इमरजेंसी के दौर में संविधान में जबरन घुसेड़े गए “सेकुलरिज्म” का पालन करने की “पिद्दी” जमात की जल्दबाजी के नतीजे भी भारत को भुगतने पड़े हैं। पर्व-त्यौहार की तिथियाँ अलग होती थीं, कैलेंडर के जरिये उन्हें गायब करना काफी आसान हो गया। कला के प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मार भी बहुसंख्यक समुदाय की सहिष्णुता पर पड़ने लगी। कहते भी हैं कि आप चाहें श्री कृष्ण हों, फिर भी कोई न कोई शिशुपाल आपको गालियाँ देने आ ही जाता है।

 

कला के प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मार भी सबसे पहले श्री कृष्ण को ही झेलनी पड़ी। कपट और धूर्तता के लिए कला की आड़ लेने वाले गिरोहों ने थोड़े ही समय पहले एक पुराने जमाने के चित्र में श्री कृष्ण को ईद मनाने कि कोशिश करते दिखा देने की कोशिश की थी। शहरी नक्सल गिरोहों का नैरेटिव बिल्डिंग कैसे चलता है इसे देखने का भी ये एक अच्छा नमूना है। इसकी शुरुआत कई साल पहले आई दीपंकर देब की एक किताब से की गयी।

चित्र जिसमें गोकुल से जाते हुए कृष्ण-नन्द आदि वृन्दावन देख रहे हैं
चित्र जिसमें गोकुल से जाते हुए कृष्ण-नन्द आदि वृन्दावन देख रहे हैं

कहा जाने लगा कि कई “जाने-माने बुद्धिजीवी” और “इतिहासकार” इसे कृष्ण का ईद मनाना मानते हैं इसलिए ये ईद का चाँद दिखाते कृष्ण ही हैं! पुराने दौर में तो तथाकथित इतिहासकारों से सवाल करने की परम्परा थी नहीं, प्रोफेसर साहब डांट कर चुप करवा देते थे, लेकिन अब के दौर में सोशल मीडिया ने उनकी टोटलिटेरियन सत्ता उखाड़ दी थी। लिहाजा सवाल पूछे जाने लगे। पिछले साल शबाना आज़मी और राजदीप सरदेसाई जैसों ने ये दावे किये थे।

 

अपने दावों को सही साबित करने के लिए ये लोग विलियम डेलरिम्पल और हरबंस मुखिया का नाम भी उछालने लगे। भारत में चुनावी एग्जिट पोल जैसी व्यवस्थाएं कांग्रेसियों के लिए लेकर आये योगेन्द्र “सलीम” यादव को भी इस साल कृष्ण चाँद दिखाते नजर आने लगे। कांग्रेस के तथाकथित बुद्धिजीवी शशि थरूर भी नैरेटिव सेट करने मैदान में उतरे। अफ़सोस कि बिलकुल साधारण से स्त्रोतों पर ही विवेक कुमार मिश्र ने उनके नैरेटिव को पंचर कर डाला!

 

विवेक कुमार मिश्र ने ट्विटर पर कांगड़ा वाटर कलर की ऐसी दो तीन पेंटिंग पोस्ट कर दी जो दिल्ली, सैन डिअगो और हॉवर्ड आर्ट म्यूजियम में थी। ये तो स्पष्ट हो ही गया कि ये राजस्थानी या मुग़ल पेंटिंग नहीं थी। साथ ही दूसरा दावा कि कृष्ण-बलराम के साथ दिख रहे लोग रोजेदार हैं, उसकी भी हवा निकल गयी। थोड़े ही समय बाद अपनी किताबों के लिए ख्याति प्राप्त हिंडोल सेनगुप्ता ने, सोशल मीडिया पर और तथ्य भी सामने रख दिए।

 

कला के इतिहासकार पद्मश्री प्रोफेसर बी.एन.गोस्वामी ने आगे आकर कला को काट छांट के “धर्मनिरपेक्षता” के सांचे में बिठाने की कोशिशों पर और पानी फेर दिया। उन्होंने स्पष्ट बता दिया कि ये कांगड़ा पेंटिंग का नमूना है। मुगलों की तरह तस्वीर में दिख रहे लोगों का कुर्ता दाहिने हाथ के नीचे नहीं, हिन्दुओं की शैली में बायीं तरफ बंधा था। तस्वीर में दिख रहे लोग रोजेदार नहीं थे! ये नन्द और दूसरे वृन्दावन के वासी थे जो कृष्ण के साथ दूसरे क्षेत्रों की तरफ जा रहे थे।

 

पद्मश्री प्रोफेसर बी.एन.गोस्वामी ने स्पष्ट कर दिया कि जाने-माने हिमांचली कलाकार नैनसुख के वंशजों की बनाई ये पेंटिंग अट्ठारहवीं सदी के दूसरे हिस्से के लगभग की है। इन्हें भागवत पुराण के आधार पर बनाया गया था और कभी ये टेहरी राजघराने की शान हुआ करती थीं। बाद में ये और इसके साथ की कई पेंटिंग “लापता” हो गयीं। इसके काल-क्रम की और तस्वीरें भी मौजूद थीं। पूछे जाने पर हरबंस मुखिया ने स्पष्ट रूप से इसे मुग़ल पेंटिंग मानने से मना ही कर दिया।

 

इस तरह सवाल पूछते ही “इतिहासकारों”, “बुद्धिजीवियों” के दावों की पोल खुल गयी। अपनी जानकारी के लिए व्हाट्स-एप्प यूनिवर्सिटी पर निर्भर रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी कई बार ऐसा करते रहते हैं। कल तक सवाल नहीं होते थे, अब होने लगे हैं, तो उन्हें सवाल “असहिष्णुता” भी लगने लगे हैं। बाकी सनातनियों को जबरन “धर्मनिपेक्षता” सिखाने की जरूरत ही क्यों है ये भी एक बड़ा सवाल है। भारत के सनातनियों के अलावा किसी सभ्यता-संस्कृति में तो “धर्मनिपेक्षता” की अवधारणा की जगह ही नहीं होती। सिखाया हमें दूसरों को चाहिए न!

 

जानकारी के सन्दर्भ:-

  1. इस चित्र और सम्बंधित विवाद पर इंडिया टुडे का आलेख
  2. इस चित्र और सम्बंधित विवाद पर opindia का आलेख
  3. इस चित्र और सम्बंधित विवाद पर हिंडोल सेनगुप्ता का ट्वीट
  4. इस चित्र और सम्बंधित विवाद पर विवेक कुमार मिश्र का ट्वीट
  5. इस चित्र और सम्बंधित विवाद पर ट्रू इन्डोलोजी का ट्वीट

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