नार्थ कैरोलिना की एक छात्रा जेनिफ़र थोमसन के साथ 1984 में छुरे की नोक पर बलात्कार हुआ था। गिरफ्तारियां हुई और कतार में खड़ा करके संदिग्धों की पहचान करवाई गई। रोनाल्ड कॉटन नाम का अपराधी पहचाना गया और उसपर मुकदमा चला कर उसे सजा भी दी गई। कई दुसरे अपराधियों कि ही तरह रोनाल्ड खुद को बेकसूर बताता था। पूरे 11 साल जेल में काटने के बाद रोनाल्ड ने अपना डी.एन.ए. टेस्ट करवाया और सिद्ध किया कि वो सचमुच बेगुनाह था।

 

इस पूरे अजीब से घटनाक्रम पर जेनिफ़र और रोनाल्ड ने मिलकर बाद में अपने संस्मरण लिखे। “पिक्किंग कॉटन” नाम की ये किताब न्याय की हत्या पर बात शुरू होते ही याद आ जाती है। ऐसी ही एक दूसरी किताब “एक्चुअल इनोसेंस: फाइव डेज टू एग्जीक्यूशन एंड अदर डिसपैचेज फ्रॉम द रोंगली कनविक्टेड” भी है। इस किताब ने एक पूरा आन्दोलन शुरू कर दिया था। “द इनोसेंस प्रोजेक्ट” नाम की एक संस्था भी है जिसने गलत सजा पाए कई लोगों को छुड़ाया है।

 

जब “एक्चुअल इनोसेंस” प्रकाशित हुई (सन 2000) तब कहीं जाकर डीएनए तकनीक से और दुसरे आधुनिक साक्ष्यों को अदालत में साक्ष्य मानने की बात भी शुरू हुई। वरना जैसे सी.सी.टी.वी. कैमरे पर दिखने वाले बलात्कारी तरुण तेजपाल को आम लोग अपराधी मान लेंगे, जरूरी नहीं कि अदालतें भी वैसे कैमरा फुटेज को सबूत माने। सन 2014 की शुरुआत में ही दाखिल चार्जशीट में बलात्कारी तरुण तेजपाल के एक ईमेल को भी संलग्न किया गया है। ये दस्तावेज़ आम लोग भी देख सकते हैं।

 

इस चिट्ठी में तेजपाल स्पष्ट रूप से ये स्वीकारते दिखते हैं कि उन्होंने दो बार ऐसे अपराधिक प्रयास किये जबकि पीड़िता स्पष्ट रूप से इनकार कर रही थी। इसके वाबजूद पेड मीडिया के ज्यादातर ओपिनियन या समाचार उसे बरसों बचाने और “तथाकथित आरोपी” (allegedly) जैसे शब्दों कि ढाल देते रहे हैं। जैसे कई बार अच्छा आतंकी और बुरा आतंकी (good terrorist, bad terrorist) होता है वैसा ही कुछ बलात्कार के भी मामलों में नजर आता है। पूर्वाग्रह कई बार न्याय का गला घोंट देते हैं।

 

जब ऐसे मुद्दों पर लिखी किताबों की बात होती है तो ब्रायन स्टीवेंसन की “जस्ट मर्सी” नाम की किताब भी याद आ जाति है। स्टीवेंसन अब अमेरिका में गरीबी, जातिगत भेदभाव जैसी वजहों से नाइंसाफ़ी झेलते लोगों के लिए न्यायिक सुधारों के मामले में सबसे बड़ी आवाज हैं। वो हमेशा ऐसे नहीं थे, 1980 के दौर में वो कानून के छात्र थे, जिसे पता भी नहीं था कि उसका भविष्य कैसी दिशा लेगा। उनकी किताब उनके खुद के जागरण के अलावा ऐसे कई लोगों की कहानी भी सुनाती है जिन्हें बिना किसी कसूर ही जेलों में ठूंस दिया गया।

 

न्यायिक सुधारों के साथ जब अंग्रेजी में (ख़ास तौर पर अमेरिकी पृष्ठभूमि पर) लिखी किताबों की बात होती है तो कई विरोधी कहते हैं नहीं-नहीं भारत में तो ऐसा नहीं होता। उनका कमजोर, लचर सा तर्क होता है कि भारत में तो “अपराध सिद्ध होने तक निर्दोष” का सिद्धांत माना जाता है। ध्यान रहे कि बलात्कार या डकैती जैसे कई मामलों में ये सिद्धांत नहीं चलता। वहां खुद को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी आरोपी पर होती है और उसे जेल से खुद को निर्दोष सिद्ध करना पड़ता है।

 

जब जेल में बंद महिला के बेटा बालिग़ का होने पर अपनी माँ की जमानत करवाने पहुंचे तब पता चले कि बेल तो 19 साल पहले ही हो चुका! गरीबी के कारण जमानत ना भर पाया कोई जेल में करीब दो दशक बंद रह जाए, ऐसा भी भारत में होता है। जैसे मुद्दों पर हाल की बहसें जारी हैं, वो दोनों कानून से सम्बंधित सुधारों के भी मसले हैं। सवाल ये है कि सुधारों की कोई बात होगी क्या?

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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