Anand Kumar

  • एक दूर के गाँव में एक किसान रहता था। बहुत ज्यादा ज़मीन तो उसके पास नहीं थी, मगर उसके पास एक छोटा सा तालाब था वहां कुछ मछलियाँ होती थी किसान कुछ बत्तख भी उसी में पालता था। एक बत्तख ने कुछ अंडे दे रखे थे।  […]

  • [ ऑस्कर वाइल्ड (1854-1900) कि कहानी का रूपांतर ]

    दानासुर दैत्य को लोग पसंद नहीं थे। इंसानों से उसे बड़ी चिढ़ होती थी। ऊपर से वो बड़ा स्वार्थी भी था। अपनी चीज़ें किसी को छूने भी नहीं देना चाहता था, […]

  • रोते बच्चे को पिता की गोद में आराम ना मिले, चाचा-दादा, मौसी-नानी सब के पास रोता रहे तो भी माँ की गोद में जाते ही चुप कैसे हो जाता है? उसे वही सबसे सुरक्षित जगह क्यों लगती है? किसी भी किस्म के खतरे, किसी डर या […]

  • मीठी-मीठी बातें ज्यादा सुनने को मिलती हैं, और सच कम सुनाई देता है। सिर्फ जानकारी का अभाव कारण नहीं, ऐसा सच के कड़वे होने और उस से लोगों की “भावना आहत” हो जाने के डर से भी होता होगा। इसके ऊपर से अगर मुद्दा ऐसा […]

  • 23 वर्ष की उम्र में वीरगति को प्राप्त इस मराठा रानी ने 1857 की लड़ाई में वही जोश और वीरता पैदा किया जो बाद में भगत सिंह ने 23 वर्ष की आयु में 1931 में किया था | “ख़ूब लड़ी मर्दानी” हो या “इंक़लाब ज़िंद […]

  • कई साल पुरानी बात है, पिछली शताब्दी की कहिये क्योंकि घटना 1983 की है। उसी दौर में एक दिन बिहार के दैनिक अखबार “आज” में 11 मई, 1983 को मुख्यपृष्ठ पर बॉबी की मौत की खबर छपी। ये खबर इसलिए हंगामाखेज थी क्योंकि बॉ […]

  • बिहार के सियासी हलकों के लिए जुलाई का महिना कुछ ख़ास अच्छा नहीं होता। ये आरोपों-प्रत्यारोपों का नहीं, ऐसे सनसनीखेज मामले उजागर होने का महिना होता है, जो महीनों राजनीती पर हावी रहते हैं। […]

  • आपने मशहूर फिल्म “अवतार” देखी होगी, तो उसके अंतिम दृश्य का युद्ध भी देखा ही होगा। “अवतार” नाम ही हिन्दुओं के देवी-देवताओं के अवतार से लिया गया है, तो जाहिर है फिल्म में कई हिस्से भी हिन्दुओं की पुराण-कथाएँ हैं। […]

  • चार लोग सुनेंगे तो जाने क्या कहेंगे! ये जैसे और बहुत से लोगों के लिए एक बड़ा सवाल होता है वैसे ही सूबेदार पासवान के लिए भी था। मजदूरी से जीवनयापन करने वाले सूबेदार पासवान की तीन बेटियों और दो बेटों में पुन […]

  • दर्शनशास्त्र की दो तरह की किताबें हो सकती हैं। एक तो वो जो ये बताएं कि किस बात का मतलब क्या है, परिभाषा क्या है, अवधारणायें कौन सी हैं। दूसरी वो जो तर्कों के आधार पर सिद्ध करें कि ये अवधारणा सत्य है और बाकी […]

  • समय में परिवर्तन के साथ विक्रमादित्य #विकी हो गया था और बेताल #बेट्स (Baits)। कई प्रलोभनों से राजा विक्रमादित्य को लुभाने-फंसाने की कोशिश करते जीव के लिए फंसाने का चारा अर्थात #बेट्स नाम उचित था […]

  • ये उल्टी बात मेरी (या मेरे जैसे किसी गधे की) नहीं है, ये कबीरदास जैसे समझदार लोग बरसों पहले कह गए हैं। इसे काम करते देखना है तो अपनी पढ़ाई के बारे में सोचिये जहाँ किताबों से बड़े बड़े अध्याय पहले पढ़ा दिए ज […]

  • लोककथाएं तथाकथित बुद्धूजीवियों के हिसाब से तो चलती नहीं, इसलिए एक लीक पर भी नहीं होती। बिहार की लोककथाओं को सुनें तो ऐसी पचास से ऊपर लोकगाथाएँ मिल जाएँगी। लोककथा से बदल कर शब्द को लोकगाथा इसलिए कर दिया है क्यों […]

  • नार्थ कैरोलिना की एक छात्रा जेनिफ़र थोमसन के साथ 1984 में छुरे की नोक पर बलात्कार हुआ था। गिरफ्तारियां हुई और कतार में खड़ा करके संदिग्धों की पहचान करवाई गई। रोनाल्ड कॉटन नाम का अपराधी पहचाना गया और उसपर मुकदमा चला […]

  • सोमनाथ पर महमूद गजनवी के हमले के बारे में शायद सब जानते हैं। 1026 AD में हुए इस हमले में महमूद गजनवी के साथ जो लोग आये थे उनमे उसका 11 साल का भतीजा सलार महमूद भी था। गज़नवी जब लूट के माल के साथ लौटा तो उसक […]

  • चलिए एक अजीब सा सवाल पूछ लें आपसे। अब बेइज़्ज़ती, दुर्व्यवहार, गाली-गलौच, शारीरिक प्रताड़ना, मार पीट, जान से मारने की धमकी, बेरोजगारी, आर्थिक तंगी कितने समय झेल सकते हैं ? दो चार मिनट ? घंटे-दो घंटे भर ? दो च […]

  • क्रिस्टोफ़र कोलंबस का मानना था कि दुनियां गोल है। लेकिन वो ज़माना बाइबिल का था और सभी धार्मिक विद्वान मानते थे कि धरती चपटी है। इसलिए अगर समंदर के रास्ते कोलंबस अपना जहाज लेकर भारत ढूँढने निकलता तो वो किनारे प […]

  • सनातनी हिन्दुओं में “शैतान” जैसी कपोलकल्पना के लिए कोई स्थान नहीं। पाप की पराकाष्ठा भी आपको ईश्वर के पास पहुंचा देगी। जैसे देवी के नामों को देखेंगे तो जिस राक्षस के वध के लिए उन्हें जाना जाता है, […]

  • बच्चों के लिए भारत में ना के बराबर ही लिखा जाता है। बाकी कि हिंदी किताबों जितनी प्रतियाँ बिकें और वो बेस्टसेलर हो जाए, या कम से कम चर्चित ही रही हों, ऐसी किताबें ना के बराबर लिखी जाती हैं, और छपती तो शायद […]

  • चीज़ों को समझने के लिए उदाहरण लेना एक आसान काम है लेकिन पहले एक काम चलाने लायक परिभाषा भी होनी चाहिए। आखिर जिस क्राउड-सौर्सिंग (Crowd Sourcing) कि हम बात कर रहे हैं वो क्या है या कैसे काम करेगा। अंग्र […]

  • Load More

1 COMMENT

  1. ये जो रंग है आपका..
    वो फरिश्तों की भूल से..
    वो तिल बना रहे थे..

    स्याही फ़िसल गई..

  2. जी हां, चारण-भाट आन पर जान देने वाले होते थे। उनका बड़ा सम्मान था और उनका शब्द ही प्रमाण। बरसों बरस रविश कुमारों, देवदत्त पटनायकों को झेलती निर्विकल्प जाति में चिनगारी दिखने तो लगी है। यह चिनगारीअब बुझने वाली नहीं, वरन् भीषण ज्वाला बनेगी।

  3. ये हिंदी में है क़ि इंग्लिश में?

    • किताब हिंदी में है … काफी कम प्रतियाँ निकलती हैं इसलिए ख़त्म जल्दी जल्दी हो जाती हैं बस ये समस्या है बस…

  4. नेतृत्व किसलिये चाहिये होता है?
    नेता न हाथ से काम करता है, न मोर्चे पर लड़ता है।
    नेता वही, जो प्रेरित कर दे, पस्त फौज में प्राण फूंक दे।
    हनुमान क्या लंका जला सकते थे?
    “का चुप साधि रहा बलवाना” की ललकार यदि न सुनी होती?
    (कृपया स्टॉलिनगार्ड को स्टॉलिनग्राड कर लें)

    • पहले स्टॅलिन में आ की मात्रा भी नहीं ले रहा था ट्रांसलिटरेट … अब आपके कमेंट से कॉपी कर के सुधारा…

  5. एक ही शब्द ज़ेहन में उभरता है . अद्भुत ! आप के पैशन को सलाम गिताली जी ___/\___

  6. आनंद भाई हमेशा की तरह पड़ताल करती धागा धागा खोलती पोस्ट । धन्यवाद

  7. अलेक्जेंडर सोल्जीनितशिन का ‘गुलाग द्वीपसमूह, उससे ज्यादा अच्छे तरीके से लिखी गई है। नोबुल प्राइज भी दिया गया गया था।

  8. धन्यावाद, अच्छी पोस्ट, अच्छे विचारों के साथ।

  9. कृपया लेख का आशय प्रत्यक्ष प्रकट करें।परोक्ष शैली से अर्थ कई रूपों में प्रकट होता है।इससे मुझसे कम मति युक्त भी समझ पाएंगे।

    • भस्मासुर कई बार खुद के ही पैदा किये हुए होते हैं | राजनैतिक अर्थों में देखें तभी भस्मासुर की पौराणिक कहानी समझ में आती है | वो जो चीज़ भस्मासुर के प्रतीक के जरिये समझा रहे होते थे उसे आज भी दोहराया जाता है | कई जगह जो नेता राजनैतिक बढ़त को 25 साल पीछे धकेल गए, वो किसी और के नहीं खुद के बनाए हुए ही थे |

  10. Anand Ji, the downloaded word doc can not be read properly at my end due to font issues.
    My humble suggestion:
    Is it possible for you to first convert the file into pdf and then attach.
    This will have following advantages:
    1.The format will easily be accessible on mobile/tablets/PC as well as it can be shared easily via whatsapp and emails.
    2. As pdf will be read-only be default., it won’t be easily editable.

    • i have tried using free software to convert to documents to pdf format. Somehow i’ve been unable to find something which works seamlessly as of now. But i’m looking into available options and i’ll try to convert to better formats soon…

    • जरूर मान सकते हैं, बस मान लेने में समस्या ये है कि ये जो लिखा हुआ है, वो विचार या मंतव्य नहीं जो किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लिखा जा सके | ये शुद्ध तथ्य हैं, कौन सा सन्दर्भ कहाँ से लिया गया है वो नंबर और फुटनोट के जरिये दर्शाया गया है |

  11. हम सब comfort zone में आ गये हैं और यहाँ से कुछ दिखता नहीं है .