फ़्रांसिसी गवर्नर जनरल ड्यूप्ले और ब्रिटिश गवर्नर रोबर्ट क्लाइव.

दो ऐसे नाम जिनकी रणनीति , युद्धकौशल पर शायद ही किसी इतिहासकार को संशय हो .लेकिन युद्धनीति में अगर देखा जाए तो ड्यूप्ले का कोई सानी नही था.कूटनीति में ड्यूप्ले के आस पास भी नही थे ब्रिटिश.

भारतीय बाज़ार पर अधिकार को लेकर ब्रिटिशों और फ़्रांस की सेना के बीच भारत में पहले सेंट थॉमस में लड़ाई हुई .इस युद्ध की खास बात एक और थी.इस युद्ध में रोबर्ट क्लाइव को मद्रास से गिरफ्तार कर लिया गया था . फिर अम्बर के युद्ध में हराकर फ़्रांसिसी प्रतिनिधियों को हैदराबाद और कर्नाटक की कुर्सी से पदमुक्त कर दिया .दूसरे एंग्लो-कर्नाटिक युद्ध में ब्रिटिश सेना की कमान उसी रोबर्ट क्लाइव के हाथ में थी .और अंत में तीसरे एंग्लो-कर्नाटिक लड़ाई में इन्ही ब्रिटिशों ने आयरकूट के नेतृत्व में फ़्रांसीसियों को भारत में लगभग मिटा ही दिया..

उसके बाद फ़्रांसिसी ब्रिटेन के खिलाफ कभी उठ न सके.और भारतीय बाज़ार पर ब्रिटिश समुदाय का वर्चस्व नजर आने लगा .

कारण ये था कि ड्यूप्ले शत्रु सेना की रण नीति को ध्यान नही देता था.इतिहास कार ये मानते हैं कि फ्रेंच गवर्नर ड्यूप्ले अपने ब्रिटिश प्रतिद्वंदी रोबर्ट क्लाइव से हर मामले में बेहतर था . लेकिन उसकी समस्या ये थी की वो अपने प्रतिद्वंदियों से कुछ सीखता नही था . न ही विपक्षी सेना की रणनीति पर ध्यान देता था .जब कि क्लाइव और आयरकूट जैसे ब्रिटिश सेनानी शत्रु होते हुए भी ड्यूप्ले की नीति को स्वयं की रणनीति से बेहतर मानते थे और अक्सर ड्यूप्ले की ही रणनीति का अनुसरण किया करते थे . परिणाम ये हुआ कि दूसरे एंग्लोकर्नाटिक युद्ध में तो क्लाइव ने बिलकुल ड्यूप्ले के नक़्शे कदम पर चलते हुए ड्यूप्ले के लोंगो को ही ड्यूप्ले के खिलाफ भड़का दिया.वास्तव में ड्यूप्ले का यही अंत हो गया था बस मरना बाकी था.

साल भर पहले जब देश में असहिष्णुता , दादरी , OROP , JNU एपिसोड के आदि मुद्दों पर सरकार को घेरा जाता रहा तो पहले हम लोग इस बात को लेकर अक्सर चर्चा किया करते थे कि असल में हमारे पास अपने इशू नही हैं . देश में एक सरकार विरोधी माहौल बना रहे इसके लिए वे एक निश्चित अन्तराल पर कभी असहिष्णुता तो कभी दादरी या फिर कभी किसी छात्र की आत्महत्या के नाम पर बवाल किया करते.उसके बाद सरकार के समर्थक प्रतिकिया में अपनी बात कहते .मतलब मुद्दे उनके हाथ में थे. वे पहले पत्थर मारते…फिर हम उसे सही गलत ठहराते. ड्राइविंग सीट पर विपक्षियों का कब्ज़ा था.और हम लोग अक्सर इस पर चर्चा किया करते कि सरकार का इतना डिफेंसिव खेलना सही है क्या , हम खुद मुद्दे क्यों नही उठाते ? जो भी हो सामने असम में चुनाव होने को थे और हम बैकफूट पर नजर आ रहे थे.जबकि बिहार और दिल्ली हाथ से पहले ही जा चुकी थी.

लेकिन मोदी जी ने जब 15 अगस्त को पकिस्तान की जनता को गरीबी ,भ्रस्टाचार और बेरोजगारी की याद दिलाते हुए इनसे लड़ने की बात कही, तो पहले तो अजीब लगा ..फिर बलूचिस्तान का जैसे ही जिक्र किया भारत में रहने वाले पाकिस्तानी समर्थक खुद ब खुद बिलबिला उठे .सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ऐसे लोंगो पकिस्तान के दर्द के समर्थन में कराहते पाया गया , उसके बाद काले धन के विमुद्रीकरण के पश्चात् इनकी हालत नाजुक हो गयी.अब गला फाड़ चिल्लाने की बारी इनकी थी और ड्राइविंग सीट पर रस्त्रवादियों का कब्जा हो गया था.जनता का समर्थन होना लाजमी था .

इस अचानक परिवर्तन से मुझे रॉबर्ट क्लाइव द्वारा ड्यूप्ले को हराने के लिए उठाया गया वो कदम याद आया जिसे इतिहास में “आरकोट एपिसोड” के नाम से जाना जाता है .क्लाइव ने दूसरे युद्ध की आधी से ज्यादा लड़ाई तो प्रॉक्सी वॉर के रूप में लड़ी थी वो भी उस जमाने में.जैसे स्थिति उसके अनुरूप हुई तुरंत हैदराबाद और कर्नाटक दोनों पर कब्जा कर लिया.

सत्ता शतरंज का खेल है .विरोधियों की हर चाल पर नजर रखना बहुत जरूरी होता है.इसका फायदा ये होता है कि कही कभी उन्हें उनके ही तरीके से हराया जा सकता है.इसका परिणाम ये हुआ कि पहले तो असम में जीत हुई ,फिर देश में राष्ट्रवादियों पर लोंगो का विश्वास बढ़ा.सर्जिकल स्ट्राइक और विमुद्रीकरण जैसे मुद्दों पर विपक्षियों ने भडकाने की पुरजोर कोशिश की लेकिन जनता का विश्वास और बी बढ़ता गया.परिणाम ये हुआ कि देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश में ऐतिहासिक जीत ,मणिपुर ,गोवा के साथ उत्तराखंड में भी सरकार बनी.इसके अलावा पंजाब में खालिस्तान समर्थक आम आदमी पार्टी को सरकार में आने से रोकना एक प्रत्यक्ष कामयाबी रही.

अब सरकार फ्रंट फुट पर ताबड़तोड़ खेल रही है.मोदी जी ने विपक्षियों को उन्ही के तरीके से हरा दिया.

और हाँ उन दोनों गवर्नर का परिणाम क्या हुआ पता है ? इतिहास में महान कुटनीतिज्ञ फ़्रांसिसी गवर्नर जेनरल ड्यूप्ले गरीब होकर भिखारी की मौत मरता है और उसको उसके ही तरीके से हराने वाला क्लाइव बंगाल का गवर्नर जनरल बन जाता है और वर्तमान में खुद को बुद्धिजीवी कहकर बुध्हिजिवी शब्द पर अवैध कब्जा करने वालों को उत्तरप्रदेश की 22 करोड़ जनता से औकातानुसार सिर्फ 345 वोट मिलते हैं और ये जिन्हें संघी गुंडे कहकर अपमानित करते रहे, उनको जनता ने सर आँखों पर बिठा लिया.

इतिहास सच में दुहराता है .बस नजर रखने की जरुरत है .सीखने को बहुत कुछ है इतिहास में.मोदी जी सही रस्ते पर हो आप ..चलते रहिये.

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पेशे से शिक्षक गीताली, घूमने की शौक़ीन हैं। वो अक्सर अपनी कार में लम्बे सफ़र पर पायी जाती हैं। गणित में स्नातकोत्तर गीताली असमिया, बंगाल, अंग्रेजी सहित कई भाषाएँ बोलती हैं। अभी हाल में उन्होंने हिंदी भी सीख ली है। हालाँकि उनका अभ्यास भारतीय शास्त्रीय संगीत का है, मगर अपने खाली वक्त में वो हर किस्म का संगीत सुनती हैं। उनका लिखा फेसबुक पर ख़ासा पसंद किया जाता है।

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