क्या हुआ ? अजीब सा शब्द लग रहा है ! वो इसलिए क्योंकि आपको आपकी नायिकाओं के नाम किसी ने बताये ही नहीं है। काफी साल पहले (सन 1779 में) चित्रदुर्ग पर मदकरी नायक का शासन था। उनके किले को हमला कर रहे हैदर अली की फौजों ने घेर रखा था और जीतने के कोई ख़ास विकल्प नहीं दिख रहे थे। लेकिन किला बंद कर के अन्दर बैठे सिपाहियों पर सीधा हमला करने का कोई उपाय भी नहीं था। ऐसे ही एक दिन एक पहरेदार कहले मुड्डा हनुमा का पहरा का वक्त था जब उसकी पत्नी उसे खाने के लिए बुलाने आई।

जबतक पहरेदार खाना खाता पत्नी पास के ऊँचे टीले सी जगह पर पानी लाने गई। इतने में उसकी नजर एक छेद पर पड़ी जिससे इस्लामिक हमलावर घुसने की कोशिश कर रहे थे। ओबव्वा के पास हथियार नहीं थे। धान पीटने की मोटी लाठी उसने उठा ली। उसे “ओंके” कहते हैं। छेद से एक बार में एक ही सिपाही अन्दर आ पाता था, और अब पहरे पर ओबव्वा तैनात थी। जब तक पत्नी के पानी लेकर ना लौटने पर खिसियाता पति वहां पहुँचता, इस्लामिक हमलावरों की लाशों का ढेर लग गया।

 

एक एक कर के कई हमलावर ओबव्वा के ओंके का शिकार हो गए थे। घुस रहे हमलावरों को शक ना हो इसलिए वो एक एक लाश उठा कर किनारे करती जाती थी। मदकरी नायक जीते नहीं थे, हार गए थे और 1779 में उनके चित्रदुर्ग किले पर हैदर अली का कब्ज़ा हो गया। वो होलयास (चलावाडी) समुदाय की महिला ओबव्वा तब से ओंके ओबव्वा के नाम से ही याद की जाती है। कन्नड़ सम्मान के इस प्रतीक ने किले के जिस झिरी पर पहरा दिया था उसे आज ओंके ओबव्वा किंडी कहते हैं।

 

नगराहवू फिल्म में उनके इस प्रयास का एक लम्बा दृश्य है। चित्रदुर्ग का स्पोर्ट स्टेडियम आज ओनके ही नाम पर “वीर वनिथे ओंके ओबव्वा स्टेडियम” कहलाता है।

(ये कार्टून सी तस्वीर इन्टरनेट से साभार)

SHARE
Previous articleतार हथियार
Next articleसतरंगी रे…

आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here