महाभारत के कम सुने किस्सों में से एक इन्द्रप्रस्थ के बसने, और श्री कृष्ण-अर्जुन के हथियारों की भी है। श्री कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र, या अर्जुन के पास गांडीव नाम का धनुष हमेशा से नहीं होता था। ये उन्हें काफ़ी बाद में मिला था। इन हथियारों के मिलने के पीछे भी कहानी है। एक बार अर्जुन वनवास में थे और मणिपुर तक का चक्कर लगाने के बाद वो जब वापिस लौटने से पहले श्री कृष्ण के पास पहुंचे थे तो उन दोनों से मिलने भेष बदले अग्नि देव आये। अग्नि ने ब्राह्मण का भेष बना रखा था और कहा की वो भूखे हैं, कृष्ण-अर्जुन उन्हें कुछ खिलाएंगे क्या ?

 

जब भूखे को खिलाने का वादा मिल गया तो अग्नि अपने असली रूप में आये और बताया कि श्वेतकी नाम के राजा के यज्ञ की वजह से वो बरसों से घी की आहूति से परेशान हैं, अब उन्हें बिना तेल-घी वाला कुछ चाहिए। उन्होंने बताया कि खाण्डववन को पूरा खा जाने से उनकी भूख मिट सकती है। समस्या ये थी कि इंद्र के कई मित्र उस वन में रहते थे। जब भी अग्नि उसे जलाने का प्रयास करते, इंद्र बारिश से आग बुझा देते थे। तो असल में अग्नि को इंद्र से सुरक्षा के लिए कृष्ण और अर्जुन की मदद चाहिए थी।

 

दोनों कृष्ण-अर्जुन पहले ही वादा कर चुके थे और खाण्डववन को जलाने से उनका कोई व्यक्तिगत नुकसान भी नहीं होता था तो वो दोनों इसमें मदद के लिए भी तैयार हो गए। अपनी मदद के लिए अग्नि ने अर्जुन को गांडीव, ना खाली होने वाला तरकश, रथ आदि दिया। उन्होंने कृष्ण को सुदर्शन चक्र और कौमुदिनी गदा भी दी। जब अग्नि पूरे वन और उसके सभी जीवों को जलाने लगे तो कृष्ण-अर्जुन उनकी सुरक्षा कर रहे थे। इंद्र के मित्र नागों को भी अग्नि ने इसी वन में जला डाला।

 

बारिश से आग बुझाने की इंद्र की कोशिशें अर्जुन ने कामयाब नहीं होने दी। जंगल से किसी जीव को अग्नि ने निकलने भी नहीं दिया था। चार सारंगक (एक पक्षी के बच्चे) इस आग से बचकर उड़ पाए। एक मय नाम के राक्षस को कृष्ण-अर्जुन ने जाने दिया। अग्नि से बचा लेने के बदले उस राक्षस ने बाद में पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ का राजभवन बनाया था। मय नाम के इस कुशल शिल्पी का जिक्र लंका बनाने के लिए भी आता है। मेरे ख़याल से लम्बी उम्र और कई बार जिक्र की वजह से जैसे व्यास और परशुराम वगैरह एक गुरु, एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक पीठ, या परंपरा का नाम लगता है। वैसे ही मय भी शायद कोई वंश या शिल्पियों-अभियंताओं की परंपरा हो सकती है।

 

नागों में से केवल एक अश्वसेन बचकर भाग पाया था। सभी नागों के नाश के कारण वो अर्जुन-कृष्ण से खार खाए बैठा था और उसने बरसों ये दुश्मनी पाली। सिर्फ उसने ही नहीं, उसके पूरे खानदान ने ये दुश्मनी कई पीढ़ियों तक याद रखी थी। बाद में महाभारत के युद्ध के समय ये कर्ण के तरकश में जा घुसा और एक तीर पर चढ़ बैठा था। कर्ण के तीर के साथ वो अर्जुन के पास पहुँच पाता। लेकिन उसी समय श्री कृष्ण ने रथ नीचे झुका दिया और तीर अर्जुन के मुकुट पर लगा। निशाना चूकने से भड़का वो दोबारा कर्ण के पास मदद के लिए भी गया था, लेकिन कर्ण ने उसकी मदद से इनकार कर दिया था।

 

बहुत बाद में अर्जुन के पोते (अभिमन्यु के बेटे) परीक्षित की मौत जिस तक्षक नाग के काटने से हुई थी वो इसी नागों के खानदान का था। बरसों बाद बदला लेकर भी कुरु वंश और नागों की ये दुश्मनी ख़त्म नहीं हुई थी। तक्षक की करतूत का बदला लेने के लिए परीक्षित के बेटे जन्मजेय ने यज्ञ में सभी नागों की आहुति कर डालने की कोशिश की थी। कई साधुओं के समझाने बुझाने के बाद कहीं जाकर उसने यज्ञ रोका और कुछ नागवंशी बच पाए थे। महाभारत की कहानी खानदानी दुश्मनी की कहानी भी है और दुश्मन को बिना पूरी तरह ख़त्म किये छोड़ने के नतीजे की कहानी भी है।

(महाभारत के पहले पर्व, आदिपर्व के खाण्डवदहन पर्व और मायादर्शन पर्व से)

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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