बचपन में जब हमने ‘सिविक्स’ विषय में सशस्त्र सेनाओं की रैंक पढ़ी थी तब बताया गया था कि पुराने जमाने में सशस्त्र सेनाओं में कुल ग्यारह रैंक हुआ करती थी। आर्मी में सबसे ऊपर पाँच सितारा फील्ड मार्शल हुआ करते थे, एयरफ़ोर्स में मार्शल ऑफ़ दि एयरफ़ोर्स तथा नेवी में एडमिरल ऑफ़ दि फ्लीट। बाद में ऊपर और नीचे से एक-एक रैंक घटा दी गयी थी और फील्ड मार्शल तथा समकक्ष रैंकों को मानद कर दिया गया था। जब फील्ड मार्शल सैम बहादुर 90 वर्ष के हुए थे तब यह खबर द हिन्दू के एक कोने में छपी थी किंतु सैम इतने भाग्यशाली नहीं थे कि उन्हें अंतिम सलामी देने कोई मंत्री या चीफ़ ऑफ़ स्टाफ आता। भारतीय वायुसेना के प्रथम मार्शल ऑफ़ दि एयर फ़ोर्स अर्जन सिंह भाग्यशाली रहे कि देहत्याग करने के उपरांत प्रधानमंत्री ने उन्हें अंतिम विदाई दी।

The Icon : a book on Arjan Singh

जहाँ फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ पर अनेक पुस्तकें मिल जाती हैं वहीं एमएएफ अर्जन सिंह के जीवन का समग्रता में बहुत कम लेखकों ने अध्ययन किया। ऐसे में पूर्व वायुसेना अधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्लिष्ट विषय के विद्वान एयर कोमोडोर जसजीत सिंह द्वारा लिखित एमएएफ अर्जन सिंह की आधिकारिक जीवनी कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह पुस्तक मात्र एमएएफ अर्जन सिंह की जीवनी ही नहीं अपितु भारतीय वायुसेना का इतिहास भी है। यह पुस्तक भारतीय वायुसेना के जीवनकाल के आरम्भ से लेकर सन् ’65 के युद्ध तक का विश्लेषण करती है। किन कठिन परिस्थितियों में वायुसेना का जन्म हुआ और किस प्रकार भारतीय वायुसैनिकों ने स्वयं को ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष श्रेष्ठ योद्धा सिद्ध किया इसका विस्तृत विवरण एयर कोमोडोर जसजीत सिंह ने इस पुस्तक में दिया है। चीन के साथ युद्ध में वायुसेना की भूमिका पर जसजीत सिंह लिखते हैं कि यह पूरी तरह सत्य नहीं कि सन् ’62 में वायुसेना का प्रयोग नहीं किया गया था। वस्तुतः राजनैतिक नेतृत्व ने लड़ाकू विमानों का प्रयोग नहीं करने दिया इसलिए वायुसेना की भूमिका मालवाहक और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट की ही रह गयी। जसजीत सिंह ने इस पुस्तक में कई रक्षा समितियों का उल्लेख भी किया है जिनके सुझावों पर दशकों तक अमल न होने का परिणाम है कि आज वायुसेना के पास उत्कृष्ट योद्धा तो हैं किंतु उन्नत तकनीक से लैस स्वदेशी लड़ाकू विमानों की कमी है। इसके साथ ही जसजीत सिंह सन् ’65 के युद्ध में भारतीय वायुसेना की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेषण करना नहीं भूलते जिसके चीफ़ उस समय एसीएम अर्जन सिंह थे।

 

अर्जन सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर सन् ’65 के युद्ध तक और उसके कुछ वर्ष बाद तक वायुसेना में सेवाएं दी थीं। वे साहसी और ‘जेंटलमैन’ योद्धा थे। एक बार उन्होंने अपने एक मित्र के साथ आम नागरिकों के ऊपर विमान उड़ा कर उन्हें रोमांचकारी अनुभव दिया जिन्होंने उससे पहले चिड़िया या पतंगें ही उड़ती देखी थीं। इसके लिए उनका कोर्ट मार्शल होते रह गया था। एक बार अर्जन सिंह अपनी धर्मपत्नी के साथ कहीं जा रहे थे तो रस्ते में सूत के गट्ठों से भरा एक ट्रक जलते हुए देखा तो उसे बुझाने दौड़ पड़े थे। द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा मोर्चे पर बहादुरी के लिए उन्हें डिसटिङ्गुइश्ड फ्लाइंग क्रॉस से अलंकृत किया गया था। एयर कोमोडोर जसजीत सिंह ने अपनी पुस्तक में एमएएफ अर्जन सिंह के जीवन की छोटी बड़ी कई रोचक घटनाओं का वर्णन किया है। साथ ही वे वायुसेना से जुड़े गम्भीर मुद्दे भी रखते जाते हैं। पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि हम इतिहास में आधी शताब्दी पीछे तथा सैन्य विषयों की जानकारी ग्रहण करते हुए सातवें आसमान पर पहुँच गए हैं।

 

इस पुस्तक की जितनी प्रशंसा की जाये कम है। इसे उतनी ही एकाग्रता से पढ़ना श्रेयस्कर है जितने परिश्रम तथा संबल से मार्शल ऑफ़ दि एयरफ़ोर्स अर्जन सिंह ने भारतीय वायुसेना को सींचा था। वे आज जीवित नहीं हैं किंतु उनके द्वारा खड़ा किया गया संगठन और देश सदैव उनका ऋणी रहेगा। अंग्रेजी और हिंदी दोनों में उपलब्ध अर्जन सिंह जी की यह जीवनी KW पब्लिशर द्वारा प्रकाशित है जिन्होंने अपनी वेबसाइट पर मार्शल ऑफ दि एयर फ़ोर्स के सम्मान में एक पेज भी बनाया है। यह पुस्तक विशेष रूप से युवाओं को पढ़नी चाहिये जो आकाश को अपने शौर्य से छूना चाहते हैं।

 

This Book is available in English too :

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