पुरानी बात है, कई साल पहले, जी हाँ 1963 के सितम्बर महीने की सातवीं तारिख थी जब एक ब्राह्मण परिवार में नीरजा का जन्म हुआ। चंडीगढ़ के ही स्कूल में पढाई की इस लड़की ने और वहीँ के कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन भी पूरा किया। बाईस साल की उम्र में उसकी शादी हुई और किसी खाड़ी देश में अपने पति के साथ वो घर से निकली। ये शादी ज्यादा दिन टिकी नहीं और दो ही महीने बाद वो वापिस मुंबई आ गई। ऐसी कई घटनाओं में जैसा होता है, वैसे ही अपनी जिन्दगी वो अफ़सोस करती भी काट सकती थी, लेकिन उसने ऐसा किया नहीं। Pan Am में उसने एक फ्लाइट अटेंडेंट (एयर होस्टेस) की नौकरी ढूंढ ली। मिआमि से ट्रेनिंग करने के बाद वो लौटी और नौकरी में जुट गई।

उसके तेईसवें जन्मदिन से ठीक दो दिन पहले एक दुर्घटना हो गई। इस एक दुर्घटना ने नीरजा को एक नाम दे दिया, उसके परिवार को गर्व से सर ऊँचा करने की वजह दे दी, और साथ ही कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को शर्मिंदगी की एक वजह भी। 5 सितम्बर, 1986 को चार इस्लामिक आतंकियों ने Pan Am की 73 नंबर की फ्लाइट को हाईजैक कर लिया। Frankfurt और उस से आगे New York जाते इस जहाज को इस्लामिक आतंकवादियों ने कराची की तरफ मोड़ दिया। उनके निशाने पर जहाज में मौजूद अमरीकी नागरिक थे।

 

नीरजा ड्यूटी पर थी चालाकी से उसने जहाज के हाईजैक कोड को चला दिया। कॉकपिट के तीनो सदस्य दरवाजा बंद कर के बचने में कामयाब हुए। मगर जहाज में मौजूद यात्रियों की जान अभी भी खतरे में थी। इस्लामिक आतंकियों से मुकाबला करने के लिए जहाज में कोई हथियार नहीं था।

 

लेकिन नीरजा के पास सिर्फ एयर होस्टेस की ट्रेनिंग थी। चार चार हथियारबंद इस्लामिक आतंकियों का मुकाबले में वो कहीं से नहीं ठहरती थी। यात्रियों की सुविधा का ख़याल रखने पर उसकी ज़िम्मेदारी ख़त्म होती थी, उनकी जान बचाना या इस्लामिक आतंकियों से लड़ना उसकी ज़िम्मेदारी भी नहीं थी।

 

मगर ये उसी मिट्टी की बिटिया थी जहाँ रानी पद्मिनी, रानी झाँसी और रानी चेनम्मा जैसे बहादुर जन्मे हैं ! फिसलने वाली एक पट्टी हवाई जहाज के इमरजेंसी एग्जिट के बाहर ही लगी होती है। नीरजा को उसे चलाने और दरवाजे को खोलने की ट्रेनिंग मिली थी। नीरजा ने वो दरवाजा खोलकर यात्रियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया। इस्लामिक आतंकियों ने उसकी हरकत देख ली और उसे रोकने के लिए बंदूकें भाग रहे यात्रियों की तरफ घुमा दी।

 

नीरजा उस वक्त तीन बच्चों को बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी गोलियों और बच्चों के बीच में वो 22 साल की लड़की दरवाजा पकड़े खड़ी रही। बच्चे निकल गए, इस्लामिक आतंकियों की दर्ज़नों गोलियां अपने बदन पर रोकती लड़की वहीँ वीरगति को प्राप्त हुई।

 

नीरजा भनोत भारत की सबसे कम उम्र की अशोक चक्र विजेता हैं। पकिस्तान ने उन्हें तमगा ए इंसानियत से सम्मानित किया और “Justice for Crimes Award” भी मिला उन्हें। 2004 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक पोस्टल स्टाम्प भी जारी किया है। सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले आज के समाज को नीरजा जैसे प्रेरणा श्रोतों की जरुरत है।

 

हमें हमारी नायिकाएं फिर से चाहिए।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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