दर्शनशास्त्र की दो तरह की किताबें हो सकती हैं। एक तो वो जो ये बताएं कि किस बात का मतलब क्या है, परिभाषा क्या है, अवधारणायें कौन सी हैं। दूसरी वो जो तर्कों के आधार पर सिद्ध करें कि ये अवधारणा सत्य है और बाकी सारी गलत। सवाल ये है कि तर्क के आधार पर अवधारणा क्यों सिद्ध होंगी? वैज्ञानिक शोध कर के सत्य-असत्य का पता क्यों नहीं लगायेंगे? ऐसा इसलिए क्योंकि सत्य दर्शनशास्त्र का विषय है और विज्ञान एक अलग विषय है। विज्ञान के जरिये सत्य की खोज वैसी ही होगी जैसे लीटर में लोहे, सोने-चांदी या किसी अन्य ठोस वस्तु को मापने की कोशिश।

 

हिन्दुओं के षड्दर्शन में से सबसे ज्यादा प्रचलित, अद्वैत मत के लिए जब हम किताबें देखते हैं तो ज्यादातर तर्कों के जरिये अद्वैत को सही ठहराने वाली किताबें होती हैं। आसानी से उपलब्ध आदिशंकराचार्य के भगवद्गीता या उपनिषदों के भाष्य तर्क से अद्वैत की अवधारणा को सही बताती हैं। तो फिर परिभाषाएँ कहाँ से मिलती हैं? किन परिभाषाओं के आधार पर अद्वैत चलता है? स्थापना के लिए “पंचदशी” सबसे प्रचलित किताबों में से एक है। अद्वैत में प्रयुक्त होने वाले सिद्धांत क्या हैं, कौन सा शब्द किस अर्थ में कैसी परिभाषा लिए होता है, इन्ही विषयों पर पंचदशी लिखी गयी थी।

पञ्चदशी / Panchadshi
पञ्चदशी

जैसा कि नाम से ही जाहिर है “पञ्च” और “दशी” यानि कुल पंद्रह अध्याय होने के कारण इस किताब का ऐसा नाम है। ये पांच-पांच अध्यायों के तीन हिस्सों में विभक्त भी है। पहला हिस्सा विवेक पंचक कहलाता है और इसमें हर अध्याय के नाम में विवेक शब्द है, जैसे तत्त्वविवेक या पञ्चकोशविवेक प्रकरण। दुसरे हिस्से को दीप पंचक कहते हैं इसमें चित्रदीप और तृप्तिदीप जैसे नामों वाले प्रकरण हैं। तीसरा हिस्सा आनंद पंचक है जिसमें योगानन्द और अद्वैतानन्द जैसे प्रकरण हैं। इस पंचदशी का नाम, पुराणों या उपनिषदों जैसा हर दूसरी-तीसरी चर्चा में सुनाई नहीं देता, लेकिन ये सीखने वालों के लिए महत्वपूर्ण होती है।

तंत्र के कई साधकों के पास भी पंचदशी मिल जाना आश्चर्यजनक नहीं होता। दशनामी संप्रदाय के साधुओं के पास भी ये अक्सर मिल जायेगी। मेरे लिए इसकी महत्ता थोड़ी सी अलग है। आदिशंकराचार्य के बाद के समय में अद्वैत दो और भागों में बंटा, एक तो था विवरण और दूसरा भामती। विवरण अद्वैत मत के मुताबिक जीव ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है। भामती मत के मुताबिक जीव की सीमाओं को ब्रह्म धारण करता है। यानि एक जहाँ प्रतिबिम्ब को सीधा-सीधा ब्रह्म जैसा बता रहा है वहीँ दूसरा पानी को जिस बर्तन में डाला जाए वैसा रूप धारण कर लेने की बात कर रहा है।

 

श्री विद्यारण्य स्वामी जो पंचदशी के रचयिता थे, वो विवरण के एक थोड़े से बदले स्वरुप ‘आभास-वाद’ के प्रवर्तक थे। इस से पहले वो माधवाचार्य नाम से भी जाने जाते थे। ये द्वैत मत वाले माधवाचार्य नहीं, बल्कि दूसरे थे। सन 1377 से 1386 के बीच ये श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य भी थे। हो सकता है आपने विजयनगर साम्राज्य या राजा कृष्णदेवराय और तेनालिरमण का नाम सुना हो। संगम वंश के यादवों ने इस साम्राज्य की स्थापना 1336 में की थी। इसके पहले राजा हरिहर और बुक्का राय का मुहम्मडेन से वापस हिन्दुओं में धर्मपरिवर्तन करवाने वाले स्वामी विद्यारण्य ही थे।

 

समुदाय विशेष के आक्रमणों से लड़ने की उनकी प्रेरणा के अलावा माधवाचार्य (विद्यारण्य) कई वर्षों तक अमात्य माधव नाम से जाने जाते थे और विजयनगर साम्राज्य के शुरूआती अमात्यों में से एक थे। उनका लिखा पढ़ने का एक कारण उनकी उपलब्धियों का सम्मान भी हो सकता है। हिंदी में इसका ऑडियो इन्टरनेट पर मुफ्त उपलब्ध है। हिंदी में इसके 1000 पन्नों के लगभग के अनुवाद भी उपलब्ध हैं। ये जो लिंक है इसमें संस्कृत के साथ अंग्रेजी है और रामकृष्णमठ का प्रकाशन होने के कारण मैं इस्तेमाल करता हूँ।

 

हाँ ये जरूर ध्यान रखियेगा कि अद्वैत कोई आसान विषय नहीं होता और दर्शनशास्त्र भी सबके लिए नहीं होता। भक्तियोग ज्यादातर मामलों में ज्ञानयोग से आसान होता है। सीधे शब्दों में कहें तो आठवीं के बच्चों को जबरन कैलकुलस सीखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

An English review of Panchdashi at Adhyatmika website

An English review of Panchadashi on Amazon India website

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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