब से चुनिए। जरूरत पड़ने पर अपने ही पुराने लेख या विडियो ढूँढने में आपका ज्यादा समय खर्च ना हो इसके लिए डेटाबेस तैयार किया जाता है।

 

5. हैशटैग और कीवर्ड पहचानना सीखिए

ये काम थोड़ा शोध और थोड़ी मेहनत का है, लेकिन लम्बे समय में इसके फायदे होते हैं। एक ही विषय को जब आप एक ही हैशटैग के साथ पेश करते हैं तो आपका पाठक वर्ग भी उसे पहचानने लगता है। उसी को जब और लोग भी इस्तेमाल करते हैं तो आपके चुने मुद्दे, आपके विषय पर ज्यादा चर्चा होती है। जो हैशटैग प्रचलन में हों, वो अपने साथ आपका भी प्रचार कर देते हैं। उन हैशटैग्स को ढूँढने पर लोग उस मुद्दे पर आपकी राय भी पढ़ेंगे और इस से आपका भी प्रचार होगा।

 

6. जैसे हर काम के लिए सारिणी होती है, सोशल मीडिया की भी समय-सारिणी रखिये

थोड़ा सा ध्यान देते ही आपको दिख जाएगा कि सोशल मीडिया पर कुछ ख़ास समय पर किये पोस्ट ज्यादा लोग पढ़ते हैं। सुबह नौ बजे की पोस्ट ज्यादा लोग पढ़ पायेंगे और रात दो बजे सब सो रहे होंगे तो देखेगा कौन? इतना सा समझने के लिए कोई राकेट साइंस पढ़ने की भी जरूरत नहीं है। अगर आपका रोज का एक नियत समय है तो आपके रोज के पाठक को उस समय आपकी पोस्ट ना दिखने पर वो अलग से आपकी वाल पर आएगा, कुछ वैसे ही जैसे सुबह नियत समय पर अखबार ना आने पर होता है।

आपकी सोशल मीडिया वाल पर आने वाले लोग किस समय आते हैं उसका ध्यान रखिये तो आपकी पहुँच भी बढ़ेगी। समाचार माध्यमों में जैसे प्राइम टाइम होता है और उसका विषय उसी रोज की बड़ी खबर से अलग भी हो सकता है वैसे ही एक नियत समय की पोस्ट पर आप अपने मनपसंद विषय की चर्चा भी कर सकते हैं। किसी मुद्दे को शुरू करने के लिए ये एक अच्छा तरीका हो सकता है।

 

7. सोशल मीडिया टूल्स का इस्तेमाल

समय बचाने के लिए कई सोशल मीडिया टूल भी आते हैं। जैसे हूटसूट या अगोरापल्स एक नियत समय पर पोस्ट कर देने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। कुछ मुफ्त में ट्रायल के लिए हैं, उनसे चलाना सीखा जा सकता है और अगर बाद में आर्थिक स्रोत हों तो उनके इस्तेमाल पर भी विचार किया जा सकता है।

बहुत ज्यादा इस्तेमाल ना भी करना हो तो Bit.ly जो यू.आर.एल. को छोटा करने में काम आते हैं उनका इस्तेमाल करना चाहिए। फेसबुक या ब्लॉग के लम्बे यू.आर.एल. को इसकी मदद से छोटा किया जा सकता है। मेरे उदाहरण वाले गूगल शीट में आपको कई यू.आर.एल. ऐसे टूल्स से छोटे किये हुए दिखेंगे।

8. डाटा एनालिसिस भी करना होगा

आपके पोस्ट में कौन से विषय चले, कौन से कम प्रचलित हुए? एक ही जैसी मिलती जुलती सी चीज़ क्या अलग अलग माध्यमों पर (जो फेसबुक पर चला वही यू-ट्यूब पर चलेगा?) कैसे काम करती है? कौन से सामाजिक, या उस समय चर्चा में रहे मुद्दों पर आपके लिखे-कहे को लोगों ने ज्यादा पसंद किया? शिक्षा पर, राजनीती पर, परिवार पर, राष्ट्रवाद पर, किताबों पर, कौन से मुद्दों पर लोग आपकी बात पर ज्यादा चर्चा करते हैं? किस समय में, सप्ताह के कौन से दिन, छुट्टियों पर या त्योहारों में, कब लोग आपकी वाल पर ज्यादा आते हैं?

ये सब डाटा है और इसकी जांच से आप अपनी पहुँच बढ़ा सकते हैं।

 

9. अब दुकान खोली है तो प्रतिद्वंदी को भी तो देखना होगा!

जरूरी नहीं कि हर गलती खुद कर के सीखा जाए, कभी कभी दूसरों को देख कर भी सीखा जाता है। अपने प्रतिद्वंदी, अपने ही जैसा लिखने वालों, अपने क्षेत्र के दुसरे सभी लोगों पर भी नजर बनाए रखिये। दूसरों ने क्या अच्छा किया जिसकी नक़ल आप भी कर सकते हैं? उन्होंने कौन सी गलती की जिसे आपको हरगिज़ नहीं दोहरानी ये दोनों चीज़ें सीखिए।

 

इन सब के अलावा एक जैसे रंग, एक जैसी तस्वीरों, एक जैसे किसी लोगो (Logo) के जरिये अपनी एक अलग पहचान बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। ये सब पर्सनल ब्रांडिंग का मुद्दा होगा और उनपर फिर कभी अलग से चर्चा करनी होगी। उम्मीद है इतने पर अपने सोशल मीडिया को सिर्फ मनोरंजन के साधन से एक कदम आगे बढ़ाने में तो आपकी मदद हो ही जायेगी।

A Hindi adaptation of Dhariana Lozano’s blog.

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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