हाल में चर्चा में रही किताबों में से एक है “सैफरन स्वोर्ड्स” जो कि योद्धाओं की गाथा कहती है। इसमें कई ऐसे योद्धाओं की कहानियां हैं जो सन 800 से 1800 के बीच हमलावरों से लड़ते रहे। अगर सोचा जाए तो ये फ़ौरन पता चलता है कि जहाँ उन्होंने विजय पा ली, वहां की स्थानीय सभ्यता और संस्कृति को फ़ौरन मिटाकर अपने मजहब का बुर्का पहना डाला है। ईरान हो, स्पेन हो, अफगानिस्तान हो या कोई और मुल्क, जो भी इनसे हारा उसकी सभ्यता-संस्कृति समाप्त कर दी गयी। हम अगर आज भी बहुआयामी संस्कृति और बहुदेव-पूजक समाज के साथ जीवित हैं तो उसका एकमात्र कारण हैं ऐसे योद्धा जो हमारी ओर से उनसे लड़े थे। घृणित उपन्यासकार, जो इतिहासकारों का भेष बनाकर आये, उन्होंने ऐसे योद्धाओं के बारे में लिखा नहीं, इसलिए “सैफरन स्वोर्ड्स” जैसी किताबें जरूरी हो जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर गुवाहाटी में मुला गभरू के नाम पर एक सड़क भी है, और वहां मई में इनके नाम से एक दिवस भी होता है। लेकिन जेहादी हमलावरों के खिलाफ लड़ने वाली मुला गभरू का नाम शायद ही असम के बाहर किसी ने सुना होगा। इनके साथ ही लड़ी जयंती, पामिला, ललिता जैसे नाम भी कभी नहीं पढ़े-सुने जाते। सन 1527 में जब इस्लामिक हमलावरों ने अहोम साम्राज्य की ओर कदम बढाए तो मुला गभरू के पति सेना में थे। मुगलों के आदेश पर किये गए तुर्बक खान के इस हमले में मुला गभरू के पति वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु के बाद इस्लामिक हमलावरों को रोकने की जिम्मेदारी मुला गभरू ने उठा ली थी। वो संभवतः कोई प्रशिक्षित योद्धा नहीं थी। युद्धों के दौरान ही पहली बार उन्होंने हथियार चलाना सीखा होगा।

हारती हुई अहोम सेनाओं को अचानक जब दिखा कि स्त्रियाँ उनकी मदद को आगे आ रही हैं, तो उनकी हिम्मत फिर से बढ़ गयी। मुकाबला दोबारा पूरे जोश के साथ शुरू हुआ और युद्ध के चौथे दिन तुर्बक खान युद्ध क्षेत्र में मुला गभरू को नजर आ गया। तुर्बक अपने अंगरक्षकों से घिरा था और मुला के साथ गिनती की दो चार ही स्त्रियाँ थीं। इसके वाबजूद उन्होंने तुर्बक खान पर हमला किया, लेकिन वो किसी अंगरक्षक के भाले से वीरगति को प्राप्त हुईं। उनका साहस देखने के बाद अहोम सैनिकों ने अपना पूरा जोर लगाया। कानसंग बारापात्र गोहाईं जो इस लड़ाई में सेनानायक थे उन्होंने तुर्बक खान को काट गिराया। मुगलों के इस पांचवे हमले का भी वही हुआ जो और बार होता रहा था। बचे खुचे सैनिकों ने जैसे तैसे आत्मसमर्पण करके अपनी जान बचाई थी।

मई में 29 तारिख को मुला गभरू के नाम से एक दिन मनाया जाता है। उनके नाम पर एक स्कूल भी है। उनके नाम से सड़क भी है। इसके वाबजूद बाकी के भारत में उनका नाम सुनाई नहीं देता! उनकी विजय को महान और हमारी जीत को छोटा बता देने की ऐसी ही धूर्तताओं के अनगिनत नमूने हैं। ऐसी ही 52 कहानियों की किताब है “सैफरन स्वोर्ड्स”। हमें अपनी ओर से लड़ने वालों के नाम मालूम हों, इसलिए ऐसी किताबों को पढ़ा जाना चाहिए।

हाँ अगर “लक्ष्य” नाम की फिल्म देखी हो तो शायद उसका एक दृश्य याद हो जिसमें टाइगर हिल पर विजय पाने जा रहे हृतिक को अनुभवी योद्धा का किरदार निभा रहे ओम पुरी समझा रहे होते हैं। वो कहते हैं, जीतते ही निश्चिन्त मत होना, भागते हुए ये पाकिस्तानी तुरंत ही पलट कर हमला करते हैं। सलाह हृतिक को याद रहती है, वैसा ही होता भी है और हृतिक जीतता है। लेकिन ये सलाह भी कोई फ़िल्मी डायलॉग भर नहीं था। इस्लामिक हमलों में कई बार ऐसा होता रहा है। कभी जीत के बाद छुट्टी लेकर घर चली गयी सेना, तो कभी हथियार रखकर जश्न मनाती फौजों को पलट कर किये हमले की वजह से हार झेलनी पड़ी है। एक जीत पर हथियार रखने नहीं, तैयारी जारी रखनी है। बाकी जबतक दूसरा हमला पलटकर आता है, तबतक अपनी जीत की “सैफरन स्वोर्ड्स” जैसी कहानियां पढ़ते हैं !

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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