“गैर-जिम्मेदार” क्या होता है इसे समझने के लिए सरकार पर एक नजर डालना काफी होता है। करीब तीस साल पहले बालासुब्रमन्यम को तीन महीने की जेल की सजा दी गई थी। वो आनन्द विविकतन नाम की एक तमिलनाडु की ओर के साप्ताहिक के संपादक थे। उनका कसूर ये था कि उन्होंने किसी कार्टूनिस्ट का बनाया एक कार्टून छाप दिया था। कार्टून में दो आम लोग एक राजनैतिक सभा-रैली के पास खड़े बात कर रहे थे। पहला आदमी दुसरे को बता रहा होता है कि वो जो जेबकतरे जैसा दिख रहा है वो विधायक है, दूसरा जो नकाबपोश डाकू जैसा लगता है वो मिनिस्टर है !

 

असेंबली के स्पीकर ने उन्हें तीन महीने जेल में पटक देने का आदेश दिया था। बाद में मद्रास हाई कोर्ट ने इस फैसले को गलत ठहराया। सवाल है कि अगर स्पीकर का फैसला गलत था, बालासुब्रमण्यम को जबरन जेल में डाला गया तो पद के दुरूपयोग, तुगलकी फैसले लेने जैसे किसी जुर्म में स्पीकर को सजा हुई थी क्या ? जाहिर है नहीं हुई होगी। सरकार गलतियों के लिए जिम्मेदार नहीं होती। उसे सिर्फ सही के लिए प्रशंसा और वोट मिलने चाहिए। मोटे तौर पर यही समाजवादी व्यवस्था है, जहाँ कर्त्तव्य क्या हैं, ये कोई नहीं जानता। हाँ, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य से लेकर बिजली-पानी-सड़क तक पर अधिकार सबको चाहिए। ये कोई एक बार की बात हो ऐसा भी नहीं है।

 

इस गैरजिम्मेदारी की सरकारी परंपरा को नेताओं ने भारतीय लोकतंत्र के जन्म के साथ ही स्थापित करना शुरू किया था। नेहरु की नीतियों के विरोध में लिखे एक लेख के लिए के लिए नेहरु ने लेखक को जेल में डालने की सोची। उस समय संविधान बना ही था, तो किसी ने अनुच्छेद 19 और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” याद दिला दी। संविधान के बनने के छह महीने के अन्दर जो पहला संशोधन हुआ वो “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का अधिकार जनता से छीनता था। हक़ तो सरकार बहादुर के होने चाहिय, जिम्मेदारी क्या होती है सरकार की, उसके लिए अदालत के चक्कर काटते रह सकते हैं।

 

इसके नमूने एक बार नहीं बार बार दिखेंगे। सोशल मीडिया के दौर में कार्टून की जिम्मेदारी अब किसी संपादक के सर भी नहीं आती। बंगाल वाली जेहादी आपी कार्टूनिस्ट को जेल में भरवा चुकी हैं। बलात्कारियों के समर्थन से लेकर भैंसों की चोरी वाले मामले तक के लिए जाने जाने वाले आजम खान साहब एक बेचारे मासूम से अट्ठारह से कम उम्र के लड़के को ऐसे ही मामले में अन्दर करवा चुके हैं। सोशल मीडिया के होने से मगर इतना फायदा तो हुआ ही है कि लोग बोलने लगे हैं। जहाँ निंदा के न पर इ की मात्रा पड़ने से पहले ही सरकार बहादुर निंदा की सोचने वाले की चीख निकलवा देती थी, अब मामला उतना आसान नहीं रहा।

 

कल एक युनिसेफ़ (UNICEF) की ओर से पटना में आयोजित बैठक(Workshop) में जाना हुआ तो वहां कई अलग अलग धर्मों के धर्मगुरुओं को बुलाया गया था। बुलाने-बात करने की वजह ये थी कि बच्चों के लिए होने वाले #मिशन_इन्द्रधनुष के अंतर्गत टीकाकरण की जानकारी धर्माचार्यों, मौलाना, गुरुद्वारा प्रबंधन, चर्च के अधिकारियों तक पहुंचाई जा सके। कुछ लोग जो अपने अपने अंधविश्वासों की वजह से टीकाकरण नहीं करवाते वो शायद उनकी बात मानकर आना शुरू करें। इस सिलसिले में जब सिखाया बताया जा रहा था तो एक मौलाना साहब ने सरकारी अस्पतालों पर भरोसा कम होने की बात भी उठाई।

 

कुछ तो मौलाना के स्थानीय प्रभाव, कुछ मीडिया और आम जन की मौजूदगी और कुछ बदलती आदतों की वजह से समाजवादी नौकरशाही ने जवाब देने से इनकार नहीं किया। एक ही सूई से सरकारी अस्पताल बार बार बच्चों को टीका नहीं दे सकते ये स्पष्ट बताया गया। प्राइवेट झोला छाप के पास इसकी थोड़ी संभावना होगी भी लेकिन सरकारी में कोई संभावना नहीं होती है। अपनी बात साबित करने के लिए अधिकारी महोदय ने फ़ौरन सिरिंज मंगवाकर दिखाया। एक बार सूई लगा देने के बाद उस सिरिंज में दोबारा दवा नहीं भर सकते। इस नयी सरकारी सिरिंज का पिस्टन दोबारा पीछे खीचा ही नहीं जा सकता।

 

थोड़ी जोरआजमाइश के बाद दोबारा सिरिंज खीचने में नाकाम हुए मौलाना साहब इस नयी चीज़ से खुश होते फ़ौरन मौजूद लोगों को ये सिरिंज दिखाने भी आये। थोड़ी सी ही सही भ्रान्ति टूटी तो होगी। भ्रांतियों को ताड़ना भी धर्म का ही काम होता है। भागने के बदले समाजवादी सरकारें जवाब देने की कोशिश भी करने लगी हैं ये भी अच्छी बात है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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