आम तौर पर जब इतिहास लिखा जाता है तो वो राजाओं का इतिहास होता है। उसमें राजा का वर्णन होगा, कुछ मंत्री, कुछ सामंत होंगे। उसमें जनता नहीं होती। सबसे पहले तो यही अंतर “संस्कृति के चार अध्याय” को बाकी किताबों से अलग ला खड़ा करता है। यहाँ राजाओं के स्वर्णिम इतिहास की बात नहीं हो रही होती। किताब अलग किस्म की है इसलिए अगर पहले से पाले गए पूर्वाग्रहों के साथ ये किताब पढ़ रहे हैं तो इसे छोड़ दीजिये। ये किसी विचारधारा विशेष वालों के लिए लिखी गई किताब नहीं है।

अगर आप ये किताब खोलकर देख लें तो आपका सबसे पहले ध्यान जाएगा कि इसकी प्रस्तावना प्रधानमंत्री नेहरु ने लिखी थी। अभी हाल में इस किताब की साठवीं जयंती पर आपने प्रधान सेवक मोदी को भी शायद देखा हो। जो किताब प्रधानमंत्रियों के बीच सफ़र करती रही है, जाहिर है वो मामूली भी नहीं होगी। जब बरसों पहले 1956 में इसका पहला संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ ने छापा तो इसका जमकर विरोध हुआ था। जब बाद में दिनकर ने इसका दूसरा संस्करण लिखा तो उस समय उन्होंने कहा था, इस बार और ज्यादा विरोध होने वाला है।

इस किताब में दिनकर कई बार कबीर के ज्यादा पास दिखेंगे। वो हिंदुत्व के विरोधाभासों पर प्रहार करते हैं तो इस्लामिक कट्टरपंथ पर भी। आर्य, द्रविड़, मुस्लिम और अंग्रेज़ी प्रभाव को दिनकर जी भारतीय संस्कृति के चार अध्याय मानते हैं। उनकी ये मान्यता नेहरू जी की ‘भारत की खोज’ अथवा डिस्कवरी ऑफ इंडिया से प्रभावित मानी जाती है। ऐसे हिस्से पढ़ते समय हम याद करते हैं कि लंका काण्ड में जब मेघनाद हनुमान को बाँधने चला तो उसने ब्रह्मास्त्र चला दिया था। ब्रह्मास्त्र के सम्मान में हनुमान को भी बंधना पड़ा। जब आप दिनकर जैसे नाम के साथ जुड़ा “संस्कृति के चार अध्याय” पढ़ते हैं तो यही होता है। दर्ज़नों ऐसी बातें जिन्हें बोलने पर आपका प्रबल विरोध होगा उनपर दिनकर का नाम सुनते ही तथाकथित ज्ञानी भी आपत्ति नहीं कर पाते।

चूँकि ये किताब सात दशक पहले की है इसलिए उस समय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही लिखी गई है। जाहिर है दिनकर भी अपनी इस किताब में आर्यों को कहीं और से आया मानते हैं। भाषा और संस्कृति पर उनके लिखे से अब तक के काल में कई परिवर्तन हो चुके हैं। इतिहास का पुनः लिखा जाना क्यों जरूरी है ये भी आपको “संस्कृति के चार अध्याय” पढ़ने पर समझ में आने लगेगा। किताब दिनकर की लिखी हुई है तो ये मान कर चलिए कि इसे परिष्कृत हिंदी में लिखा गया है। आपकी आम भाषा से इसकी भाषा अलग होगी। किताब बोझिल और उबाऊ नहीं है।

अगर संस्कृति में रूचि हो, अपने दिमाग को सोचने के लिए नयी खुराक देनी हो तो कभी भी “संस्कृति के चार अध्याय” उठा कर पढ़ लीजिये। हर बार ये दिमाग में नए सवाल जरूर पैदा कर देती है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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