तेज तमअंस पर

कान्ह जिमि कंस पर

त्यों म्लेच्छ बंस पर

शेर शिवराज हैं!

 

सिर्फ इतिहास के तौर पर देखें तो शिवाजी एक व्यक्ति दिखाई देंगे। उन्होंने किया क्या देखने पर पता चलता है कि शिवाजी व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार थे। ऊपर कविता की पंक्तियाँ कवि भूषण का शिवाजी का जिक्र बिलकुल भी अतिशयोक्ति नहीं है। शिवाजी “गौ ब्राह्मण प्रतिपालक” की उपाधि ही धारण नहीं करते थे, उनके राज्य काल में शुरू की गई गौ-हत्या पर देश निकले या मृत्युदंड की सजा 1947 तक भारत के लगभग हरेक रजवाड़े के शासन में थी।

 

शिवाजी के काल को 1630 से 1680 के बीच समेटने की कोशिश जरूर अतिशयोक्ति कही जा सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि शिवाजी फारसी के बदले अपने शासन के लिए संस्कृत और मराठी का इस्तेमाल करते थे। तो ये जो आप और हम देवनागरी में लिख पढ़ रहे हैं (उर्दू-फारसी में नहीं) इसके पीछे भी कहीं ना कहीं शिवाजी का ही योगदान है। अभी से सौ साल और पीछे जाए तो कांग्रेस ने जब प्रिंस ऑफ़ वेल्स का विरोध करना शुरू किया था, तब करीब 1931 में उनका आन्दोलन शिवाजी की मूर्ती के अनावरण के नाम पर नाकाम हो गया था।

 

अगर उस से और सौ साल पीछे भी जाना चाहें तो 1850 के दौर के स्वतंत्रता संग्राम में भी मराठा योगदान काफी था। अंग्रेजो ने भारत असल में किन्ही मुगलों से छीना भी नहीं था, उसके युद्ध और नेता देखें तो कई मराठा दिख जायेंगे। आप और सौ साल पीछे जाने की भी कोशिश कर के देख सकते हैं। शिवाजी की मृत्यु और उनके पुत्र की “जिन्दा पीर” औरंगजेब द्वारा नृशंस हत्या के बाद करीब उसी समय मराठा सेनानियों ने शिवाजी के पदचिन्हों पर चलते हुए मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। अपने अल्प जीवन काल में 42 में से एक भी युद्ध ना हारने वाले बाजीराव का जिक्र भले स्कूली किताबों में ना हो, ढूंढना उतना मुश्किल भी नहीं रहा।

 

इन सभी वजहों से, लगातार मलेच्छों का आक्रमण झेल रहे हिन्दुओं के लिए शिवाजी एक नायक होते हैं। जितने इतिहास के, उतने ही साहित्य के ! मराठी पढ़ने वालों के लिए शायद बाबासाहेब पुरंदरे की “राजा शिवछत्रपति” और रंजित देसाई की “श्रीमान योगी” में से एक को बेहतर बताना मुश्किल होगा। हिंदी वालों के लिए ये कोई समस्या नहीं है ! हिंदी पट्टी के स्वनामधन्य लेखकों ने इतिहास के इस किरदार पर उतना गौर करना जरूरी ही नहीं समझा। जब कोई अच्छी किताबें हैं ही नहीं, तो भला चुनाव की दिक्कत होगी कैसे ? शुक्र है कि “श्रीमान योगी” का अब हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में अनुवाद आता है, और हिंदी पट्टी वाले एक विकल्प तो चुन सकते हैं।

 

रंजित देसाई की “श्रीमान योगी” रूखा सूखा इतिहास नहीं, इसलिए वो पढ़ने में उबाऊ नहीं लगती। वो सिर्फ एक व्यक्ति का महिमामंडन नहीं बल्कि उसके दौर के अन्य स्त्री-पुरुषों, उसके नेतृत्व में काम करते सरदारों का भी जिक्र है, इसलिए वो सिर्फ गाथा भी नहीं। “श्रीमान योगी” इतिहास और कथा के बीच में कहीं ठहरती है। इस किताब के लिए लेखक रंजित देसाई ने बरसों शोध किया था। वो शिवाजी के बनवाए किले-दुर्ग देख आये, जिन रास्तों से वो गुजरे होंगे, जहाँ युद्ध किये होंगे वो भी देखा। यहाँ तक कि घुड़सवार कैसे भाला लेकर लड़ते होंगे, तलवार और दुसरे हथियार असल में कैसे होते और चलते थे, इसपर भी उन्होंने शोध किया।

 

इन सब के अलावा किसी स्थान-माहौल को लिख कर जीवित कर देने की रंजित देसाई की क्षमता गजब की थी। शायद यही वजह है कि जब लोग “श्रीमान योगी” पढ़ते हैं तो कथा के बाहर के पाठक भर नहीं रह जाते, वो किताब में ही घुस जाते हैं। अपने लेखन के लिए रंजित देसाई काफी पुरस्कृत भी थे। लेखन के सभी बड़े भारतीय पुरस्कारों के अलावा वो पद्म सम्मान से भी सम्मानित हुए। “श्रीमान योगी” का अंग्रेजी और हिंदी अनुवाद भी स्तरीय है। हिंदी वाला राजकमल से तो अंग्रेजी हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित है। मूल मराठी के स्तर की ही होंगी, ये दावा तो हम नहीं कर सकते लेकिन अगर शिवाजी पर पढ़ना हो तो ये फ़िलहाल सबसे बेहतरीन किताबें हैं।

 

ध्यान रहे ये सिर्फ एक व्यक्ति का दस्तावेज नहीं, ये कई बार सोच की बात करती किताब है, इस वजह से ये कोई दुबली पतली निरीह सी नहीं बल्कि मोटी सी (हिंदी में करीब हज़ार और अंग्रेजी करीब 600 पन्ने) किताब है। शायद इसे ख़त्म करने में कुछ लोगों को महिना भर भी लगे, लेकिन ज्यादातर पाठक इसे तेजी से ही पढ़ रहे होंगे। अगर आपकी शिवाजी के जीवन और उनके काल में रूचि हो तो इसे चुनिए।

किताब का अंग्रेजी kindle संस्करण :

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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