कभी कभी समस्या बहुत छोटी सी होती है, जैसे कभी आपने किसी बंगाली को अपनी बात तमिल में समझाने की कोशिश की है ? या फिर कोशिश कीजिये कि डोगरी में अपनी बात किसी मलयालम भाषी को समझा दें। ये सलाह सुनने में ही मूर्खतापूर्ण लगती है। असफल होगी ये पहले ही इसलिये पता होता है, क्योंकि ये कोई भी समझ सकता है कि संवाद के लिए दोनों लोगों का कोई एक ही भाषा बोलना समझना जरूरी होता है।

 

सिर्फ भाषा का अंतर हो जाए तो पहले तो सुनने वाला अरुचिपूर्वक सुन रहा होगा, सुन भी ले तो पूरी बात का उसके लिए कोई मतलब नहीं होगा। अगर कहीं सिर्फ बांग्ला जानने वाला हिंदी वाले की चोटी का मतलब निकाले तो वो शायद चप्पल समझेगा। कहीं जो गलती से फारसी वाले के दस्त का हिंदी वाला, या संस्कृत वाले के पाद का कोई अर्थ निकालने बैठा तो सत्यानाश ही हो जाएगा। ऐसे ही सिर्फ हिंदी का बदलना देखें तो वो भी समय के साथ काफी बदल चुकी है।

 

चूँकि हिंदी का इतिहास कोई भारत जैसा पांच-दस हज़ार साल पुराना नहीं है, कुछ सौ साल का ही है इसलिए भाषा के परिवर्तनों को भी स्वीकार करना चाहिए। यहाँ तत्सम शब्द होंगे तो तद्भव भी होंगे, साथ ही कुछ शब्द आयातित भी आयेंगे। आप जिस भाषा में 55 की उम्र में बात कर रहे हैं, कोई भी 20 साल वाला उसी हिंदी में हरगिज़ बात नहीं करता। ऐसे में एक बड़ा सवाल ये भी है कि जब वो आपकी वाली हिंदी समझता ही नहीं तो फिर उसे आप गीता प्रेस वाली किताबों की हिंदी में क्यों पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं ?

जैसे मेरे लिए कोई गुजराती में लिखी किताब काला अक्षर भैंस बराबर है वैसे ही युवाओं के एक बड़े वर्ग के लिए परिष्कृत हिंदी होती है। हिंदुत्व के पक्ष में लिखी गई किताबों की आम लोगों में कम पहुँच का एक कारण उनकी भाषा भी होता है। कई बार किताब जब अंग्रेजी में होती है तो कोई ना कोई पूछ ही लेता है कि ये हिंदी में आती है क्या ? अफ़सोस कि आम तौर पर अच्छी किताबें हिंदी में नहीं आती हैं। अनुवाद सभी स्तरीय भी नहीं होते। ऊपर से पढ़ने की आदत आम हिन्दुओं जितनी हो तो समझ में भी नहीं आएगी।

 

हाल के दौर में जो हिन्दुओं पर लिखा गया उनमें वामशी जुलुरी की “Rearming Hinduism” एक अच्छी किताब थी। ये आसान भाषा में लिखी गई थी तो युवाओं में काफी प्रचलित भी रही। अभी हाल में ही इसका अनुवाद सुशांत झा ने किया है और ये हिंदी में भी उपलब्ध है। करीब सवा सौ रुपये में उपलब्ध ये तीन सौ पन्नों के लगभग की किताब ना तो बहुत महंगी है, ना बहुत मोटी। बदलावों के बीच हिन्दुओं को क्या जानना-समझना चाहिए, उसकी एक बानगी लेनी हो तो हिंदी में ये “हिंदू धर्म” के नाम से उपलब्ध है।

 

बाकी पढ़ते रहिये, सीखते जाइए, क्योंकि पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया !

अमेज़न पर इसी किताब का अंग्रेजी में रिव्यु का लिंक

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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