सवैया
दीनसहायक नाम तुम्हार सुना बहु ग्रंथन में महाराज |
है शबरी गजगीध अजामिल ते अजहुं जिहिकोयशछाजा ||
जो करणी सुमिरों इनकी तबहीं मन धैर्य्य लहै रघुराज |
दिन पुकारकरै ललिते प्रभु बेगि द्रवों हे गरीब नेवाजा ||
सुमिरन ||
गया न किन्ही जिन कलयुग माँ
काशिम घोडा दान नहिं दीन ||
जनमत बैरी जिन मारा ना
नाहक जन्म जगत में लीन १
पूजा कीन्ही नहिं शम्भू की
अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ||
फिरि गलमाँदरी जिन बजी ना
मुख ना बम्ब बम्ब गा छाय २
भसमरमायो नहिं देहि माँ
कबहूँन लीन सुमिरनी हाथ ||
सोचन लायक ते आरय हैं
जिन नहिं कबों नवायोमाथ ३
को अस देवता रहै शम्भुसम
जिनको पूज्यो राम उदार ||
वेद उपनिषद के ज्ञाता रहैं
जिनबल भयो रावणछार ४
छुटी सुमिरन गै देवन कै
शाका सुनो शुरमनक्यार ||
ब्याह बखानों मैं आल्हा का
होई तहाँ भयानक मार ५
अथ कथाप्रसंग
नैनागढ़ का जो महाराजा
सजा सबै भांति कर्त्तार ||
राजा इन्दर का बरदानी
औ नैपाली नाम उदार १
तिन घर कन्या इक पैदा भे
सबबिधि रूप शीलगुणखान ||
पढ़ीकै विद्या सब जादू की
कछुदिनबाद भई फिरिज्वान २
संगसहेलिन के खेलति भय
सुनवाँ कही तसुका नाम ||
खेल लरिकईं को जाहिर है
लरिका ख्यलें चारिहूयाम ३
खेलत खेलत फुलबगिया गईं
सब मिलि करैं फुलनकी मार ||
कटहर बड़हर त्याही बगिया में
कहुं कहुं फूल रही कचनार ४
उठे सुगंध कहू चन्दन की
कतहूँ कतलिन खड़ी कतार ||
गुम्मज सोहैं मोमशिरिन के
कहूँ कहुं फुलीं चमेलीडार ५
बेला फूले अलबेला कहुं
खिन्नन लाता गईं बहुछाय ||
हर्र वहेरा सांखो बिरवा
सीधे चले ऊपर को जायें ६
बरगद छैलें हैं नीचे को
फैले भूमि रहे नियराय ||
जैसे सम्पति सज्जन पावैं
नीचे शीश झुकावट जाएँ ७
शीशम जानो तुम नीचनको
आधे सरग फरहरा खाएं ||
चलै कुल्हाड़ा जब नीचेते
गिरिके टूक टूक ह्वैजाएँ ८
को गति बरणे तहाँ अधमनकै
सो हैं करिल रूपते भाय ||
टाल तमालन कै गिनतिना
कदमन गई सघनता छाय ९
फुली नेवारी अब अगस्त्य हैं
आमनडार क्केलिया बोल ||
सोहें अशोकन के बिरवा भल
तीनो चाहं बयारी डोल १०
गुलर जामुन पाकर पीपर
कोनन खड़े वृक्ष सरदार ||
तार अपारन के बिरवा बहु
कहुं कहुं खड़े वृक्ष कह्वार ११
टेसू फूलें कहुं सोहत हैं
जैसे सोहें लडैता ज्वान ||
रूप गुलाबन को देखंत खन
फुलनछांडीदीन अभिमान १२
कौन कनेरण को वर्णन कर
चांदनि चाँद सरिस गै छाय ||
फूल दुपहरी के भल सोहैं
मोहैं मुनिन मनै अधिकाय १३
गेंदन केरे बहु बिरवा हैं
अर्जुन बृक्ष परैं दिखराय ||
मिला लाग्यो नौरंगिन का
हेला निम्बुन का दर्शाय १४
ठेला भरि भरि अमरूतन का
माली राजभवन को जाय ||
केवांडा केरी उठें सुगंधे
कहुंकहुं नागबेलिगे छाय १५
ताही बगिया सुनवाँ खेलै
मेलै गले सखिन के हाथ ||
सखियाँ बोली तहाँ सुनवान्ते
तुम नित ख्यलोहमारेसाथ १६
पैर महावर पै तुम्हरे ना
टिकुली नहीं बिराजै भाल ||
द्रव्य तुम्हारे का घर नाहीं
जो नहिं ब्याह करै नरपाल १७
इतना कहिकै सब आलिनने
औ करताली दीन बजाय ||
समय दुपहरी को जान्यो जब
तब फिरि खेलबन्द ह्वैजाय १८
कीरति गावैं सब आल्हा की
माड़ो लिहेनि बापका दाएँ ||
धन्य बानफ़र उदयसिंह हैं
आल्हा केर लहुरवा भाय १९
ऐसी बातैं सखियाँ करतै
अपने भवन पहुँचीं आय ||
ताही क्षणमें सुनवाँ मन में
अपने ठीक लीन ठहराय २०
ब्याही जैबे आल्हा संग में
की मरिजाब जहर को खाय ||
छाय उदासी गै चिहरा में
पूँछै बार बार तब माय २१
कौन रोग है त्वरि देही माँ
बेटी हाल देउ बतलाय ||
पीली ह्वैगै सब देही है
औतनकाँपिकाँपिरहिजाय २२
को हितकारी है मातासम
नाता बड़ा जगत केहिभाय ||
अब तो बाबा कलियुग आये
माता सहैं लात के धाय २३
सुनिकै बातें ये माता की
सुनवाँ चरणन शीश नवाय ||
जो कछु भाषारहै सखियनने
सुनवाँ मातै गई सुनाय २४
सुनीकै बातैं सब कन्या की
माता रही समय को देखि ||
यकदिन ऐसा आनपहूंचा
राजा रहा कन्यका पेखि २५
रानी बोली तब राजाते
हमरे वचन करो परमान ||
ब्याहन लायक यह कन्या भए
सोतुमजानो नृपतिसुजान २६
सुनिकै बातैं ये रानी की
बिजिया बेटा लीन बुलाय ||
नाई बारी को बुलवायो
तिनते कह्योहालसुझाय २७
जयो मोहोबे ना टीका लै
सब कहूँ जाउ तुरतही धाय ||
नाई बारी तुरतै चलिभे
पहुंचे नगर नगर में जाय २८
काहू टीका को लिन्ह्यो ना
नैनागढ़े पहूचे आय ||
खबरि सुनाई सब राजा को
नेगिनचरणशीशनवाय २९
जालिम राजा नैनागढ़ का
राजन यही विचार जीय ||
मारे डरके छाती धड़कै
कैसेहोयें तहांपर पीय ३०
थोरी थोरी फौजें लैकै
नैनागढ़ै पहूंचे आय ||
नजरी दीन्ह्यो नैपाली को
राजाचरण शीशनवाय ३१
सरबरि तुम्हरि का नाहीं हैं
टीका लैयं कहौ कास भाय ||
कुमुक तुम्हारी को आयन है
राजन सत्यदीन बतलाय ३२
त्यही समैया त्यही औसरमाँ
औ सुनवाँ को सुनो हवाल ||
हीरामणि सुवनाको लैके
सुनवाँ भई रोवासिनिबाल ३३
चुम्यौ चाट्यो त्यहि सुवनाको
औफिरिकह्योवचन यह गाय ||
मेवा खायो भल पिंजरन में
अब गाढ़े में होउ सहाय ३४
लैके पाती जाउ मोहोवे
देवो उदयसिंह को जाय ||
लिखी हक़ीकत सब आल्हाको
सुनवाँ बार बार समुझाय ३५
नामी ठाकुर तुम मोहबे में
हमरो ब्याह करो अब आय ||
नहिं मरि जायो जहर खायकै
दूनो भाइ बानफ़रराय ३६
लिखिकै पाती गल सुवनाके
सुनवाँ तुरत दीन लटकाय ||
मूठी दीन्ह्यो फिरि कोठे ते
सुवना चला मोहोबे जाय ३७
चन्दन बगिया सुवना पहुँच्यो
तहं पर रहै उदयसिंहराय ||
चन्दन ऊपर सुवना बैठो
परिगा दृष्टि तुरतही आय ३८
भल चुचकास्यो उदयसिंह ने
आपन नाम दीन बतलाय ||
सुवना बैठ्यो तब हाथेपर
पाति छोरी लीन हर्षाय ३९
बांचिकै पाती तब उदन ने
औ सय्यद को दीन सुनाय ||
सय्यद आल्हासों बतलायो
मलखे देबै दीन बताय ४०
लैकै पति औ सुवना को
गे परिमाल कचहरी धाय ||
कही हकीकति सब राजा सों
पाती दीन उदयसिंहराय ४१
पढ़ीकै पाती को परिमालिक
मनमाँ गए सनाकाखाय ||
होश उड़ान्यो परिमालिक को
मुँहकाबिरागयो कुम्हिलाय ४२
बोली ना आवा परिमालिक सों
औ द्वाढालों लार सुखाय ||
थर थर थर थर देहि काँपी
शिरसों मुकुट गिरा भहराय ४३
रोम रोम सब ठाढ़े ह्वैगे
नैनन बही आँसू की धार ||
धीरजधरिकै परिमालिक फिरि
औ मलके tan रहे निहारि ४४
मलखे बोले तब राजा ते
साँचे बचन सुनो नरपाल ||
टीका पठयो है बेटी ने
सोंहिंलौटीसकैक्यहुकाल ४५
सुनिकै बातें मालखाने की
बोले तुरत रजापरिमाल ||
ब्याधि नशायो गढ़माड़ो को
दूसरि ब्याधिभयोफिरिहाल ४६
टीका फेरो नयनागढ़ को
मलखे मानो कही हमार ||
जालिम राजा नयपाली है
ज्यहिघर अमरढोल सरदार ४७
कौन बियाहन त्यहि घर जैहै
ऐहै लौटि कौन बलवान ||
टीका फेरो सब राजन ने
मानो कही वीर मलखान ४८
सवैया
शान ठाढ़ी मलखान के ऊपर आँ नहीं कछुहू नृप राखी |
मोहिं पियार न प्राण भुवार कहौ मैं सत्य सदाशिव साखी ||
कीरतिही प्रिय विरनको हम शान कि आन सदा मनमाखी |
आनरहैनहिं शान कि जो मरिजान भलो ललिते हम भाखी ||
इतना कहिकै मालखाने ने
डंका तुरत दीन बजवाय ||
लिखिकै उत्तर उदयसिंह ने
सुवना गरे दीन लटकाय ५०
उड़ीकै सुवना फिरि मोहोबे ते
सुनवाँ पास पहूंचा आय ||
रानी मल्हना के महलन में
राजा तुरत पहूंचे जाय ५१
हाल बतायो सब मल्हना को
सुनतै गई सनाका खाय ||
मलखे देवा को बुलवायो
सुनतै गये महल में आय ५२
मल्हना बोली तब मलखे ती
बेटा हाल देउ बतलाय ||
कहे डंका तुम्हरे बाजे
कहाँ चढ़ीजाउ बानफ़रराय ५३
हाथ जोरिकैमलखे बोले
मल्हना चरणन शीश नवाय ||
पाती आई नैनागढ़ की
आल्हा तहाँ बियाहन जाएँ ५४
सुनिकै बातैं मालखाने की
मल्हनै देवै कहा सुनाय ||
शकुन तुम्हारे सो मलखाने
माड़ो लीन बाप का दाएँ ५५
कैसी गुजरी नैनागढ़ में
सो सब हाल देव बतलाय ||
सुनिकै बातैं ये मल्हना की
देवा पोथी लीन मंगाय ५६
लैकै पोथी ज्योतिष वाली
औ सब हाल दीन बतलाय ||
जीति तुम्हारी यहाँ हैहै
साँची बात कहैं हम माय ५७
इतना कहिकै दूनों चलि भे
महलन भये मंगलाचार ||
बांदी आँगन लीपन लागी
पंडित साइति रहे बिचार ५८
एक कुमारी तेल चढ़ावै
गावनलगीं सखी त्यहिकाल ||
माय मंतरा भे पाछे सों
नेगिननेग दीन परिमाल ५९
लैकै महाउर नाइनि आई
नहखुर होनलाग त्यहिबार ||
नाइनि मांग्यो तहं पुरवाको
दीन्ह्यो मल्हना परम उदार ६०
उबटन करिकै तन केसरसों
निर्मलजलसों फिरिअन्ह्वाय ||
कंकण बांधागा आल्हा के
दूलह बने बानफ़रराय ६१
सजी पालकी तहं ठाढ़ीथी
तापर बैठी शम्भू को ध्याय ||
कुंवा बियाहन आल्हा पहुंचे
मल्हना पैर दीन लटकाय ६२
पहिली भांवरि के फिरतैखन
आल्हा गह चरणको धाय ||
बाग़ लगावों तेरे नाम की
माता लेवो चरण उठाय ६३
ऐसो कहिकै सातों भाँवरि
घूमा तुरत बनाफ़रराय ||
मल्हना बोली फिरि आल्हा सों
सेयों तुमको दूध पियाय ६४
तासों द्यावलि सों अधिकी मैं
तासों पैर दीन लटकाय ||
पंजा फेरयो फिरि पीठी माँ
तुम्हरो बार न बांको जाय ६५
पांय लागीकै फिरि द्यावलिके
पालकी चढ़े बनाफ़रराय ||
हुकुम लगायो बधउदन ने
डंका बजन लाग घहराय ६६
घोड़ करिलिया आल्हा वाला
कोतल चला पालकी साथ ||
मलखे पपीहापर बैठत भे
नायकै रामचंद्र को माथ ६७
घोडा मनोहरा की पीठी माँ
देबा तुरत भयो असवार ||
सय्यद सिरगा पर बैठत भे
नाहर बनरस के सरदार ६८
अली अलामत औ दरियाखां
बेटा जानबेग सुलतान ||
तेग बहादुर अली बहादुर
बैठे घोड़ आपने ज्वान ६९
मीराताल्ह्न के लरिका ये
नाहर समरधनी तलवार ||
मन्नागूजर मोहबे वालो
सोऊ बेगि भयो असवार ७०
सातलाख लग फौजें सजिकै
नैनागढ़ को भई तयार ||
डंका बाजें अह्तंका के
उदन बेंदुलपर असवार ७१
सजे बाराती सब मोहबे के
जल्दी कूच दीन करवाय ||
सातरोज़ की मैजली करिकै
फौजें अटी धुरा पर आय ७२
आठ कोस नैनागढ़ रहिगा
तहंपर डेरा दीन डराय ||
तम्बू गडिगा तहाँ आल्हा का
बैठे सबै शूरमा आय ७३
ऊँचे ऊँचे तम्बू गड़ीगे
नीचे लागीं खूब बाजार ||
कम्मर छोरे रजपूतन ने
हाथिन हौदा धरे उतार ७४
तंग बछेड़न की छोरी गईं
क्षत्रिन धारा ढाल तलवार ||
बनी रसोई रजपूतन की
सबहिनजेंयलीन ज्यँवनार ७५
गा हरकारा तब तहँनाते
जहाँना भरीलाग दरबार ||
बैठक बैठे सब क्षत्री हैं
एकते एक शूर सरदार ७६
गम् गम् गम् गम् तबला गमकें
किन् किन् परी मंजीरन मार ||
को गतिबरनै सारंगी कै
होवै नाच पतुरियन क्यार ७७
खये अफिमनके गोला कोउ
पलकैं मूंदे और रहिजाएँ ||
कोऊ जमाये हैं भांगन को
मनमाँ रहे रामयश गाय ७८
उड़े तमाखू बुटवल वाली
धूंवना रहा तहांपर छाय ||
हाथ जोरि औ बिनती करिकै
धावन बोल्यो शीशनवाय ७९
अई बरातें क्यहू राजाकी
घूरे परीं आजही आय ||
आठकोस केहैं दुरीपर
सांची खबरि दीन बतलाय ८०
सुनिकै बातैं नयपाली ने
तीनो लड़िका लये बुलाय ||
जोगा भोगा औ बिजियाते
राजा बोल्यो बचन सुनाय ८१
जावो जल्दी तुम घूरेपर
हमको खबरि सुनावो आय ||
सुनिकै बातै  तीनो चलिभे
घूरे तुरत पहूंचे जाय ८२
ऊँचे टिकुरी तीनो चढीकै
दूरिते द्यखैं तमाशा भाय ||
देखिकै फौजें मालखाने की
तीनों गये तहाँ सन्नाय ८३
तीनों लौटे त्यहि टिकुरिते
अपने महल पहूंचे आय ||
भोजन केरी फिरि बिरियामाँ
राजै खबरि दीन बतलाय ८४
लगी कचहरी ह्याँ आल्हाकी
भारी लाग तहाँ दरबार ||
बैठक बैठे सब क्षत्री हैं
एकते एक शूर सरदार ८५
मीराताल्हन बनरसवाले
आलि खानदान के ज्वान ||
बड़े पियारे ते क्षत्रिन के
अपने धर्म कर्म अनुमान ८६
सच्चे साथी रहें चारों के
यारों मानों कही हमार ||
ऐसे होते जो सय्यद ना
कैसे बने राहत सरदार ८७
अली अलामत औ दरियाखां
बेटा जानबेग सुलतान ||
औरो लड़िका रहैं सय्यदके
एकते एक रूप गुणखान ८८
मन्नागुजर मोहबे वाला
बैठा बड़ा सजीला ज्वान ||
रुपनाबारी ते त्यहि समया
बोले तहाँ बीर मलखान ८९
ऐपनवारी बारी लैकै
राजैद्वार पहूँचो जाय ||
सुनिकै बाते मालखाने की
रुपना बोला शीशनवाय ९०
औरो नेगी मोहबे वाले
आये साथ बनाफर राय ||
ऐपनवारी बारी लैकै
द्वारे मूड कटावै जाय ९१
सुनीकै बातें ये रुपना की
बोले तुरत उदयसिंहराय ||
तुमको नेगी हम मानै न
जानै सदा आपनो भाय ९२
ददा बियाहन को रहि हैं ना
बतियाँ कहिबे को रहिजाएँ ||
यश नहींजावै नर मरिजावै
परहित देवै मूडकटाय ९३
स्वारथ देही तब नरकेही
नेही मरे न पावै चाम ||
सन्मुख जूझे समरभूमि में
जावै तुरत हरी के धाम ९४
बड़े प्रतापी जग में जाहिर
मनियांदेव मोहोबे केर ||
तिनके सेवक तेई रक्षक
रुपन काह लगावो देर ९५
रूपन बोला तब मलखे ते
दादा मानो कही हमार ||
घोड़ करिलिया आल्हा वाला
अपने हाथ देउ तलवार ९६
सुनिकै बातै ये रुपना की
मलखे घोड़ दीन सजवाय ||
ढाल खड्ग रुपना को दैकै
बैठे तुरत बनाफरराय ९७
बैठिकै रुपना फिरी घोड़े पर
ऐपनवारी लीन उठाय ||
चारिघरी को अरसा गुजरो
नैनागढ़े पहूचो जाय ९८
देखिकै बारी दरवानी ने
भारी हांक दीन ललकार ||
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ
बोलो घोड़े के असवार ९९
सुनिकै बातैं द्वारपाल की
रूपन बोला बचन उदार ||
आल्हा ब्याहन को हम आये
नामी मोहबे के सरदार १००
खबरि सुनावो नैपाली को
फिरि तुम हमैं सुनावो आय ||
ऐपनवारी बारी लायो
ताको नेग देव पाठवाय १०१
सुनिकै बोलो द्वारपाल फिरि
तुम्हरो नेग काह है भाय ||
सोऊ सुनावों महराजा को
लादे लिहे घोड़ पर जाय १०२
सुनीकै बातें द्वारपाल की
रूपन बोला बचन उदार ||
चारिघरीभर चलै सिरोही
द्वारे बहै रक्त की धार १०३
नेग हमारो यहू प्यारो है
देवो पठे स्वई सरदार ||
जाही पियारो तन होवै न
आवै स्वई शूर अब द्वार १०४
सुनिकै बातें ये बारी की
आरी द्वारपाल ह्वै जाय ||
मनमें सोचै मनै बिचारै
मनमें बार बार पछिताय १०५
कैसो बारी यहु आयो है
नाहर घोड़ेका असवार ||
जालिम राजा नैपाली है
तासों कीं चाहै तलवार १०६
यहै सोचिकै द्वारपाल ने
औ रुपन ते कहा सुनाय ||
गरमी तुम्हारी जो उतरी हो
बोलो ठीक ठीक तुम भाय १०७
सुनिकै बातें दरवानी की
रूपन गरू दीन ललकार ||
नगर मोहोबा जगमें जाहिर
नामी मोहबे के सरदार १०८
तिनको नेगी मैं द्वारेपर
लीन्हे खड़ा ढाल तलवार ||
जौन सूरमा हो नैनागढ़
आवै देय नेग सो द्वार १०९
इतनी सुनिकै दरवानी ने
राजै खबरि सुनाई जाय ||
ऐपनवारी बारी लावा
भारी बात कहै सो गाय ११०
चारिघरीभर चलै सिरोही
द्वारे बहै रक्त की धार ||
जौन शूरमाहो राजाघर
आवै देय नेग सो द्वार १११
इतना सुनतै महराजाके
नैना अग्नि बाण ह्वै जाएँ ||
पूरण राजा पटनावाला
बोला राजै बचन सुनाय ११२
हम चलिजावैं अब द्वारेपर
बारी नेग देयं चुकवाय ||
इतना कहिकै चलि ठाढो भो
साथै औरो चले रिसाय ११३
सवैया ||
द्वार चले तलवार लिए रत मारहि मार कुमारन पेखा |
लाल गुपाल गाहे करबाल ख्यलें जसफाग भयऊ तस भेखा ||
मार अपार जुझार किये औ गिरे रणखेत रहे नहिं शेखा |
बारीकरै कब रारी नृपे ललिते मलखान कि है यह लेखा ११४
पूरन राजा पटना वाला
लीन्हे नांगि हाथ तलवार ||
सो धरि धमका त्यहि रुपनके
रूपन लीन ढालपर वार ११५
सांगी उठाई फिरि रूपन ने
राजै बार बार ललकार ||
लटुवा लाग्यो पूरन शिर में
औ बहिचली रक्तकी धार ११६
अगल बगल के फिरि मारतभा
दायें बायें दीन हटाय ||
ऍड़ा मसके फिरि मारत भो
फाटक तुरत पार ह्वैजाय ११७
गाली गाली में फिरि मारत भो
औ बहिचली रक्तकी धार ||
घरी चारके फिरि अरसा में
लश्कर आय गयो असवार ११८
लाले रंग सों भीजे दिख्यो
फागुन टेसू के अनुहार ||
पूँछी हकीकति तब मलखेने
नाहर मोहबे के सरदार ११९
कैसी गुजरी नैनागढ़ में
रूपन हाल देउ बतलाय ||
सुनिकै बातें मलखाने की
रूपन यथातथ्य गा गाय १२०
हल्ला ह्वैगा नैनागढ़माँ
जहाँ तहाँ कहाँ लागि सबकोय ||
ऐसे बहादुर जहांके परजा
तहंके नृपतिकहौ कास होयँ १२१
देखी तमाशा यहु बारी का
राजा बार बार पछिताय ||
बड़ी हीनता हमरी ह्वैगै
बारी जियतनिकरिगाहाय १२२
जोगा भोगा दोऊ लरिका
बोले हाथ जोरि शिरनाय ||
हुकुम जो पावैं महराजा का
सबकी कटा देयंकरवाय १२३
जितनी रांडें चढ़ी आई हैं
सो बिनघाव एक ना जायें ||
खेदिकै मारें हम मोहबे लग
टेटूवा टायर लयं चिनाय १२४
सुनीकै बातैं ये लरिकन की
राजै हुकुम दीन फ़रमाय ||
तुरत नगड़ची को बुलवायो
तासोंबोल्योहुकुमसुनाय १२५
बजै नगाड़ा नैनागढ़ में
सबियाँ फौज़ होय तय्यार ||
भोर भुर्हरे पहफाटत खन
मारों मुह्बे के सरदार १२६
इतना कहिकै दूनों चलिभे
अपने महल पहूंचे जाय ||
खेत छुटीगा दिननायक सों
झन्डागडानिशाको आय १२७
तारागण सब चमकन लागे
संतान धूनी दीन परचाय ||
परे आलसी निजनिज खटिया
घों घों कंठ रहे घर्राय १२८
माथ नवाबों पितु अपने को
जो नित मिरे करें सहाय ||
करों तरंग यहाँ सों पूरण
पूरण ब्रह्म राम को ध्याय १२९
आए फौजें दूनों सजिहैं
मची हैं घोर शोर घमसान ||
जोगा भोगा के मुर्चापर
लड़ी हैं खूब वीरमलखान १३०
बरातआगमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंग
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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