पांच साल की उम्र में उनके पिता की मृत्यु हो गई थी | सोलह के होते होते उन्हें पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी | अगले एक साल के अन्दर उन्होंने जो भी नौकरियां ढूंढी, वो चारों की चारों किसी ना किसी वजह से छूट गई थी | मतलब सत्रह की उम्र में उन्हें बेरोज़गार हो जाने का भी चार बार का अनुभव था | एक साल बाद यानि जब वो अठारह के हुए तो उन्होंने शादी की | उसके बाद वो रेल के ठेके लेने लगे, लेकिन इस धंधे में भी उन्हें कामयाबी नहीं मिली | 22 के होते होते उन्होंने ये काम भी छोड़ दिया | फिर उन्होंने फौज में नौकरी कर ली वहां भी वो टिक नहीं पाए |

लौट के उन्होंने लॉ में एडमिशन लेने की कोशिश की तो उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया | फिर वो इनश्युरैंस सेल्स मैन बने, लेकिन उसमें कामयाबी बहुत मुश्किल से मिलती है | वो नौकरी भी छूट गई | 29 की उम्र में वो पिता बने, लेकिन तीस की आयु में उनकी पत्नी उन्हें छोड़ गई | जाहिर है ऐसे नाकामयाब-निकम्मे इंसान के पास वो अपनी बेटी को तो छोड़ती नहीं, सो जाते जाते पत्नी, बेटी को भी साथ ही ले गई | मरता क्या ना करता, वो एक छोटे से ढाबे में बर्तन वर्तन धोने का काम करने लगे |

एक दिन उन्होंने अपनी बेटी को अपनी पत्नी के पास से किडनैप कर लेने की सोची | इस काम में भी वो नाकाम रहे | लेकिन इस बहाने वो अपनी पत्नी को वापस आने के लिए मनाने में कामयाब हो गए | ऐसी ही छोटी मोटी नौकरियों पर गुजारा करते वो पैंसठ साल की उम्र में रिटायर भी हो गए | रिटायर होने पर उन्हें कुल एक सौ पांच डॉलर का चेक मिला | जाहिर है इसपर तो गुजारा होना नहीं था | जीवन से निराश हारे हुए इस व्यक्ति ने आत्महत्या करने की ठान ली | एक पेड़ के नीचे वो अपना सुसाइड नोट लिखने बैठे |

जो इतने साल कुछ सही नहीं कर पाया उस से ये भी कैसे सही होता ? इनसे तो प्रसिद्ध तुलसीदास पर लिखने कहने पर भी, “तुलसीदास जी प्रणाम” जैसा ही कुछ लिखाना था ! सो सुसाइड नोट में अपनी किसी किस्म की वसीयत जैसा लिखने के बदले इन्होने लिख डाला कि ये जिन्दगी में करना क्या चाहते थे | जब इन्होनें खुद ही उसे दोबारा पढ़ा तो उन्हें लगा कि काफ़ी कुछ करना तो बाकी ही रह गया ! वो इतने सालों में अच्छे बावर्ची बन चुके थे, लेकिन कभी बहुत पहले अपने घर में ही सीखी एक रेसिपी उन्होंने किसी को चखाई ही नहीं थी | लिहाजा उन्होंने सोचा कि अपने साथ ही उस ख़ास रेसिपी को ख़त्म होने देने के बदले, कुछ लोगों को वो चखाई जाए |

अपने 105 डॉलर के चेक के बदले उन्होंने 87 डॉलर उधार लिए | उनसे साजो-सामान खरीदा, चिकन की वो रेसिपी बनाई और केन्टकी नाम के छोटे से शहर में दरवाजे-दरवाजे बेचने निकले | दिनभर की मेहनत में वो कुछ कामयाब भी रहे | इस कामयाबी ने उन्हें अगले दिन फिर से कोशिश करने के लिए उकसा दिया | अगले दिन उन्होंने फिर से अपना प्रयास दोहराया, और फिर, और फिर दोहराया | जो आदमी 65 की उम्र में आत्महत्या करने जा रहा था, वो 88 की उम्र में केन्टकी फ्राइड चिकेन(KFC) का करोड़पति मालिक था |

शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती | जिस दिन शुरू कीजिये, वही अच्छा वक्त है | पहले कितनी बार आप हारे हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता | ये किस्सा कोई नया भी नहीं, आपने शायद दर्ज़नो वेबसाइट पर, व्हाट्सऐप्प मेसेज में पढ़ा होगा, और भूल गए | लेकिन सीख लीजिये, जो पसंद हो वहीँ से शुरू कीजिये, शुरुआत चाहे आपके हाथ में हो ना हो, आपकी कहानी का अंत हमेशा आपके हाथ में होता है | बाकी अगर आप सलफेट किस्म के हैं, ये बड़े लोगों की कहानियां हैं जैसा कुछ बहाना बनाना चाहते हैं, तो अपने आस पास देखिये | दर्ज़नों ऐसे किस्से बिखरे पड़े हैं | कम से कम सीखना ही शुरू कीजिये |

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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