तो पहला किस्सा है एक संत का। ये कई नामी गिरामी संत / महात्मा / विख्यात व्यक्तित्वों , के साथ जोड़ा जाता है। आखरी बार महात्मा गाँधी के नाम से जुड़ा पढ़ा था हमने। इसमें होता क्या है कि संत के पास एक औरत अपने बेटे के साथ आती है। महिला की संत में बड़ी श्रद्धा थी और वो सोचती थी की उनकी बात महिला का छोटा सा बेटा भी मान लेगा। उसने संत को बताया की बेटे की चीनी खाने की बुरी आदत है। लाख समझाने पर भी नहीं मानता, मौका पाते ही एक मुट्ठी चीनी उठा कर खा जाता है ! अगर संत मना कर दें तो शायद उसका बेटा ये बुरी आदत छोड़ दे।

 

संत ने महिला को कुछ दिन बाद आने को कहा। महीने भर बाद जब महिला आई तो संत ने बच्चे को प्यार से समझाया, बेटा ज्यादा चीनी खाना बुरी बात है, आप चीनी चुराना छोड़ दो। महिला अचंभित हुई, कहा, महाराज ये एक लाइन तो आप पिछले महीने भी कह सकते थे ! संत ने कहा, देवी पिछले महीने तक मैं भी मौका पाते ही चीनी खाने में जुट जाता था ! अब जो गलती मैं खुद करता हूँ वो दुसरे को छोड़ने कैसे कहता ?

 

तो लब्बोलुआब ये की “पर उपदेश कुशल बहुतेरे”, जो गलती खुद करते हों वो दुसरे की नहीं सुधारनी चाहिए।

 

अब दूसरा किस्सा एक अंग्रजी सीरियल “गेम ऑफ़ थ्रोनस” का है। मुझे ये सीरियल हमेशा आर्या स्टार्क और सांसा स्टार्क की कहानी लगती है। उनके पिता को एक अत्याचारी राजा मरवा डालता है तो दोनों गरीबी की हालत में आ जाती हैं, और राजा से दुश्मनी की वजह से जान की भी आफत थी। ऐसे में सांसा स्टार्क हालात से समझौता कर के जीने के लिए दूसरों की मदद में आसरा ढूंढती है और छोटी वाली आर्या स्टार्क हालात से लड़कर (द्रौपदी जैसा) जीवन में आगे बढती है।

 

जाहिर है ऐसे में आर्या स्टार्क मुझे ज्यादा पसंद है। हीरोइन लगती है। उसे एक स्नो नाम का आदमी एक तलवार उपहार में देता है तो उसके पिता ने उसके लिए एक तलवारबाजी का शिक्षक रखा। इस शिक्षक का प्रिय डायलॉग था “What do we say to death ? Not today sweetheart ! Not today !” हम मौत से क्या कहते हैं ? आज नहीं जानेमन, बस आज नहीं !)

 

स्लम्स में इतने हफ्ते गुजारने के बाद भी यहाँ की सबसे बुरी चीज़ यानी नशे की आदत के बारे में नहीं लिखा कभी। कारण ये था की ये शौक कुछ दिन पहले तक हम भी पाला करते थे। अब करीब दो महीने नशेड़ियों के साथ रहने के बाद भी जब किसी किस्म की शराब या अन्य नशे का इस्तेमाल नहीं किया तो मेरा ख़याल है हम इस मुद्दे पर भी बोल सकते हैं।

 

ऐसी किसी भी आदत के लिए एक आसान सा जवाब है “आज नहीं जानेमन, बस आज नहीं !” हमने दो महीने हर रोज़ शराबियों के साथ बैठ कर दिल को यही समझाया है, “आज नहीं जानेमन, बस आज नहीं !” तो अगर किसी किस्म की बुरी आदत अगर कहीं आपने भी पाल रखी हो तो उस से छूटने का आसान सा तरीका है ये। एक एक दिन कर के महीने कब बीते पता नहीं चलता।

 

“आज नहीं जानेमन, बस आज नहीं !”

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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