लगता है जैसे सदियों पहले की बात हो, मगर एक दौर था जब घर में पत्रिकाएं आती थीं। इन मासिक-त्रैमासिक प्रकाशनों में पाठक अपनी कहानियां भी प्रकाशित होने भेजते थे। अक्सर ये कोई साहित्यिक कृति नहीं, साधारण सी रोजमर्रा की कोई घटना होती। नव-विवाहितों, हाल में ही माँ बनी युवतियों की ये आपबीती, कहानी बन जाती। इन्हें पढना शायद इसलिए भी मजेदार होता था क्योंकि पाठकों को कई बार ऐसा लगता जैसे वो किसी और का जीवन जी पा रहे हों। जो अनुभव उन्हें हुए नहीं, कभी घर से दूर, कभी संयुक्त परिवार के विघटन में जो अनदेखा ही छूट गया, वो बदले रूप में सामने आ जाता।

ऐसे छोटे छोटे कॉलम में से कई बच्चों पर आधारित होते। कोई बच्चों की कही बातों पर आधारित होतीं, कोई उन्हें कुछ सिखाने में आई परेशानियाँ रहती थी। बच्चे कैसे बड़े होते हैं, उसका करीब करीब हर रूप एक नजर इन कहानियों में दिख जाता था। समय बदला, प्रकाशन का स्वरुप भी। कुछ तो अपने कंटेंट का स्तर लगातार गिरने, कुछ अजीब से प्रकाशनों के कारण पाठक ऐसी पत्रिकाओं से कटने लगे। पत्रिकाएँ घर आनी भी बंद हुई, साथ ही ये किस्से भी। बरसों बीते, ऐसे किस्से भी भूल गए और हम आगे निकल आये। अब पढ़ने में भी रुचियाँ बदल चुकी थीं।

प्रकाशकों के लिए स्त्री से जुड़े विवाद महत्वपूर्ण हो चले थे। उनसे प्रचार और प्रचार के पीछे, पैसे आने की कहीं ज्यादा संभावना होती। छोटे बच्चों की माँ, और उसके रोज के किस्से किसी को जरूरी नहीं लगे, वो सालों छपे नहीं। जैसे जैसे “नयी वाली हिंदी” का विकास होने लगा, लेखन के मठाधीशों से कलम का एकाधिकार छिनने लगा। पहले तो स्त्री ने सोशल मिडिया जैसे माध्यमो से अपनी कहानी खुद ही फिर से सुनानी शुरू की, फिर धीरे से ये अब किताबों में उतरने लगी है। पाठक समझने लगा है कि लेखन जैसे महत्वपूर्ण काम काएकाधिकार सिर्फ कुछ ख़ास अभिजात्य लोगों के हाथ में छोड़ना ठीक नहीं।

मम्मा का मुअम्मा”“ कुल जमा इक्कीस कहानियों का बण्डल है। एक छोटे से बच्चे के साथ उसकी माँ है, बच्चा रोज अनोखे सवाल परोसता है, माँ बैठी उसकी उलझनें सुलझाती होती हैं। ज्यादातर सवाल सुलझते हैं, क्योंकि हम सब जानते हैं कि “माँ को सब पता होता है”। लेखिका माया सिंह ने अपने जिज्ञासु बच्चे के साथ हुई अपने ही सवालों को कहानियों की शक्ल दी है। ये कोई महान साहित्यिक कृति है, ये कहना अतिशयोक्ति हो जायेगी। हाँ, ऐसे किस्से सिखने सिखाने में इस्तेमाल होते हैं, बाल मनोविज्ञान है, छोटी सी खुशियाँ हैं, बदलते दौर में जो बूढी दादी-नानी सिखाती उनकी कमियां पूरी करती हैं।

हम इसे पढ़कर इसपर रिव्यु लिखने गए तो सोचा था शायद चार छह लोगों ने इसे पढ़ा होगा। आश्चर्यजनक रूप से इसके पाठकों की गिनती काफी ज्यादा है। लगभग सबका लिखा रिव्यु अच्छा है, अगर आप अमेज़न पर जाएँ (जिसका लिंक नीचे है) तो और रिव्यु भी देख सकते हैं।

 

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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