कुछ ऐसी भी गलतियाँ होती हैं जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता। ऐसी ना सुधारी जा सकने वाली गलतियों को समझना हो तो हाल में आई फिल्म “राँझना” को दोबारा देख लीजिये। बाकि सभी फिल्मों जैसा ही इसमें एक हीरो है जिसे हेरोइन से प्यार हो गया है। वो नायिका से अपने प्रेम के लिए “हां” भी करवा लेता है, मतलब कंसेंट, पिंक जैसा नो मीन्स नो वाला मामला नहीं होता। मगर जब तक कहानी में ट्विस्ट ना हो तब तक कैसी कहानी ? तो हीरोइन जब कुछ साल के लिए पढने एक मशहूर विश्वविद्यालय जाती है तो वहां उसे किसी और से प्रेम हो जाता है।

 

किस ख़ास विश्वविद्यालय पर आधारित विश्वविद्यालय फिल्म में दिखाया है, उसपर हम कुछ नहीं कह रहे। नायिका को जिस नए किरंतिकारी से प्रेम हुआ होता है वो पहले से ही वहां का छात्र नेता था। अलग धर्म मजहब का वास्ता हीरो को देकर नायिका नए प्रेमी के साथ निकल ही लेने वाली थी कि कहानी में फिर ट्विस्ट होता है। ये जो नया प्रेमी था माशूका का, वो भी समुदाय विशेष का नहीं था, सिख था ! हीरो को जब पता चलता है कि उसे तो हिंदु होने के कारण ठुकराया गया मगर शादी किसी और ही धर्म वाले से कर रही है तो वो इस धोखे पर भड़क जाता है।

 

वैसे तो बात सही थी, पढ़ाई, जीवन-स्तर में काफी अंतर आ गया था आठ साल में तो हीरो किसी लिहाज से, नायिका के लायक पति नहीं था। मगर हीरो तो एक ख़ास विचारधारा वाले “असंतुष्ट”, “हाशिये पर का वर्ग” हो गया था। यहाँ पहली ना सुधारे जाने लायक गलती, हीरो से होती है। वो सोचता है लड़की के परिवार वाले तो सब पढ़े लिखे, लिबरल टाइप लोग हैं। होने वाले दूल्हे के सिक्ख होने की सच्चाई बता देने पर शादी से इनकार, या ज्यादा से ज्यादा, दिल्ली से आये नए प्रेमी को, एक दो थप्पड़ लगा देंगे। ना सुधारे जाने वाली इस गलती का नतीजा ये होता है कि सिख युवक की हत्या कर दी जाती है।

 

उधर बेचारे कम पढ़े लिखे हीरो ने शायद जयचंद का किस्सा भी नहीं सुना था। कैसे पृथ्वीराज को मारते ही जयचंद को सबसे पहले निपटाया गया था, उसे मालूम नहीं था। तो हीरोइन को भी पता चल जाता है कि चुगली की किसने, इस तरह जयचंद का, मतलब हीरो का भी पत्ता साफ़ ! अब हीरोइन वापिस दिल्ली और हीरो सर धुनता अपने छोटे शहर बनारस में। हत्या का कारण बनने और माशूका के बिछड़ने से देवदास बना हीरो भी घर से भाग जाता है। “असंतुष्ट” होने के साथ अब “गिल्ट फीलिंग” लिए वो एक घाट पर बैठा सन्यासियों को देख रहा था।

 

ये पेट पर बम बंधवा कर बहत्तर हूरें दिलवाने लायक परफेक्ट मनोदशा होती है, लेकिन हीरो तो तमिल ब्राह्मण अर्थात बहुसंख्यक समुदाय का सवर्ण पुरुष था। तो इस बार उसकी जिस से मुलाकात होती है वो उसे प्रायश्चित करने की सलाह देता है। दिल्ली आ कर अब हीरो ढाबे पर नौकरी करने लगा और जिसे मरवाया था उसकी बहन के साथ मिलकर किरांती को और आगे ले जाने की सोचने लगा। अब हीरोइन जब उसे फिर से अपने ही विश्वविद्यालय के ढाबे में गंगा-जामुनी तहजीब को बढ़ाने का काम करते देखती है तो “नाराज” तो हीरोइन भी थी !

 

इसलिए अब हीरोइन ना सुधारी जा सकने लायक गलती कर डालती है। वो कभी समर्थन, कभी टांग खींचने वाली पार्टी की मुख्यमंत्री से मिलती है। उसके उकसाने पर वो एक रैली पर हमला करवाती है। वहां हीरो जब मरणासन्न स्थिति में आ जाता है तो हीरोइन को समझ आता है कि इसे अपने ऊपर हमले का पहले ही पता था। ये अपने प्रायश्चित में, जान बूझ कर मरने पहुँच गया था। इस बार “गिल्ट फीलिंग” की मारी हीरोइन पहुँचती है पत्रकारों के पास और पूरी साजिश ही बता डालती है। मगर इस से भी गलती सुधरती नहीं, कुछ बदलता नहीं, पाप का भोग धरती पर ही नर्क दिखा देगा ये समझ आ जाता है।

 

अक्सर एक सवाल होता है कि साधू देश सेवा के लिए कुछ नहीं करते ! समाज सुधार के लिए ये क्यों नहीं करते ? वो क्यों नहीं करते ? अपने हिस्से का प्रायश्चित झेलता “राँझना” अपने आखरी डायलॉग में इसका जवाब भी दे जाता है। कर तो सकते हैं, मगर कौन साला फिर से वही सब झेले ? दिमाग खर्च करवाने वाली फ़िल्में बहुत ज्यादा चलती नहीं। आप भी आराम से “व्हाई दिस कोलावेरी” गुनगुनाते निकल सकते हैं। या फिर सोचिये, हो हरकत एक बार कर देने पर उसके नतीजे किसी भी तरह बदले नहीं जा सकते, तो फिर उसे करना है या नहीं करना ये बहुत बड़ा सवाल है।

 

व्हाई दिस कोलावेरी ? व्हाई ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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