हिंदी साहित्य में रूचि रखने वाले कई लोगों ने अज्ञेय की लिखी ‘नदी के द्वीप’ का नाम या तो सुना होगा, या फिर किताब ही पढ़ रखी होगी। नाम सुनने में बड़ा अजीब सा लगता है। पहले हम भी सोचा करते थे, नदी छोटी सी तो होती है। भला उसमें द्वीप कहाँ से होगा ? जब गंगा देख ली तो समझ आया कि नदी में डॉलफिन भी हो सकती है और द्वीप भी हो सकता है। सोएंस और नकार मैथिली किस्से कहानियों के जीव नहीं होते, ये सचमुच में होते हैं।

 

जब नदियों की धारा अपना रुख मोड़ती है तो नदी के द्वीप बनते हैं। नदी के द्वीप देखने के लिए गंगा और ब्रम्हपुत्र जैसी नदियाँ भारत में ही हैं। अगर खूबसूरत सा नदी का द्वीप देखना हो तो असम जाइये। नदियों की धारा रोज़ नहीं बदलती। पिछली बार ब्रम्हपुत्र की धरा 1650-1750 के दौर में बदली थी। असम और आस पास के इलाकों में 1661-1696 के बीच कई भूकंप आये। इन भूकंपों ने ब्रम्हपुत्र बाढ़ की जमीन तैयार कर दी थी। फिर 1750 में लगातार 15 दिन तक बाढ़ आई। पानी आता रहा आता रहा, ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों में भी इस बाढ़ का जिक्र है। स्थानीय कहानियों में भी ये बाढ़ बहती है।

 

इस बाढ़ के असर से ब्रम्हपुत्र की धारा दो हिस्सों में बंट गई। एक बुर्हिदिहिंग चैनल से बहती है जो थोड़ा दक्षिण की तरफ है और उत्तर की तरफ ब्रम्हपुत्र की मुख्य धारा तो है ही। दोनों धाराएँ वैसी की वैसी ही रह गई हों ऐसा नहीं है। पहले उत्तरी भाग को मुख्य ब्रम्हपुत्र माना जाता था, उसे स्थानीय लोग लुइत जुती कहते हैं, ये सिमट कर छोटी होती गई। दक्षिणी भाग जिसे बूरही जुती कहते हैं, वो चौड़ी होते होते आज ब्रम्हपुत्र की मुख्य धारा है।

 

इन दोनों धाराओं के बीच स्थित है नदी का द्वीप, माजुली।

 

राजा रत्नधजपाल ने यहाँ अपनी राजधानी बनाई थी और उसका नाम रतनपुर रखा था। ऐसा जिक्र योगिनी तंत्र में कहीं आता है। लेकिन शायद वो बाढ़ों में बह गया। यहाँ अभी जो लोग रहते हैं वो मिसिंग आदिवासी काबिले के हैं। ये कभी ना कभी अरुणांचल से आकर यहाँ बसे थे ऐसा माना जाता है। एक अनोखी चीज़ ये भी है कि इन मिसिंग काबिले वालों का बर्तन बनाने का तरीका पक्का वही है जो हड़प्पा के अवशेषों में आज मिलता है। तो अगर माजुली जायेंगे तो दो चार मिटटी के बर्तन ले आइयेगा।

 

नदी की धारा मुड़ने से बना माजुली, सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत से ही असम की सांस्कृतिक राजधानी रहा है। इसलिए अगर असम (नार्थ-ईस्ट) घूमने जा रहे हैं तो यहाँ गए बिना आपका ट्रिप अधूरा है। अगर कहीं आप अभी भी सोच रहे हैं कि इस ‘नदी के द्वीप’ की इतनी क्या तारीफ़ किये जा रहा है ! छोटा सा तो होगा। तो जनाब इस माजुली में छह कॉलेज हैं। अंदाजा हो गया होगा अकार का ?

 

वापिस इसके सांस्कृतिक मुख्यालय होने के कारणों पर आयें तो यहाँ सोलहवीं शताब्दी के प्रसिद्द संत श्रीमंत शंकरदेव अपने शिष्य माधवदेव के साथ आये थे। हिन्दुओं के वैष्णव मत के ये प्रवर्तक इस जगह कई सत्र स्थापित कर गए। स्थानीय भाषा में सत्र को सतरा भी कहते हैं। सैलानी इन्हें देखने आते हैं। द्वीप लम्बाई में ज्यादा और चौड़ाई में कम है इसलिए पक्षी देखने के शौक़ीन सैलानी उत्तरी सिरे से या फिर दक्षिण पूर्व और दक्षिण पश्चिमी कोनो पर जाते हैं। हां, दोबारा याद दिला दें, यहाँ से मिट्टी के बने बर्तन और चेहरे के मुखौटे लेना मत भूल जाइएगा।

 

वैसे असम में बरसों से कांग्रेसी सरकार रही है, जिन्होंने इस इलाके में विकास के लिए लगभग कुछ नहीं किया है। जोरहाट से ये जगह मुश्किल से बीस किलोमीटर होगी, और बस से जोरहाट से यहाँ तक पहुँचने में तीन घंटे लग जाते हैं। सुना है इस चुनावी मौसम में हालात बदल गए हैं।

 

बाकी नदी की धारा अपना रुख फिर से मोड़ती है या नहीं, ये तो समय के साथ पता चल ही जायेगा।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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