नैरेटिव बिल्डिंग (Narrative Building) को हिंदी में आप कथानक गढ़ना कह सकते हैं, लेकिन भाव में बहुत फर्क आ जाता है। ये कुछ कुछ हिंदी के ‘जूठन’ को अंग्रेजी में ‘Leftovers’ कहने जैसा होगा। लेफ्टओवर से ये तो पता चल जाता है कि बचे हुए खाने की बात की जा रही है, लेकिन वो सिर्फ ‘बासी’ या बच गया खाना होगा, या फिर किसी और का खाया हुआ अनहायजिनिक (unhygenic) है ये पता नहीं चलता। हिंदी में कहने पर ‘जूठा’, ‘बासी’ और बचा हुआ तीन अलग अलग चीज़ें होती हैं। जूठे जैसा ही घृणा का भाव नैरेटिव बिल्डिंग में जुड़ा होता है।

हिन्दू विश्व की सबसे पुरानी जीवित सभ्यता होने के वाबजूद हमलावर कौम नहीं थे। उन्हें लगातार आक्रमणों का सामना और सबसे लम्बे समय तक रेजिस्टेंस (resistance) का अभ्यास तो था लेकिन हमले करने का अभ्यास नहीं था। इसलिए नैरेटिव बिल्डिंग के हथियारों का उन्हें इस्तेमाल ही नहीं करना पड़ा, तो इसके लिए अलग शब्द नहीं बने। इसका इस्तेमाल देखना हो तो ‘हुसैनी ब्राह्मणों’ का टीवी बहसों और कभी कभी मीडिया के अन्य रूपों में जिक्र सुनिए-पढ़िएगा। ये नैरेटिव बिल्डिंग का एक अच्छा उदाहरण होता है, जो भारत में ही आसानी से दिख जाएगा।

अजादारी (मुहर्रम का ताजिया) की इजाज़त भारत के शिया मुसलमानों को है। कोई भी सुन्नी मुल्क शिया मुहम्मडेन को ताजिया निकालने नहीं देता, सभी जाने माने इस्लामिक मुल्कों में इसपर कानूनी प्रतिबन्ध है। प्रतिबन्ध का मतलब समझ ना आ रहा हो तो बता दें कि कश्मीर के आजादी के नारों में आजादी का मतलब इस्लामिक हुकूमत बताया जाता है। वहां पर भी ताजिये के जुलूस पर कानूनी प्रतिबन्ध है, शिया मुसलमान ताजिया नहीं निकाल सकते। इस मुहर्रम के मातम से ही ‘हुसैनी ब्राह्मणों’ का किस्सा जोड़ा जाता है, इसलिए आप अभी से सितम्बर-अक्टूबर तक में ये नाम सुन लेंगे।

इस कपोल कल्पना को पहले तो नाथन्विलाल वहशी से जोड़ा गया जो तथाकथित रूप से कोई ‘हिन्दू’ लेखक थे। हालाँकि ‘वहशी’ उपनाम हिन्दुओं में कहाँ होता है ये मैं नहीं ढूंढ पाया, हाँ इस्लामिक इतिहास में एक प्रसिद्ध गुलाम का नाम ‘वहशी’ था ये जरूर मिला। ‘वहशी’ की लिखी किताबों का नाम भी नहीं पता लेकिन जैसा की नैरेटिव बिल्ड किया गया है उसके मुताबिक उनकी कहानी का एक हिन्दू व्यापारी मुहर्रम के आठवें रोज़ हुसैन इब्न अली से मिला और उसने हुसैन इब्न अली से कुछ बातें की। नैरेटिव के मुताबिक उसने बताया था कि वो पास के शहर बसरा का है।

कथानक के इस हिन्दू व्यापारी के पिताजी के पास अली ने कुछ युद्धों में लूटी गई दौलत छोड़ी थी। इसलिए व्यापारी हुसैन इब्न अली की मदद करने आया था, लेकिन हुसैन इस ‘हिन्दू व्यापारी’ को अपने पक्ष में हथियार उठाने से मना कर देते हैं। इसी कल्पना को उठा कर सैय्यद अकबर हैदर ने अपनी किताब “Reliving Karbala: Martyrdom in South Asian Memory” में डाल दिया। अब ये ‘हुसैनी ब्राह्मण’ के लिए रिफरेन्स के तौर पर इस्तेमाल होती दिखेगी। मजेदार ये भी है कि कथाएँ गढ़ने वाले यही लोग कभी ये कहना नहीं भूलते कि हिन्दुओं में जातिवाद होता था और बनिया-व्यापारी वैश्य होता था, ब्राह्मण नहीं हो सकता।

इसी कथा को मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी के जरिये और आगे बढ़ा कर स्थापित करने की कोशिश की गई। मुंशी प्रेमचंद का लिखा भी काल्पनिक साहित्य ही है, कोई तथ्यों पर आधारित इतिहास नहीं है। इस कहानी में भी हुसैन इब्न अली किसी को जंग में शामिल होने से मना करते दिखते हैं और शामिल होने आया व्यक्ति अफ़सोस कर रहा होता है कि बुतपरस्त होने की वजह से मुहम्मडेन उसपर भरोसा नहीं करते। जो एक अल्लाह, उसके भेजे नबी और उसकी एक किताब पर ‘ईमान’ नहीं लाया उसे ‘ईमानदार’ नहीं माना जाता। इसी कहानी को थोड़ा घुमा फिर कर एक ‘रहाब सिद्ध दत्त’ का किस्सा जोड़ा जाता है।

जब आप ‘रहाब’ नाम ढूँढने निकलेंगे तो फिर से वही होगा जो ‘वहशी’ ढूंढने पर होता है। रहाब एक अरबी शब्द है जिसका मतलब ‘चौड़ा’ होता है। इस नाम की एक वेश्या का जिक्र आप इतिहास में ढूंढ पायेंगे। कथित रूप से ये और इनके सात बेटे हुसैन साहब की तरफ से लड़ने गए थे। इतिहास में कहीं इनका जिक्र नहीं आता लेकिन दो एक काल्पनिक कथाओं की मदद से इन्हें स्थापित करने की कोशिश जोर शोर से जारी है। इसे स्थापित करने का प्रयास टी.पी. रसेल स्ट्रेसी की किताब की मदद से भी किया जाता है जिसमें इतिहास के रूप में किसी ‘हुसैनी ब्राह्मण’ का कोई जिक्र नहीं आता (History of The Muhiyals:The militant Brahmin clan of India, T.P. Rusell Stracey, 1911)।

जिन लोगों ने इस नैरेटिव को बनाया वो इसका फायदा उठाने के लिए आज कहीं नहीं हैं। इस कथानक का लाभ उनकी अगली राजनैतिक पीढ़ियों को हुआ है, जो सीधे उनके रिश्तेदार भी नहीं होते थे। ऐसी लम्बे समय की सोच के साथ ही नैरेटिव बिल्डिंग की लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं। कथानक गढ़े जाते हैं और हमला जारी रखा जाता है। हमलावरों को अच्छी तरह पता था कि हिन्दुओं की शिक्षा-दीक्षा का जिम्मा ज्यादातर ब्राह्मणों ने संभाल रखा है। अगर वो ब्राह्मणों के एक बड़े वर्ग को ही अहिन्दू सिद्ध कर दें तो कई लोगों के लिए शिक्षा लुप्त हो जायेगी। अनपढ़-अज्ञानी का राजनैतिक लाभ उठाना आसान होता है ये करते तो राजनीतिज्ञ दिखेंगे ही। ‘टू मिनट मैग्गी’ हिन्दू जो कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी में होते हैं, उन्होंने लम्बे समय की ऐसी लड़ाइयाँ सीखने-जानने की कोशिश भी नहीं की।

“बस अभी मिल जाए ? मुझे ही मिल जाये, अगली पीढ़ी का इन्तजार कौन करेगा ? बटन दबाते ही क्यों नहीं मिला ?”, की जो स्वार्थी सोच थी उसने सिर्फ सौ साल में क्या नुकसान किया है, नैरेटिव बिल्डिंग वालों का राजनैतिक रुझान क्यों पूछना चाहिए, जैसे सवालों का जवाब इस ‘हुसैनी ब्राह्मण’ के नैरेटिव बिल्डिंग में मिलता है। बाकी ये बताइये आपने जो इतिहास की किताबें पढ़ी हैं वो किस राजनैतिक विचारधारा वालों ने लिखी है ? अपनों ने लिखी है या विदेशियों ने लिखी है ? अपने बच्चों को कौन सा इतिहास पढ़ा रहे हैं, वो तो पता है ना ? वो किताबें नैरेटिव बिल्ड कर के आपके बच्चों को आपको गाली देना तो नहीं ही सिखा रही होंगी ? सिखाती हैं क्या ?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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