ऐसा आमतौर पर एबस्ट्रेक्ट पेंटिंग की गैलेरी में होता है। कई बार आप घूर कर सामने टंगी कलाकृति को देखते हैं, कुछ सोचते हैं, फिर आगे बढ़ जाते हैं। फिर दो चार पेंटिंग देखने के बाद अचानक कुछ ख़याल सा आता है और आप वापिस उसी पेंटिंग पर चले जाते हैं। कभी एक बार में ही कोई एक पेंटिंग आपका ध्यान खीचती है और फिर आप बाकी पर गौर ही नहीं कर पाते। अगर निखिल सचान के कहानी संग्रह, “नमक स्वादानुसार” को पढ़ने बैठे हैं तो आपके साथ ऐसा ही होगा। ये शब्दों से बनी एबस्ट्रेक्ट चित्रकारी है।

इसमें “नमक स्वादानुसार” नाम की कोई कहानी भी नहीं है, शायद ये अंग्रेजी के जुमले “टेकन विथ अ पिंच ऑफ़ साल्ट” के लिए इस्तेमाल हुआ होगा। ये नाम इसलिए है क्योंकि इसकी कहानियाँ एक ही बार में पसंद आ जाएँ ऐसा भी नहीं होगा। अपनी पसंद के हिसाब से आपको कम, या ज्यादा नमक मिलाना होगा। हिन्दी लेखन जगत के “शुद्धतावाद” को ये कहानियां फिर भी हजम नहीं होंगी। इसकी भाषा कोई क्लिष्ट साहित्य की शब्दावली से अलंकृत नहीं है। ये वो आम बात चीत का तरीका है जिसमें हम आप हर रोज़ बातें करते हैं। इसलिए चरित्र गढ़े हुए, नकली नहीं लगते, आस पास के ही किसी का किस्सा मालूम होते हैं।

इस कहानी संग्रह में कुल नौ कहानियां है, जिनमें से हरेक का विषय अलग अलग है। आखरी कहानी “बाजरे का रोटला, टट्टी और गन्ने की ठूंठ” गरीबी में पल रहे एक बच्चे की कहानी है, जहाँ पाठक को गरीबी कम व्यथित करती है। वहां पैसे और उस के असर से आने वाली अकड़ विस्मित करेगी। “टोपाज़” और “सुहागरात” के लिए निखिल बताते हैं कि ये फिल्मों से प्रेरित हैं। कैसे प्रेरित हैं ये समझने के लिए पाठक को शायद फ़िल्में दोबारा देखनी पड़े। हाँ, फ़िल्में देखने के लिए कहानी का असर ख़त्म होने तक इंतज़ार करना होगा। फिल्मों से मिलती जुलती एक और चीज़ इस संग्रह की ये भी है कि फ़िल्में तभी हिट होती हैं, जब दर्शक उसे दोबारा देखने आयें। “नमक स्वादानुसार” की कहानियां पढ़ने दोबारा आना पड़ता है।

इन कहानियों में एक नजर में जो चीज़ दिखती है वो ये भी है कि कहानियों के पात्र या तो बच्चे हैं, या युवा हैं। वो अभी बूढ़े नहीं हुए। पात्र बूढ़े नहीं हैं, इस वजह से कहानियां ठहर कर बोर भी नहीं करती। अंग्रेजी किताबों में जिसे “कमिंग ऑफ़ ऐज” कहा जाता है ये उसी युवा वर्ग के लिए लिखी हुई कहानियां हैं। पात्रों की समस्याएँ, उनकी लड़ाई, पूरी दुनियां को ख़त्म होने से बचाने की लड़ाई नहीं है। पात्रों की समस्याएँ युवाओं की दुनियां है, उनके लिए ये जद्दोजहद समझ में आने वाली है। हिंदी साहित्य जो युवा वर्ग की कहानियों से कटा हुआ रहता है, ये उस खाली जगह में फिट होने वाली कहानियों की किताब है।

अगर तेजी से एक बार में पढ़कर ख़त्म करने वाली किताब चाहिए तो ये 165 पन्ने की किताब उठा कर देखिये। यौवन शेष होगा तो आप इन कहानियों पर दोबारा फिर लौट कर आयेंगे। एबस्ट्रेक्ट पेंटिंग की तरह, जिसे दोबारा फिर देखकर समझना होता है। आज ये वाली कहानी अच्छी लगी, कल कोई और पसंद आएगी क्या ? ये भी चुनना पड़ता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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