आज से हमारा मुख्य पर्व बोहाग बिहू आरंभ हुआ..परंपरा है कि हम पर्व की शुरुआत गौ पूजन से करते हैं.बिहू का पहला दिन “गोरु बिहू ” के नाम से जाना जाता है.गाय को हम गोरु कहते हैं.

आज के दिन हम सुबह में हम गाय को नदी या पुखुरी (तालाब) पर ले जाकर नहलाते हैं.यहाँ पर पूरा गांव अपनी अपनी गायों के साथ इकट्ठा होता है. बच्चे बूढ़े मा हल्दी के लेप से नहाते हैं.साबुन का इस्तेमाल नही होता. एक दिन पहले ही पतली पतली लचकदार लकड़ियों में लौकी(लाऊ), बेजोना(बैगन) , खुकरी आदि के छोटे छोटे टुकड़े माला की तरह गूंथ लिए जाते हैं.और गाय को नहलाकर बच्चो के साथ क्रीड़ा करते हुए गाते हैं-
“लाऊ खा बेजोना खा दिने दिने बारही जा.
मा रे होरु बापी रे होरु तोय होबी बोर गोरु”

मतलब , हमारे बच्चों ! लौकी खाके बैगन खाके दिन दिन बढ़ते रहो….मा छोटी है, पिता छोटा है लेकिन तुम बड़ी गाय के जैसा विशाल बनो.

फिर नदी से गाय को घर ले जाते हैं ..उसके लिए पीथा(एक प्रकार का पकवान) तैयार करते हैं .शाम में गाय को पीथा खिलाने के बाद एक नए बंधन से, जिसे हम ‘पोघा’ कहते हैं, से गुहाली में बांध देते हैं.गुहाली मतलब गाय का घर.इसके बाद ‘जात’ जलाते हैं.जिससे गाय के पास माखी( मख्खी) , मच्छर आदि न आ सकें.साथ में गाते हैं –
“दिघोलोटी दिघोल पात
माखी मारू जात जात !”

आज के दिन की एक खास बात और होती है. आज हम लोग जो सब्जी बनाते हैं वो 101 प्रकार की सब्जियों का मिक्स होती हैं.इसमें 101 प्रकार की जंगली सब्जियां होती हैं.ऐसा माना जाता है कि ये स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है और हमे निरोग काया प्रदान करती है.

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पेशे से शिक्षक गीताली, घूमने की शौक़ीन हैं। वो अक्सर अपनी कार में लम्बे सफ़र पर पायी जाती हैं। गणित में स्नातकोत्तर गीताली असमिया, बंगाल, अंग्रेजी सहित कई भाषाएँ बोलती हैं। अभी हाल में उन्होंने हिंदी भी सीख ली है। हालाँकि उनका अभ्यास भारतीय शास्त्रीय संगीत का है, मगर अपने खाली वक्त में वो हर किस्म का संगीत सुनती हैं। उनका लिखा फेसबुक पर ख़ासा पसंद किया जाता है।

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