लिखने या लेखन की चर्चा होती है तो कई बार इसे अपनी बात दर्ज करवाने के तरीके के तौर पर लिया जाता है। विरोध प्रदर्शन वाले लेखन में कलम को हथियार माना जाता है। ऐसे में सवाल है कि अगर कलम हथियार है तो फिर वो अस्त्र है या शस्त्र ? दोनों शब्दों में मामूली सा अंतर होता है। अस्त्र फेंक कर चलाये जाने जा सकने वाले हथियार होते हैं जैसे तीर, भाला, और शस्त्र फेंके नहीं जाते, उन्हें पकड़े रखा जाता है, जैसे कि तलवार या फरसा। इस अंतर के बाद अगर कलम को हथियार मानें तो वो बन्दूक जैसी चीज़ होगी जिस से शब्दों की गोलियां दागी जाती है।

गोलियां ख़त्म होने पर जैसे बन्दूक किसी काम की नहीं वैसे ही शब्दों की जानकारी के बिना कलम भी किसी ख़ास काम की नहीं बचती। अंग्रेजी से तुलना करेंगे तो आपको ये भी दिख जाएगा कि अंग्रेजी में शब्द सिखाने पर ख़ास जोर दिया जाता है। वहां अच्छी शब्दावली (vocabulary) अच्छी शिक्षा की निशानी मानी जाती है। तुलनात्मक रूप से हिंदी में ऐसा नहीं होता। प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए ३०००-५००० अंग्रेजी के शब्द रटना छात्रों के लिए आम है, हिंदी के कई शब्दों को पहले ही कठिन, गैर जरूरी मान लिया जाता है।

अंग्रेजी में बैरंस वर्ड लिस्ट (Baron’s) आती है, नार्मन लेविस की किताबें आती हैं, नर्णबर्ग की “आल अबाउट वर्ड्स” (All about words) आती है, कई वर्क बुक जैसी किताबें भी आसानी से उपलब्ध हैं। वहीँ अगर हिंदी शब्दों को सीखा या नहीं, पूछ लिया जाए तो सिखाने वाली किताबों का नाम शायद ही याद आएगा। इस विषय पर बहुत कम किताबें लिखी गई हैं। शब्द किसी ना किसी भाव को प्रकट करते हैं। किसी स्थान पर उस भाव की क्या उपयोगिता है उसपर निर्भर है कि वो शब्द उस स्थान की सभ्यता में होगा या नहीं होगा। इस्तेमाल के तरीके बदलने के साथ साथ ही, बिलकुल सभ्यता-संस्कृति के साथ शब्द भी बदल जाते हैं।

इसका नमूना आपको कुर्सी-मेज, रेल, स्टेशन, जंक्शन, टेलीविजन जैसे शब्दों में आराम से दिख जाएगा। ये चीज़ें भारतीय सभ्यता में कहीं और से आई हैं, इसलिए यहाँ इनके लिए स्थानीय शब्द होते है नहीं हैं। किसी और भाषा के ये शब्द यहाँ की भाषाओँ (हिंदी) में भी इस्तेमाल होते हैं। चीज़ों के अलावा भावों में भी ऐसा होता है। जैसे कि “ईमान” शब्द एक किताब और एक खुदा में विश्वास करके बाकी को झूठा मान लेने का परिचायक है। भारत में एक इश्वर को मानने का मतलब बाकि को झूठा मान लेने जैसा विचार कभी रहा ही नहीं। इस वजह से “ईमानदार” का कोई संस्कृत-हिंदी पर्यायवाची नहीं मिलेगा। ये जैसे का तैसा, मतलब बदलकर इस्तेमाल होता है।

बच्चों की देखभाल करने वाली धाय-माँ के से अर्थ में इस्तेमाल होने वाला “आया” शब्द पुर्तुगाल से आया है। वहीँ शाल, बंगला, पंडित जैसे शब्द टहलते टहलते अब अंग्रेजी में भी चले गए हैं। अग्नि का बदल कर आग हो जाना पढ़ा ही होगा, ऐसे ही कई शब्दों के रूप अब बदल भी गए हैं। मेरे जैसे लोग “किंकर्तव्यविमूढ़” जैसे शब्द इस्तेमाल करके लोगों को क्या कहें, क्या जवाब दें की परेशानी में भी डालते रहते हैं। समय बदला, कुछ लेखक और कई प्रकाशक रहे नहीं “चुनांचे” कई शब्द ख़त्म भी हो रहे हैं। शब्दों के ऐसे ही सफरों पर अजित वाडनेरकर जी ने “शब्दों का सफ़र” नाम की सीरीज लिखी है।

फ़िलहाल “शब्दों का सफ़र” के दो भाग प्रकाशित हुए हैं और वो आसानी से उपलब्ध भी हैं। पहला भाग करीब साढ़े चार सौ पन्ने का और लगभग इतनी ही कीमत का है। दूसरा भाग साढ़े तीन सौ पन्ने के लगभग है। इनमें दूर देशों से शब्दों का हिंदी तक आना, उनका नए कपड़े पहनना, हुलिया बदलना, फिर यहीं का हो जाना जैसे वाकये हैं। हर शब्द की अपनी कहानी, उस से जुड़ा इतिहास है। जिनकी शब्द सीखने में रूचि हो उन्हें इसे भी पढ़ना चाहिए। ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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