स्वच्छता के नाम पर छुआछूत और द्वेष फैलाने का बेबुनियाद इल्जाम अक्सर एक आयातित विचारधारा हिन्दुओं पर थोपने का प्रयास करती रही है। ऐसे शुचिता के आंदोलनों का हाल का इतिहास, जी लिखित इतिहास, कथाएँ-किस्से नहीं, देखें तो माओ ज़ेडोंग का दौर फ़ौरन याद आता है। सन 1958 में माओ ने एक आन्दोलन की शुरुआत की जिसे “फोर पेस्ट” (Four Pest) आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। इसमें चार जीवों को ख़त्म करना था।

 

पहला और दूसरा तो जाहिर है मच्छर और मक्खियाँ थीं, तीसरे नंबर पर चूहे थे और चौथे पर गौरैया। इस आन्दोलन को याद करना नैरेटिव बिल्डिंग सीखने के लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि इसमें ये साफ़ साफ़ दिख जाता है कि कैसे एक आयातित विचारधारा काम करती है। चूँकि फोर पेस्ट्स में तीन बीमारी पहुँचाने वाले, नुकसान करने वाले जीव हैं इसलिए चौथी यानि गौरैया को भी आसानी से दोषियों के साथ शामिल कर लिया जाएगा। पहले तीन तो नुकसान करने के आदि हैं, इसलिए छुपने की कला में भी माहिर हैं, लेकिन चौथी यानि गौरैया, निरीह प्राणी, सबसे आसान शिकार होगी।

 

इस आन्दोलन में यूरेशियन (गौर कीजिये यूरेशियन), पेड़ों पर रहने वाली गौरैया को पेस्ट, हानिकारक जीव इसलिए माना गया क्योंकि वो अनाज खाती थी। कहा गया की किसानों को उनकी मेहनत से वंचित कर के ये चिड़िया सारा अनाज खा जाती है। तथाकथित क्रांतिकारियों ने जनता में इसे आन्दोलन की तरह फैलाया। लोग बर्तन, टिन, ढोल बजा बजा कर चिड़ियों को उड़ाते। बेचारी गौरैया को तब तक उड़ने को मजबूर किया जाता जब तक डर कर उड़ने से थकी हुई गौरया जमीन पर गिर कर मर ना जाए। घोंसले उजाड़ दिए गए, अंडे फोड़ डाले गए, पैदा होते ही चिड़ियों को मारा गया।

 

ज्यादा से ज्यादा गौरैया मारने वालों को इनामो-एहतेराम से नवाज़ा गया। स्कूल-कॉलेज के आयोजनों में उन्हें सर्टिफिकेट-मैडल दिए जाते, तालियाँ पीटी जाती ऐसे कॉमरेडों के लिए। ज्यादा गौरैया मारी ? ज्यादा तालियाँ ! ऐसा नहीं था कि ऐसे बुद्धि-पिशाचों का विरोध नहीं हुआ हो। कई एम्बेसी में काम करने वालों ने गौरया मारने से इनकार कर दिया। गौरैयों ने भी भांप लिया था कि कहाँ वो सुरक्षित हैं, कौन उन्हें बेरहमी से क़त्ल नहीं कर रहा। गौरैयों के झुण्ड जाकर एम्बेसी में जा छुपे। अधिकारीयों के दबाव के वाबजूद पोलिश एम्बेसी ने गौरया मारने से इनकार कर दिया।

 

बुद्धि-पिशाचों के झुण्ड ने ढोल-ढपली वाले लाल झंडा लिए अपने समर्थकों के साथ पोलिश एम्बेसी को घेर लिया। लगातार दो दिन तक ढपलियां पीटी गई, जमकर नारे लगे, लाल झंडा फहराता रहा। दो दिन में शोर झेलती घिरी हुई सब गौरैया मर गई। पोलिश एम्बेसी के सफाईकर्मियों ने बेलचों से उठा कर प्यारी गौरैयों के शव बाहर फेंके।

 

सिर्फ दो साल में यानि अप्रैल 1960 होते होते बुद्धि-पिशाच जमात को समझ में आ गया कि उन्होंने क्या किया है। गौरैया सिर्फ अनाज नहीं खाती थी, वो फसलों को लगने वाले कई कीड़ों से भी खा जाती थी जिस से पैदावार बढ़ती। नतीजा ये हुआ था कि धान की पैदावार बढ़ने के बदले बेतहाशा घटने लगी। माओ ने अब गौरैया को फोर पेस्ट से हटाने के आदेश दिए, उसकी जगह खटमल डालने का फरमान जारी किया। लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। टिड्डों की, और अन्य कीड़ों की आबादी गौरैया के ना होने की वजह से बहुत तेजी से बढ़ी।

 

पहले ही बिगड़ रहा था वो किस्म किस्म के जहर के इस्तेमाल की वजह से और बिगड़ा। यही आगे बढ़ते हुए चीन का कुख्यात अकाल बना जिसमें करीब 25 मिलियन लोग भूखे मरे।

 

मुझे ये घटना इसलिए याद है क्योंकि चार सच के बीच लपेट कर एक झूठ को सच करने की आयातित विचारधारा की कला इस से सीखी जा सकती है। मुझे इसलिए भी याद है क्योंकि गौरैया बिहार का राजकीय पक्षी होता है और हम उसे सम्मान से देखते हैं। मुझे ये किस्सा इसलिए भी पता है क्योंकि करीब पंद्रह साल से ज्यादा हो गए हैं मुझे हर रोज़ गौरैयों को चावल देते हुए। नुरू और बुंडू नाम वाले गौरैयों की अंग्रेजी शोर्ट स्टोरी “Sparrows” भी हमें पसंद है। गौरैया मारने का आदेश देने वालों को अपना आदर्श मानने वाले “बिहार दिवस” के उपलक्ष्य में मेरी तरफ से गौरैया मारने का इल्जाम भी स्वीकार करें।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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