आज सतुआनी है। आज याद करूँ तो सबसे पहले याद आता है टुइयाँ और उसके साथ लम्बी गरदन वाला सुराही। और ये सब लाने वाली मईया। टुइयाँ समझने में यदि समस्या हो रही हो तो आप लोग करवा को याद कर लीजिए। मिट्टी का करवा। वो नलके सी टोंटी वाला। मईया गंगाजी नहाने जाती थी और पूजा-पाठ, दान-पुण्य क्या करती थी सो तो मालूम नहीं। पर हम तीनों भाई-बहनों के लिए टुइयाँ जरूर लाती थी। एक छोटी सुराही भी होती थी उसके हाथ में। बूट-गुड़ का प्रसाद मिलता था और फिर हम होते थे और हमारा टुइयाँ!

टुइयाँ में पानी भरा जाता था। फिर शुरू होता था पानी के ठंडे होने का इंतजार। बार-बार टोंटी से पानी सुड़क-सुड़क के चेक करना पड़ता था कि पानी ठंढा हो भी रहा है कि नहीं। बड़ी मुश्किल से पाँच मिनट गुजारे जाते थे कि बड़ी जोर से प्यास लग आती थी। तब हमलोग को पानी पीना पड़ जाता था। उस के बाद फिर दोबारा से सेम यही सिलसिला चालू हो जाता जब तक कि टुइयाँ टूट नहीं जाये। जहाँ-जहाँ हम वहाँ-वहाँ टुइयाँ। छत पर, सीढ़ियों पर, बरामदे में, कमरे में। फिर बेचारा टुइयाँ हमलोगों की मेहनत से आजिज आ के एक के बाद एक टें बोल जाता था और हम तीनों को शांति पड़ जाता था।

खैर ये तो हुई बचपन की यादें। जब कि मिट्टी का एक अदना सा बरतन भी टोकरा भर खुशी दे जाता था। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो हम हिन्दू लोग बच्चों से कोई कम उत्सवप्रिय नहीं हैं। छोटी छोटी बात में खुशी मनाने का एक आयोजन कर लेते हैं। हमारा पंचांग उत्सवधर्मिता और वैज्ञानिकता का समन्वय कर देता है। तो वैज्ञानिक कारण ये कि आज से सूर्य मीन राशि से चल कर मेष राशि में प्रवेश कर जाएंगे। और हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से आज से ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत हो जाएगी।

और खुशी की बात ये कि आज से खरमास समाप्त हो जायेगा और सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाएगी।और आज से घड़े का ठंढा पानी पीने का पानी मिलेगा सो अलग। सो आज के दिन को बिहार और झारखंड में सतुआनी या बिसुआ के नाम से मनाया जायेगा। मेष संक्रांति का यह पर्व असम में बिहू, बंगाल में पोइला बैशाख, पंजाब में बैसाखी, तमिलनाडु में पुदुवर्षम (अर्थात नववर्ष), मध्यवर्ती राज्यों में सतुआ संक्रांति, और जूड़ि शीतल के नाम से भी मनाया जाता है।

बिहार में सतुआनी के दिन गंगा स्नान-दान का विशेष महत्व होता है, श्रद्धालु आज गंगा स्नान कर सत्तू व गुड़ की पूजा कर उसका सेवन करते हैं। साथ ही टिकोला यानि कच्चा आम भी खाना शुभ माना जाता है. इस समय तक नया सत्तू भी आ जाता है। यह और छोटे आम के टिकोले से बनी चटनी शरीर को ठंडक प्रदान करने के साथ सुपाच्य भी होती है, इसलिए सतुआनी में नया सत्तू खाने का रिवाज है।

बिहार के गांवों में देवी मंदिर में पूजा करने के बाद जौ और बूट यानी चना का सत्तू आम की चटनी के साथ खाया जाता है। आज ही से घड़ों में पानी रखा जाने लगेगा। शरीर को ठंढक देने वाले आहार लेने की शुरुआत हो जाएगी। मेष संक्रांति और ठेठ बिहार की संस्कृति का प्रतीक पर्व सतुआनी की आप सबों को शुभकामनाएं।

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कल्याणी मानती हैं कि बच्चों को सिखा देना संस्कृति को एक पीढ़ी आगे बढ़ा देता है | वो अपनी दोनों बेटियों को सिखाने में जुटी होती हैं | शिक्षा के हिसाब से वो अंग्रेजी में स्नातकोत्तर हैं और पेशे से वकील | खाना बनाते वक्त वो बिहार के लोकगीत गाती-गुनगुनाती पाई जाती हैं और लेखिका के बदले खुद को पाठक मानती हैं | वो पटना में रहती हैं और कल्याणी के उपनाम से लिखती हैं |

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