हाल में ही तैमूर नाम पर उठे विवाद की वजह से तैमूर लंग का नाम अब सबने सुन रखा है। तैमूर का भारत पर भयानक आक्रमण 1399 में हुआ था। अपनी जीवनी ‘तुजुके तैमुरी’ को तैमूर कुरआन की एक आयत से ही प्रारंभ करता है ‘ऐ पैगम्बर काफिरों और विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सखती बरतो।’ वह आगे भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखता है-

हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिर हिन्दुओं के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है (जिससे) इस्लाम की सेना को भी हिन्दुओं की दौलत और मूल्यवान वस्तुएँ मिल जायें।

तैमुर का भारत पर हमले से उद्देश्य केवल लूट पाट नहीं था। वो खुद को इस्लाम का सिपाही मानता था और इसलिए वो काफ़िरों को क़त्ल कर रहा था। ऐतिहासिक महत्व की इस घटना का असर भारत के ऊपर देखना हो तो यहाँ की परम्पराओं में दिखेगा। 801 हिज़री आज के कैलेंडर के हिसाब से 1399 होता है। यही वो पहला साल था जब “ताजिया” बनवाया गया।

 

तैमूर एक कट्टर मुसलमान था और हर साल रमजान के महीने में इमाम हुसैन की कब्र देखने भी जाता था। भारत से पकड़ कर जिन बेचारों को गुलाम बना कर वो अपने साथ ले गया था, वो ज्यादातर शिल्पी और कारीगर थे। उनसे उसने अपने लिए जामा मस्जिद बनवाया था। जिसे आज इस्लामिक या मुग़ल आर्किटेक्चर के नाम से सराहा जाता है, वो दरअसल गुलाम बनाए गए हिन्दुओं की बेशर्मी से कब्ज़ा ली गई मेहनत है। इसी दौर में यानि 1399 में तैमुर बुरी तरह बीमार था, उसे दिल की बीमारी थी और हकीमों ने उसे सफ़र करने से मना किया था।

 

दुखी कट्टरपंथी को बहलाने के लिए गुलामों से इमाम हुसैन के कब्र जैसा बांस का ढांचा बनवाया गया। उसे लूट के माल, माल ए गनीमत, यानि काफिरों से छीने हुए हीरे जवाहरात से जड़कर सजाया गया। इसी को ताजिये का नाम दिया गया। तैमुर चूँकि शिया था इसलिए वो ताजिया को अपने प्रभाव के पूरे क्षेत्र में लागू करने लगा। इस तरह से भारत में मुहर्रम के ताजिये की परम्परा आई। बाद में हुमायूँ ने भी बैरम खान से ताजिया मंगवाया था जिसमें पन्ने जड़े गए थे। जहाँगीर के दौर तक तो शिया मुसलमानों को क़त्ल करवाया जाता रहा।

 

जिसे जहाँगीर ने क़त्ल करवाया था वो थे काज़ी नूरुल्लाह शुस्तारी, जिन्हें शहीद ए थालिथ (तीसरा शहीद) माना जाता है। उन्हें बाँध कर तब तक कोड़ों से पीटा गया था जब तक की उनकी मौत नहीं हो गई। उनके नाम का शुस्तारी, थोड़ा शास्त्री से मिलता जुलता सा लगता है, पता नहीं क्यों। खैर जब मुग़ल बादशाहों ने बाद में शिया इस्लाम कबूल लिया था तो वो भी ताजिये को बढ़ावा देने लगे। तैमूर जैसे मजबूत बादशाहों के बाद शिया मुसलामानों पर जुल्म शुरू हुए ऐसा भी नहीं है। सुन्नियों के ऊपर शिया मुसलमानों के शोषण का इल्जाम हमेशा से है।

 

आपने शायद “या अली, मदद या अली” गानों में सुना होगा। वो इस्लामिक खलीफा थे और काबे के अन्दर पैदा होने वाले इकलौते, इसलिए उन्हें बड़ा मान दिया जाता है। ख़ास तौर पर शिया उन्हें पहला जवान मर्द मानते हैं जिसने इस्लाम कबूल किया था। वो मुहम्मद के दामाद भी थे। इस्लाम के दुसरे खलीफा को हिजरत की तारिख से इस्लामिक कैलेंडर शुरू करने की सलाह भी उन्होंने ही दी थी, जिसकी वजह से इस्लामिक कैलेंडर हिजरी कहलाता है। उथमान के क़त्ल के बाद वो खलीफा बने और फिर कुछ दिन बाद उन्हें अन्य मुसलमानों ने क़त्ल कर दिया। दुनियां में कथित तौर पर 56 इस्लामिक मुल्क होने के वाबजूद उनके जन्मदिन पर सिर्फ तीन देशों में छुट्टी होती है।

 

एक तो इरान में छुट्टी होती है, जो शिया बहुल है, दूसरा अज़रबैजान और तीसरा भारत। जिस सद्दाम हुसैन को आम तौर पर सुन्नी खूब पूजते हैं वो शिया मुसलामानों को ख़ास नापसंद होता है। इसकी वजह ये है कि 1992 में सद्दाम हुसैन ने शिया मुसलमानों का बेरहमी से क़त्ल करवाया था। और तो और उसने अली के बेटे हुसैन (जो कर्बला में शहीद हुए थे, जिनके नाम पर “हा हुसैन” का मुहर्रम होता है) उनकी कब्र भी तोड़ डाली थी। पूरी दुनियां शिया मुस्लिमों के हुसैन की कब्र टूट जाने पर सद्दाम के समर्थन में खामोश थी तो दूरदर्शन दुनियां का इकलौता चैनल था जिसने वो फुटेज दिखा कर दुनियां को बताया कि क्या तोड़ दिया गया है।

 

दुनियां भर के इस्लामिक मुल्कों में जहाँ अज़ादारी यानि मुहर्रम का मातम गैर कानूनी कर रखा गया है, वहीँ भारत में विजयनगर साम्राज्य के राजा भी खुद मुहर्रम में शिया मुसलमानों के साथ शामिल होते थे। यहाँ गौर करने लायक है की सुन्नी कट्टरपंथियों के दबाव में कश्मीर में ये ताजिये और मुहर्रम के जुलुस पर सख्त पाबन्दी है। हालाँकि शिया मुस्लिमों ने ही कश्मीर में इस्लाम फैलाना शुरू किया था, लेकिन अब उन्हें मुहर्रम मनाने की आजादी नहीं है। जिस आजादी के नारे लगते हैं उसमें मुहर्रम मनाने की आजादी शामिल है या नहीं है ये मुझे मालूम नहीं। हाल के दौर शिया मुसलमानों पर जुल्मों के लिए आई.एस.आई.एस. ख़ास तौर पर जाना जाता है।

 

ये आई.एस.आई.एस. वालों ने हाल में ही करीब 1700 शियाओं को बेरहमी से काट डाला था। ये मामला इसलिए गौर करने लायक है क्योंकि लखनऊ जो है वो शिया मुस्लिमों का इलाका है। कब्ले जवाद के खिलाफ जब सुन्नी आजम खान बयानबाजी करते हैं तो क्बले जवाद, इमामबाड़ों को भी सुन्नी मुसलमानों के लिए पूरे रमजान में बंद करवा के रखते हैं। क्या शिया मुस्लिमों के इलाके में घुसपैठ ही आई.एस.आई.एस का मकसद था ? दूर कहीं ए.सी. ऑफिस में बैठे अखबारनवीस इस बैकग्राउंड इनफार्मेशन पे ध्यान नहीं देंगे। जिनका ध्यान जाएगा भी वो टुकड़ाखोर हैं और उनकी इतनी हिम्मत नहीं है कि वो ये लिख डालें।

 

बाकी के लिए मकबूल फिल्म का डायलॉग याद कर लीजियेगा, संभलना और सावधान रहना ना सूझा हो तो, आतंक लखनऊ नहीं पहुंचा है ये। “मियां समंदर घर में घुस आया है।”

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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