किसी नेताजी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में क्या लिख के रखा है इससे क्या फर्क पड़ता है? समाचारों में उन्हें देखने, सुनने, पढ़ने के बाद कोई सोशल मीडिया पर भी उनकी ही बात क्यों पढ़ेगा? हाँ लेकिन अगर नेताजी का लिखा आपके किसी मित्र-रिश्तेदार ने अपनी वाल पर शेयर कर रखा हो तो और बात है। उस स्थिति में हो सकता है आप शुरूआती दो चार लाइन पढ़ लें। सोशल मीडिया पर लोग ज्यादा समय के लिए किसी एक चीज़ पर ध्यान भी नहीं देते हैं। अटेंशन स्पैन बहुत कम (करीब 45 सेकंड) भी होगा जरूरी नहीं।

 

इतने कम समय तक आपका ध्यान अगर किसी पोस्ट पर हो तो मार्केटिंग वालों के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है। अगर किसी राजनैतिक दल या किसी कंपनी का सन्देश आम लोगों तक पहुँचाना हो तो उसे ये सुनिश्चित करना होगा कि लोग पेज या हैंडल के सन्देश को शेयर / रीट्वीट कर रहे हों। इस साल की शुरुआत में जब फेसबुक ने अपने अल्गोरिद्म में बदलावों की घोषणा की तो बातें और भी बदल गयीं। परिवर्तन आ चुका है, पोस्ट अब उतनी तेजी से नहीं फैलती, ये कई धुरंधर, मठाधीश भी महसूस कर चुके होंगे।

What happens to brands on Social Media?

(ग्राफ SproutSocial की रिसर्च से साभार)

पिछले साल उमंग बेदी ने जब फेसबुक के भारतीय एम.डी. की पोजीशन छोड़ी थी तो संदीप भूषण तात्कालिक एम.डी. बनाए गए थे। तब से अब तक ये जगह खाली थी और भारतीय उपमहाद्वीप (जिसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा में अज्ञात कारणों से साउथ एशिया कहने का रिवाज़ है) में अल्गोरिद्म के बदलाव सम्बन्धी फैसले से भी जुकरबर्ग ने ही एक पोस्ट से अवगत करवाया था। अजित मोहन जो कोच्ची में जन्मे और व्हार्टन स्कूल से एमबीए हैं, उनका फेसबुक इंडिया का प्रमुख होना और भी कई अघोषित बदलावों की तरफ इशारा करता है।

 

अघोषित बदलाव क्या होते हैं? जैसे एक तो ये है कि वो यू.पी.ए. सरकार (कांग्रेस वाली) के दौर में सरकारी काम कर चुके हैं और उनके कांग्रेस के नेताओं के लिए काम करने वालों से अच्छी पहचान है। उनका पूर्व का अनुभव हॉटस्टार का है जो कि एक इन्टरनेट टीवी चैनल जैसा काम करने वाली कंपनी है। पुराने दौर में वो मैक-किन्से के लिए काम कर चुके हैं जहाँ उनका अनुभव बच्चों के मनोरंजन वाली, महिलाओं के कपड़े और जूते बनाने वाली, और ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी कंपनियों से काफी रहा है। इनके अलावा वो स्त्री अधिकारों जैसे मुद्दों से जुड़ी गैर सरकारी संस्थाओं के लिए भी काम कर चुके हैं।

 

इसपर सीधा पहुँचने से पहले पहले हम एक नजर इसपर मार लें कि जुकरबर्ग ने अल्गोरिद्म में बदलाव लाने की बात करते समय क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि फेसबुक अब सिर्फ समय बिताया देखने के बदले कितना अच्छा समय बिताया, इसपर गौर करेगा। फेसबुक पर सिर्फ टाइम पास कर रहे लोगों में उसकी रूचि नहीं, कमेंट, लाइक, शेयर कुछ कर रहे हों, तभी वो ध्यान देगा। यानी “मैं तो लाइक करना भूल जाता हूँ जी”, “पढ़ा तो मगर शेयर करना याद नहीं रहा जी”, “जल्दी-जल्दी में देख लिया था जी” जैसी सोच वाले अपनेआप ही अपनी राजनैतिक, व्यावसायिक पसंद-नापसंद का नुकसान करते जायेंगे।

 

“क्वालिटी टाइम” के अलावा फेसबुक अब सिर्फ “इंटरेक्शन” पर नहीं, “मीनिंगफुल इंटरेक्शन” पर भी जोर देगा। इस “मीनिंगफुल इंटरेक्शन” यानी सार्थक संवाद से उसका मतलब होता है कि सिर्फ लाइक किया या पूरा विडियो देखा? लम्बे लेख को “सी मोर” वाला बटन दबाकर देखा क्या? या फिर शेयर किया, कमेंट किया, किसी और के कमेंट के जवाब में कुछ लिखा जैसी चीज़ों को उसका सॉफ्टवेयर जोड़ने लगेगा। एक ख़ास विचारधारा के मासूम जिनमें से कुछ पूछते हैं कि “ये पुस्तक हिन्दी में आती है क्या?” और दूसरे तो किताबें पढ़ने से पूरा परहेज रखते हैं, उनका अपनेआप ही इन बदलावों से नुकसान हो जाएगा।

 

कई सॉफ्टवेयर ए.आई. (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) पर काम कर रहे होते हैं, यानि एक ही जैसी चीज़ जितनी बार दोहराई जायेगी उतना वो उससे सीख लेंगे। इनकी मदद मिलते ही फेसबुक का सॉफ्टवेयर कुछ ख़ास लोगों के पोस्ट जिनमें गालियाँ हों, कुछ विशेष समुदायों के नाम हों, या एक जर्मनी में पैदा हुई, असफल हो चुकी, हिंसक, स्त्रीविरोधी विचारधारा का विरोध हो, उन सब को दबा देगा। जैसे भारतीय संविधान के मुताबिक अगर आप “समाजवादी” नहीं हैं तो चुनाव लड़ने के लिए अपनी पार्टी नहीं बना सकते, बिलकुल वैसे ही आप सनातन के जितने पास होंगे, आपकी पोस्ट की पहुँच उतनी घटा दी गयी है।

 

सोशल मीडिया के इस्तेमाल को शुरू करने में एक ऐसी पार्टी के लोगों का योगदान रहा जो काफी बाद में, आजाद भारत में बनी थी। इसकी तुलना में फिरंगियों की बनाई हुई राजनैतिक पार्टी काफी पिछड़ी रही। मोदी-योगी जैसे भाजपा के दो-चार लोगों ने सोशल मीडिया का अपने पक्ष में जमकर इस्तेमाल किया लेकिन आम भाजपाई अपने डीएनए में मौजूद निकम्मेपन से कभी उबर नहीं पाया। ये रेस बिलकुल कछुवे खरगोश के रेस जैसी ही थी और खरगोश सो भी गया था। बस हुआ यूँ कि खरगोश रेस ख़त्म होने के बाद नहीं जागा। वो कुछ पहले जागा है और उसने दौड़ लगा दी है। जो आदमी पहले बच्चों के लिए मनोरंजन के कार्यक्रम, स्त्रियों के कपड़े-जूते या युवाओं को भाने वाले ऑनलाइन गेम्स में काम कर चुका हो, वो कहाँ निशाना दाग सकता है ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

 

बाकी शतरंज में जो टेढ़ा-टेढ़ा चलकर मार करने वाला फर्जी या ऊंट होता है उसे अंग्रेजी में बिशप कहते हैं। उनका बिशप अपने मोर्चे पर फिट कर दिया गया है, अब आपकी बारी। अपनी चाल सोच लीजिये, शतरंज में सोचने के समय पर कोई पाबन्दी नहीं होती।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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