Anand Kumar

  • एक क्रिसमस ट्री कहलाने वाले पेड़ को सजाया जाना, तोहफे लेना और देना, और एक लाल कपडे लम्बी दाढ़ी वाले सैंटा क्लॉज़ का आना ! ज्यादातर लोगों के लिए यही क्रिसमस है । ईसाई लोगों के लिए इस त्यौहार का अपना अलग महत्व भी […]

  • कुंदन शाह को 1983 में बनी इस फिल्म के लिए अवार्ड मिला था। फिल्म की कहानी अंटोनीओनी की 1966 की फिल्म “ब्लोअप” से प्रेरित बताई जाती है। ये कहानी मुम्बई में काम शुरू कर रहे दो फोटोग्राफर दोस्तों की कहानी है। ये लोग म […]

  • डॉ. आर.एन.चुग उस दिन अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कार से निकले थे जब एक ट्रक ने पीछे से उनकी कार को टक्कर मार दी। डॉ. चुग गाड़ी से उतर कर पीछे देख रहे थे कि कितना नुकसान हुआ है जब ट्रक ने दोबारा टक्कर मारी। इस […]

  • पांचवे #बिहार_डायलॉग में जब साइबर सिक्यूरिटी पर बात चली तो हमारे साथ इसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर विमर्श करने के लिए डॉ. विनय कुमार भी थे। चर्चा के सत्र में मौजूद छोटे बच्चों के माता-पिता और क […]

  • किसी चीज़ को छुपाने का सबसे आसान तरीका होता है उसे बिलकुल खुले में सबके सामने रख देना। ऐसा मेरा मानना है कि बिलकुल आँखों के सामने पड़ी चीज़ पर लोग ध्यान नहीं देते। आप इससे सहमत नहीं भी हो सकते हैं। इसपर मेरा […]

  • कभी कभी पशुओं के चोर की कहानियां पढ़ने में आती हैं जिनमें पशु चोर को काफी चतुर बताया जाता है। कहा जाता है कि वो पशु को एक तरफ ले जाते हैं और उसकी घंटी उल्टी दिशा में लेकर भागने के बाद कहीं फेंक देते ह […]

  • ग्रीक मिथकों के मुताबिक एक बार ग्रीक देवता डायोनाइसस समुद्र में सफ़र कर रहे थे जब समुद्री लुटेरों ने उन्हें पकड़ लिया। लुटेरों ने उनका हुलिया देखकर समझा कि ये कोई राजपरिवार का सदस्य है। फिरौती में बड़ी रकम मिलेगी […]

  • कई बार जब गीत संगीत की बात होती है तो कुछ पुराने दौर के लोग कहने लगते हैं कि गाने तो हमारे ज़माने में बनते थे ! आजकल के गानों के भी कोई लिरिक्स हैं ? बकवास होता है सब। अब अच्छा और बुरा तो वैसे हर दौर में बनता ही ह […]

  • अगर मैं कहूँ कि ये जो पुरानी बिल्डिंग आप आज किसी और काम के लिए इस्तेमाल होती देख रहे हैं, इसमें कभी राजा का महल था तो आपको आश्चर्य तो बिलकुल नहीं होगा। सब जानते हैं कि मैथिलि को भी एक भाषा की तरह पढ़ाया जाए, […]

  • किसी नेताजी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में क्या लिख के रखा है इससे क्या फर्क पड़ता है? समाचारों में उन्हें देखने, सुनने, पढ़ने के बाद कोई सोशल मीडिया पर भी उनकी ही बात क्यों पढ़ेगा? हाँ लेकिन अगर नेताजी का लिखा आ […]

  • डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी एम.ए. डिग्री के लिए जो थीसिस लिखी थी उसका विषय था “वेदांत में आचार और अध्यात्म की पूर्वमान्यताएं”। उनका इरादा अपने लेख के जरिये ऐसे लोगों को जवाब देने का था जो कहते थे वेदांत में आच […]

  • इमरजेंसी के दौर में संविधान में जबरन घुसेड़े गए “सेकुलरिज्म” का पालन करने की “पिद्दी” जमात की जल्दबाजी के नतीजे भी भारत को भुगतने पड़े हैं। पर्व-त्यौहार की तिथियाँ अलग होती थीं, कैलेंडर के जरिये उन्हें […]

  • सोचिये कि अभी जिन शहरी नक्सलों को पकड़ा गया, उन्हें क्या पहली बार पकड़ा गया है? इस से पहले उनकी गिरफ्तारियां हुई हैं या नहीं हुई हैं? अब जब आपको पता है कि वो पहले भी पकड़े जा चुके, पुराने अपराधकर्मी हैं तो ये भी सम […]

  • एक दूर के गाँव में एक किसान रहता था। बहुत ज्यादा ज़मीन तो उसके पास नहीं थी, मगर उसके पास एक छोटा सा तालाब था वहां कुछ मछलियाँ होती थी किसान कुछ बत्तख भी उसी में पालता था। एक बत्तख ने कुछ अंडे दे रखे थे।  […]

  • [ ऑस्कर वाइल्ड (1854-1900) कि कहानी का रूपांतर ]

    दानासुर दैत्य को लोग पसंद नहीं थे। इंसानों से उसे बड़ी चिढ़ होती थी। ऊपर से वो बड़ा स्वार्थी भी था। अपनी चीज़ें किसी को छूने भी नहीं देना चाहता था, […]

  • रोते बच्चे को पिता की गोद में आराम ना मिले, चाचा-दादा, मौसी-नानी सब के पास रोता रहे तो भी माँ की गोद में जाते ही चुप कैसे हो जाता है? उसे वही सबसे सुरक्षित जगह क्यों लगती है? किसी भी किस्म के खतरे, किसी डर या […]

  • मीठी-मीठी बातें ज्यादा सुनने को मिलती हैं, और सच कम सुनाई देता है। सिर्फ जानकारी का अभाव कारण नहीं, ऐसा सच के कड़वे होने और उस से लोगों की “भावना आहत” हो जाने के डर से भी होता होगा। इसके ऊपर से अगर मुद्दा ऐसा […]

  • 23 वर्ष की उम्र में वीरगति को प्राप्त इस मराठा रानी ने 1857 की लड़ाई में वही जोश और वीरता पैदा किया जो बाद में भगत सिंह ने 23 वर्ष की आयु में 1931 में किया था | “ख़ूब लड़ी मर्दानी” हो या “इंक़लाब ज़िंद […]

  • कई साल पुरानी बात है, पिछली शताब्दी की कहिये क्योंकि घटना 1983 की है। उसी दौर में एक दिन बिहार के दैनिक अखबार “आज” में 11 मई, 1983 को मुख्यपृष्ठ पर बॉबी की मौत की खबर छपी। ये खबर इसलिए हंगामाखेज थी क्योंकि बॉ […]

  • बिहार के सियासी हलकों के लिए जुलाई का महिना कुछ ख़ास अच्छा नहीं होता। ये आरोपों-प्रत्यारोपों का नहीं, ऐसे सनसनीखेज मामले उजागर होने का महिना होता है, जो महीनों राजनीती पर हावी रहते हैं। […]

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1 COMMENT

  1. ये जो रंग है आपका..
    वो फरिश्तों की भूल से..
    वो तिल बना रहे थे..

    स्याही फ़िसल गई..

  2. जी हां, चारण-भाट आन पर जान देने वाले होते थे। उनका बड़ा सम्मान था और उनका शब्द ही प्रमाण। बरसों बरस रविश कुमारों, देवदत्त पटनायकों को झेलती निर्विकल्प जाति में चिनगारी दिखने तो लगी है। यह चिनगारीअब बुझने वाली नहीं, वरन् भीषण ज्वाला बनेगी।

  3. ये हिंदी में है क़ि इंग्लिश में?

    • किताब हिंदी में है … काफी कम प्रतियाँ निकलती हैं इसलिए ख़त्म जल्दी जल्दी हो जाती हैं बस ये समस्या है बस…

  4. नेतृत्व किसलिये चाहिये होता है?
    नेता न हाथ से काम करता है, न मोर्चे पर लड़ता है।
    नेता वही, जो प्रेरित कर दे, पस्त फौज में प्राण फूंक दे।
    हनुमान क्या लंका जला सकते थे?
    “का चुप साधि रहा बलवाना” की ललकार यदि न सुनी होती?
    (कृपया स्टॉलिनगार्ड को स्टॉलिनग्राड कर लें)

    • पहले स्टॅलिन में आ की मात्रा भी नहीं ले रहा था ट्रांसलिटरेट … अब आपके कमेंट से कॉपी कर के सुधारा…

  5. एक ही शब्द ज़ेहन में उभरता है . अद्भुत ! आप के पैशन को सलाम गिताली जी ___/\___

  6. आनंद भाई हमेशा की तरह पड़ताल करती धागा धागा खोलती पोस्ट । धन्यवाद

  7. अलेक्जेंडर सोल्जीनितशिन का ‘गुलाग द्वीपसमूह, उससे ज्यादा अच्छे तरीके से लिखी गई है। नोबुल प्राइज भी दिया गया गया था।

  8. धन्यावाद, अच्छी पोस्ट, अच्छे विचारों के साथ।

  9. कृपया लेख का आशय प्रत्यक्ष प्रकट करें।परोक्ष शैली से अर्थ कई रूपों में प्रकट होता है।इससे मुझसे कम मति युक्त भी समझ पाएंगे।

    • भस्मासुर कई बार खुद के ही पैदा किये हुए होते हैं | राजनैतिक अर्थों में देखें तभी भस्मासुर की पौराणिक कहानी समझ में आती है | वो जो चीज़ भस्मासुर के प्रतीक के जरिये समझा रहे होते थे उसे आज भी दोहराया जाता है | कई जगह जो नेता राजनैतिक बढ़त को 25 साल पीछे धकेल गए, वो किसी और के नहीं खुद के बनाए हुए ही थे |

  10. Anand Ji, the downloaded word doc can not be read properly at my end due to font issues.
    My humble suggestion:
    Is it possible for you to first convert the file into pdf and then attach.
    This will have following advantages:
    1.The format will easily be accessible on mobile/tablets/PC as well as it can be shared easily via whatsapp and emails.
    2. As pdf will be read-only be default., it won’t be easily editable.

    • i have tried using free software to convert to documents to pdf format. Somehow i’ve been unable to find something which works seamlessly as of now. But i’m looking into available options and i’ll try to convert to better formats soon…

    • जरूर मान सकते हैं, बस मान लेने में समस्या ये है कि ये जो लिखा हुआ है, वो विचार या मंतव्य नहीं जो किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लिखा जा सके | ये शुद्ध तथ्य हैं, कौन सा सन्दर्भ कहाँ से लिया गया है वो नंबर और फुटनोट के जरिये दर्शाया गया है |

  11. हम सब comfort zone में आ गये हैं और यहाँ से कुछ दिखता नहीं है .