पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी और संस्कृत के जाने माने विद्वानों में से हैं। उनके सबसे प्रसिद्ध किताबों में से एक थी “बाणभट्ट की आत्मकथा” जो किन्हीं कारणों से अधूरी सी ही है। हिंदी साहित्य पर लिखने के लिए उन्हें जाना जाता है, हिंदी के छात्र उनकी किताबें पाठ्यक्रम में ना होने पर भी पढ़ लेते हैं। उन्होंने एक छोटी सी किताब “मेघदूत” पर भी लिखी है जो थोड़ी कम प्रसिद्ध है। ये सीधा सीधा मेघदूत का अनुवाद नहीं है, ये मेघदूत की समीक्षा भी नहीं कही जा सकती, ये भारतीय साहित्य की एक अमूल्य कृति पर चर्चा है।

मेघदूत: एक पुरानी कहानी” पढ़कर सिर्फ मेघदूत के बारे में नहीं पता चलता, ये कई और अर्थों की भी व्याख्या है। खुद हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे व्याख्या इसलिए नहीं कहते थे क्योंकि १९५४ के आस पास उनकी आँखे काफी खराब हो गई थी और उन्हें पढ़ने की मनाही थी। शान्तिनिकेतन में रहते हुए उन्होंने दूसरों से लिखवा कर इसका ज्यादातर हिस्सा तैयार किया था। बाद में इसका आखरी हिस्सा पूरा किया गया और सन्दर्भ के लिए जरूरी श्लोकों को भी जोड़ा गया। हजारी प्रसाद द्विवेदी के मुताबिक मेघदूत विरह-वेदना और मिलन की आकांक्षा का काव्य है, मनुष्यों को गहराई से आंदोलित करने के कारण ये सदियों से प्रसिद्ध रहा है।

प्रेम पर आधारित कविताएँ ढूँढने और पढ़ने वालों के लिए भारतीय साहित्य में ही इतना उपलब्ध है कि उसका थोड़ा सा हिस्सा देख लेने पर नयी रचनाएँ उथली लगने लगेंगी। मेघदूत की कहानी जानी पहचानी सी है, ये एक यक्ष की कहानी है जो कुबेर के पास अलकापुरी में काम करता है। जैसा वर्णन इसके महल का है, उस से ये गरीब तो नहीं लगता लेकिन ये नौकरीपेशा था और कुबेर के पास नौकरी करता था। जैसा कि प्रेम में अक्सर होता है, प्रेम-मग्न यक्ष से भी काम में कोई भूल हो गई और कुबेर ने उसे साल भर के लिए देशनिकाला दे दिया। जहाँ कभी राम-सीता रहे थे वहीँ रामगिरी पर यक्ष ने अपना ठिकाना बनाया था।

साल के आठ महीने तो जैसे तैसे बीत गए लेकिन असाढ़ के महीने में काले बादलों को देखकर यक्ष प्रिया की याद में व्याकुल हो उठा। देशनिकाले पर भी यक्ष तो यक्ष ही था, दैवी-सिद्धियाँ गई नहीं थी, इसलिए यक्ष मेघों (बादलों) को अपना दूत बनाकर प्रिया के पास सन्देश भेजने के लिए बादल के पास आ खड़ा हुआ। छोटी सी गलती के लिए एक साल की सजा क्यों दे दी से लेकर, यक्ष रामगिरी से अलकापुरी तक के मुश्किल रास्ते की भी फ़िक्र करता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के मुताबिक यक्ष अनुभवहीन नहीं था, वो जानता था कि विधाता जब “वाम” होता है तो प्रिया मिलन स्वप्न में भी संभव नहीं होता। वो वररुचि के मुताबिक प्रेमपत्र ले जाने वाले का चतुर होना जरूरी है, ये भी बताते हैं।

कुल मिला कर मेघदूत जैसे काव्य का टेस्ट डेवलप करने के लिए इसे पढ़ा जाना चाहिए। लिटरेचर थोड़ा सा गरिष्ठ होता है, चेतन भगत टाइप एंटरटेनमेंट नहीं होता। किताब आसानी से राजकमल प्रकाशन में मिल जायेगी। सवा सौ रुपये के लगभग कीमत में और करीब करीब इतने ही पन्नों की है। ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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