करीब बीस साल पहले हम कुछ रोबिन कुक के, कुछ गॉडफादर जैसे, कुछ हर्रोल्ड रोब्बिन्स के उपन्यास पढ़ चुके थे तो केन फोल्लेट का नाम भी हमें मालूम था। जाहिर है उसकी किताब आने वाली थी तो 2001 के दौर में हमने पैसे भी बचाए थे। खरीदने के मामले में जो उस दौर का मक्खीचूस वाला एट्टीट्युड था वो अभी भी हमने बचा रखा है। पहली हरकत तो होती थी कि गाँधी मैदान से सेकंड हैण्ड या पायरेटेड एडिशन ले आओ।

 

जब ये मुमकिन नहीं होता था तो हम जोड़ते थे कि किताब में पन्ने कितने हैं। सौ रुपये की किताब में तीन सौ पन्ने का हिसाब होता था। एक रुपये में तीन पन्ने नहीं मतलब किताब महंगी है। अब महंगाई को देखते हुए, हम एक रुपये में दो पेज एक्स्पेक्ट करते हैं। तीन सौ की किताब में सात सौ पन्ने तो होने ही चाहिए। ऐसी अपेक्षाओं के बीच जब केन फोल्लेट की जैकडाव्ज आई, तो हमारे अरमानों पर तुषारापात हो गया।

 

ये हार्ड बाउंड, मतलब लाइब्रेरी एडिशन थी, कूट का जिल्द मतलब आम पेपरबैक से दोगुनी महंगी किताब ! ऐसी महंगी किताब के गांधी मैदान पहुँचने की कोई संभावना ही नहीं थी। कभी उधार मिली तो पढेंगे सोचकर हमने बात टाल दी थी, मगर अगले साल ये किताब पेपरबैक में आई, और हम उसे हासिल करने में भी कामयाब हो गए। जासूसी की कहानियों में जो सबसे अनोखी लगी हैं, ये उनमें से एक किताब थी। इसमें जासूस हीरो नहीं होता, हीरोइन थी, शायद ये भी एक वजह रही होगी।

 

विश्वयुद्ध के दौरान जब यूरोप और फ़्रांस के काफी हिस्से जर्मन कब्जे में आ गए थे तो ब्रिटेन ने करीब पचास एजेंट इस इलाके में भेजे थे। इन जासूस महिलाओं में से ज्यादातर पकड़ ली गई थीं, फिर टार्चर के बाद कईयों को मार डाला गया था। केन फोल्लेट ने ऐसी ही बहादुर महिलाओं की याद को ये कहानी समर्पित की थी। कहानी की नायिका फ़ेलिसिटी ‘फ्लिक’ क्लरिएट है, जो कि फ़्रांस में ब्रिटेन की काफी कामयाब जासूस है।

 

उसके पति फ़्रांस के क्रांतिकारियों में से हैं और वो लोग कई कामयाब कारनामे अंजाम दे चुके होते हैं। उन्हें एक ऑपरेशन मिलता है जिसमें एक टेलीफोन एक्सचेंज को उड़ाना है। हमले से पहले जर्मन फोन बेकार हो जाते तो ब्रिटिश जीत पाते, लेकिन ना बेकार हो तो जीत पर शक रहता। ये फ़ोन एक्सचेंज एक ऐसे बेसमेंट में था जिसे सीधा हवाई हमले में उड़ाया नहीं जा सकता था। लिहाजा फेलेसिटी उसके पति और कुछ और क्रन्तिकारी उसपर सीधा हमला करते हैं।

 

ये हमला बुरी तरह नाकाम होता है। जर्मनों को उनके हमले की भनक लग गई होती है। मुकाबले में फेलेसिटी के लगभग सभी साथी मारे जाते हैं और उसके पति भी लापता हो जाते हैं। अब मजबूरी थी कि फेलेसिटी को अपनी जान बचाने के लिए ब्रिटिश फौज का हमला कामयाब करवाना था। खुद की जान बचाने के लिए भी संगठन को फिर से तैयार करना था। लेकिन उसके पास समय बिलकुल नहीं होता, सब फ़ौरन करना था।

 

अब फेलेसिटी लड़कियों-महिलाओं की एक टीम बनाती है। जो महिलाऐं इस दुसरे हमले के लिए इकठ्ठा हुई उन सब की अपनी कोई ना कोई कहानी है, सबके अपने अपने राज हैं। फेलेसिटी का गायब पति है, उसके भी अपने राज़ हैं। उधर जर्मन जो फिर से हमला होगा, कुछ हमलावर बच गए हैं, ये समझ गए थे उनकी तरफ से भी जासूस रवाना हो चुके हैं। फेलेसिटी को उनसे बचकर हमला करना है। सीधा हमला एक बार नाकाम हुआ तो दोबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता।

 

बहुत से अन्य लेखकों की तरह केन फोल्लेट की भी विशेषता है कि वो हर चीज़ विस्तार से कहानी में बता रहे होते हैं। हथियार, इम्प्रोवाइज्ड डिवाइस, चरित्र, सोच, सब ऐसे बताये जाते हैं कि लगे आप उसी दौर में वहीँ खड़े हों। मेरे हिसाब से ये किताब अभी भी थोड़ी महंगी ही है, क्योंकि पांच सौ रुपये में पांच सौ पन्ने की है, लेकिन लम्बे सफ़र पे हों, या रोचक जासूसी वाली कहानियां पढ़ने में रूचि हो तो कभी जैकडाव्स पढ़ के देखिये। ये पसंद आने लायक किताब है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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