अगर वो बाघ बहादुर से कहेगा कि पानी तो उसकी तरफ से बहकर बकरे की तरफ आ रहा है तो कहा जाएगा कि तूने आज नहीं किया तो क्या ? बीते कल में तेरे बाप ने किया होगा! फिर शिकारी झपट्टा मारकर एक निरीह प्राणी को चबा जाएगा। ऐसे मौकों पर हमें बिना माफ़ी एक पहचाना सा शेर इस्तेमाल करना भी याद आता है :

मैंने अजब यह रस्म देखी बरोजे ईद कुर्बां,
वही जिबह भी करे हैं, वही ले सबाब उल्टा!

 

ऐसा क्यों है कि ट्रेन की सीट के लिए मारा मारी करने के लिए जो छुरा लेकर अपने साथियों के साथ आया उसकी मौत पर मेरा देश “लिंचिस्तान” हो जाता है और लगभग उसी रास्ते से गुजर रहे एक हिन्दू युवक को जब सुरक्षाकर्मी पीट कर मार देते हैं तो किसी चेहरे पर शिकन तक नहीं आती ? पुलिस या किसी किस्म की जांच से पहले ही कैसे गौरी लंकेश के हत्यारे हिन्दुत्ववादी गुंडे हो जाते हैं ? डॉ. नारंग की हत्या पर सफाई देने के लिए विभागीय बयान नहीं, पुलिसकर्मी की “ट्वीट” कैसे पक्षकारों को मिल जाती है ?

 

ऐसा कैसे है कि यहाँ स्कूल की प्रार्थना के धर्म पर जन हित याचिका डाल जाती है ? कैसे इन लोगों को योग का धर्म पता चल जाता है ? कैसे “वन्देमातरम” के सांप्रदायिक होने का पता चलता है ? “सूर्य नमस्कार” क्यों एक धर्म का हो जाता है ? ये कैसे पहचानते हैं कि बस पर पथराव करने वाले सभी “राजपूत गुंडे” थे ? और उसके बाद अचानक ये पक्षकार “आतंक का कोई मजहब नहीं होता” कैसे बोल जाते हैं ? क्या आजाद भारत में तिरंगा यात्रा निकालने के लिए पुलिस की इजाजत चाहिए, या भगवा ध्वज गोली मारने का जायज कारण हो गया है ?

 

सोशल मीडिया के दौर में खोजी पक्षकारों की चुप्पी के बाद भी सारी ख़बरें निकल के आ ही जाती हैं। उम्मीद तो थी कि इस नौजवान की भी पुरानी तस्वीरें निकलेंगी। अपेक्षाओं में कहीं था कि अपनी उम्र के और लड़कों जैसा ही होगा। शुरू में अगर लोगों ने सोचा हो कि शायद रोहित वेमुल्ला जैसा ही किसी राजनैतिक संगठन से जुड़ा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। यहाँ तो मगर सभी ने इनकार ही किया, “मुझे भगवा रंग से नफ़रत है” जैसे नापसंद चीज़ों को बताते विडिओ नहीं मिले। हाँ उल्टा गरीब बच्चों को जैकेट दान करने की तस्वीर निकल कर आई।

 

इसने आत्महत्या भी नहीं की थी, किसी को जान से मारने या बलात्कार की कोशिश नहीं की थी, इसकी बाकायदा हत्या हुई थी। सिर्फ झंडा या नारे क्या हत्या की वजह हो सकते हैं ये एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। अफ़सोस कि इस बेरहम क़त्ल पर उठने वाला पहला ही सवाल नहीं पूछा जा रहा। इसे भी उतना ही अनोखा माना जाना चाहिए जितना कि वीरगति को प्राप्त चन्दन गुप्ता का दिखावे का शौक ना होना था। उसकी किसी ऑस्ट्रेलियाई बियर की बोतल और महंगी किंग साइज़ सिगरेट के साथ तस्वीर भी नहीं मिली।

 

जब स्वनामधन्य साहित्यकार गिरोहबाजी करते इसका इल्जाम किसी अज्ञात साम्प्रदायिकता पर मढ़ने में और पक्षकार कातिल को ही पीड़ित घोषित करने में लगे हैं तो दोहरा दें कि मेमने का सबसे बड़ा कसूर तो निरीह मेमना होना ही था। कासगंज में एक भले से मासूम बच्चे को क़त्ल कर दिया है, और उसकी रक्तदान करती तस्वीरें नजर आती हैं। याद रहे :-

 

जो चुप रहेगी जबान ए खंजर,

तो आस्तीं का लहू पुकारेगा !

Chandan Gupta donating blood
चन्दन गुप्ता : रक्तदान करते हुए
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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