आधुनिक युद्ध के अध्येता मार्टिन वान क्रेवेल्ड का कथन है कि युद्ध पूर्ण रूप से तकनीक द्वारा नियंत्रित होता है. सोलहवीं शताब्दी में बारूद के प्रयोग से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी में तोपखाने के वृहद् उपयोग तक और उसके पश्चात टैंक, पनडुब्बियां, मिसाईलें सभी इसके प्रमाण हैं कि युद्ध नयी तकनीक को जन्म ही नहीं देते अपितु उसके विकास में भी उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं. विंग कमांडर मनमोहन बाला की पुस्तक “रक्षा विज्ञान” इस अवधारणा को पुष्ट करती है.

हमें प्रायः भारत की सामरिक उपलब्धियों के समाचार मिलते हैं किन्तु सामान्य नागरिक यह नहीं समझ पाता कि उक्त मिसाइल परीक्षण अथवा सैन्य तकनीक का महत्व क्या है. उदाहरण के लिए ब्रह्मोस का परीक्षण सफल हुआ तो उसके मायने क्या हैं? अथवा भारत ने मुख्य युद्धक टैंक बना कर कौन सा तीर मार लिया- जैसे प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं. रक्षा सम्बन्धी समाचार ‘सुर्खियाँ’ तब बनते हैं जब किसी तकनीक की गड़बड़ी सामने आती है. न्यूज़ चैनल दर्शकों को शिक्षित करना आवश्यक नहीं समझते. उनकी टीआरपी रक्षा घोटालों के समाचार से बढ़ती है. बाजार में रक्षा विज्ञान की अधिकतर पुस्तकें अंग्रेजी में उपलब्ध हैं. वे महंगी होती हैं तथा उनकी तकनीकी शब्दावली हिंदी भाषी पाठक के गले नहीं उतरती. ऐसी स्थिति में विंग कमांडर मनमोहन बाला की पुस्तक देश के रक्षा प्रतिष्ठान और सामान्य नागरिक के मध्य आवश्यक संवाद स्थापित करती है.

मिसाइल क्या है? अंतरिक्ष में आयुधों की तकनीक किस प्रकार कार्य करेगी? इलेक्ट्रॉनिक तकनीक तथा सूचना युद्ध का क्या प्रारूप है? युद्ध और तकनीक के मध्य परस्पर क्या सम्बन्ध है? भारत की रक्षा प्रणाली का क्या इतिहास रहा है? बहुचर्चित लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की ज्यामिति कैसी है? जैसे अनेक प्रश्नों के उत्तर विंग कमांडर मनमोहन बाला की यह पुस्तक सरल शब्दों में देती है. नाभिकीय, जैविक-रासायनिक अस्त्र, रोबोटिक्स एवं लेजर आधारित प्रक्षेपास्त्र जैसे भविष्य के हथियारों का विज्ञान विंग कमांडर मनमोहन बाला ने अत्यंत सहज रूप में विवरण किया है. इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है इसका हिंदी में प्रकाशित होना. स्वयं भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी विभाग के सचिव श्यामल घोष द्वारा लिखित प्राक्कथन इस पुस्तक को प्रामाणिक बनाता है. कुछ कमियां हैं जिन पर प्रभात प्रकाशन वालों को ध्यान देना चाहिए था. जिन रंगीन चित्रों की सूची प्रारंभ में दी गयी है वे पुस्तक के अंदर नहीं छपे हैं. अंग्रेजी शब्द ‘टेक्नोलोजी’ के लिए तकनीक ही प्रयुक्त होता तो अच्छा होता. निरंतर ‘तकनालाजी’ शब्द का प्रयोग खटकता है. हार्डबैक में यह हल्की-फुल्की पुस्तक सर्वसुलभ है. अवश्य पढ़ें. डीआरडीओ का ध्येय वाक्य है: बलस्य मूलं विज्ञानं. जय हिन्द. जय हिन्द की सेना.

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