प्यार का उल्टा क्या होगा ? नफरत ? किसी की कामयाबी पर आप खुश होते हैं तो शायद प्रेम है, इसका उल्टा क्या होगा पूछने पर शायद आप कहेंगे, उसकी मौत की खबर पर खुश होना, या हार पर ताली बजाना। लेकिन अगर ना तो उसके जीतने पर आपको कोई ख़ुशी हो, ना हारने पर कोई अफ़सोस तब वाली उदासीनता के भाव को क्या कहेंगे ? दरअसल प्रेम का उल्टा नफरत नहीं होता, जब तक आपपर प्रभाव पड़ रहा है, चाहे अच्छा या बुरा, किसी ना किसी सम्बन्ध का धागा तो है ही, ये धागा जब टूट जाए, आप तटस्थ हो जाएँ तब आप प्रेम के उल्टी वाली स्थिति में हैं। जब धर्म में ये प्रेम का पाश्चात्य (रिलिजन-मजहब) अर्थों से अलग वाला अर्थ समझाया जाता है तो दूर से देखने वालों को समझने में दिक्कत हो सकती है।

बंधन और आत्मसमर्पण को रिलिजन और मजहब मानने वाली कौमों को गाँधी के “पाप से घृणा करो, पापी से नहीं” वाले वक्तव्य क्रन्तिकारी लगे। दूसरी तरफ भारतीय लोगों के लिए ये आम बात थी, क्योंकि भारतीय देवी देवता तो पूज्य होते ही हैं, राक्षस भी कोई घृणित नहीं होता। किसी समुदाय विशेष कि गुलाम बनाने और साम्राज्यवादी मानसिकता से घृणा भले हो, उस समुदाय से नफरत नहीं होती। धर्म की ऐसी अवधारणा को समझाना जैसे मुश्किल होता है वैसा भारत के सभी धर्मों को समझाने में होगा। रिलिजन के बंधन वाले या फिर मजहब के हथियार डाल, लड़ना छोड़ कर आत्मसमर्पण करने की अवधारणा यहाँ धर्म में होती ही नहीं है। इन चीज़ों की समझ बढ़ाने के लिए किताबों की जरूरत थी, किस्मत से ऐसी किताबें भारत में लिखी ही नहीं गई।

हर्मन हेस (Hermann Hesse) जर्मनी में जन्मे और बाद में स्विस नागरिक थे जो मिशनरी, लेखकों और विद्वानों के परिवार से थे। उनका जन्म 1877 में हुआ था और एशिया की दार्शनिक धाराओं से उनका अच्छा परिचय था। उन्हें उनकी दो किताबों के लिए ख़ास तौर पर जाना जाता है। एक थी सिद्धार्थ (जो 1922 में आई थी) और दूसरी जर्नी टू द ईस्ट (जो 1932 में आई थी )। उनकी किताब सिद्धार्थ को कई बार एक रिवर्स मिशनरी एक्टिविटी भी कहा जाता है। शुरूआती दौर में पूर्व की विचारधाराओं को पश्चिम में ले जाने में इस किताब का बड़ा योगदान रहा। इस किताब की खासियत इसकी सरलता है, बिलकुल साधारण सी कहानी में एक चरित्र के जीवन के जरिये उन्होंने वो सवाल सामने रख दिए हैं जिनके लिए भारतीय (भारत में जन्मे) धर्मों को जाना जाता है। ये अब्राह्मिक मजहबों से प्रभावित दर्शन के लिए बिलकुल नए सवाल थे।

इस किताब के जरूरी सवालों में से एक है कि इस किताब का मुख्य किरदार किस बात से प्रेरित है ? क्या वो अपनी मौजूदा स्थिति से असंतुष्ट है इसलिए उस से घृणा में आगे बढ़ रहा है, या फिर वो अपने स्वप्न के सौन्दर्य से प्रेरित है, प्रेम में कुछ पाने के लिए जा रहा है क्या ? सिद्धार्थ अपने पिता और अन्य ब्राह्मणों के कर्मकांडों से इनकार कर देता अहि, वो समन सन्यासियों के शरीर को तपाने-गलाने के तरीकों से भी इनकार कर देता है। वो गौतम (बुद्ध) का अनुयायी हो जाने से भी इनकार करता है; अपनी पत्नी-पुत्र के मोह को, पिता होने की जिम्मेदारियों को भी छोड़ देता है; सांसारिक सुखों और धन-मान के मोह को भी त्याग देता है। अलग अलग स्तर पर वो बदलावों को ऐसा ही मानता है जैसे सांप अपने शरीर की केंचुली बदलता है।

उपन्यास के बारह अध्यायों में में से हरेक दो हिस्से में बंटा हुआ है, हरेक में एक कठिन परिस्थिति जन्म लेती है और हरेक में एक नया मार्ग भी मिलता जाता है। आगे उपन्यास में सिद्धार्थ की मुलाकात गौतम नाम के काल्पनिक चरित्र से होती है जो बुद्ध का प्रतिरूप है, यहाँ ध्यान रखने लायक ये भी है कि जिन्हें बाद में इतिहास गौतम बुद्ध के नाम से जानने लगा, उन्हें जन्म होने पर सिद्धार्थ नाम दिया गया था। जैसे गौतम बुद्ध अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र को छोड़कर, राज-पाट त्याग के निकले थे उसी तरह इस उपन्यास का काल्पनिक चरित्र सिद्धार्थ भी निकलता है। सिद्धि को अर्थ यानि असली मतलब या धन समझने वाले के लिए संस्कृत हिंदी का शब्द सिद्धार्थ इस्तेमाल किया जाएगा ये भी ध्यान रखने लायक है। लेखक एक गुरु और उसके शिष्य को सिखाने के तरीकों पर भी रौशनी डालते हैं। हर्मन हेस अपनी इस किताब को वास्तविक घटनाओं से कम और शुद्ध कल्पना से ज्यादा मानते थे।

इस किताब के हर अध्याय के चरित्र दो बिलकुल विपरीत से दिखने वाले (द्वैत) के बीच एक मध्यम मार्ग भी दिखाते जाते हैं। प्रेम, द्वेष, तटस्थ कौन सा भाव कहाँ है वो पाठक को तय करना होता है। दर्शन के आसान या कहिये कि रोचक तरीके से परिचय के लिए ये किताब जरूरी हो जाती है। ये भी सस्ती सी कॉपीराइट के तिकड़म से मुक्त किताब है, आसानी से इन्टरनेट से डाउनलोड की जा सकती है। खरीदने पर भी ये कई अलग अलग प्रकाशनों में सौ रुपये से कम में उपलब्ध है और लगभग डेढ़ सौ पन्नों की होती है। ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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