आप अपने किस्से खुद नहीं सुनायेंगे तो क्या होगा ? कोई और भला आपकी कहानी सुनाने क्यों आने लगा ? बिहार के साथ भी कुछ ऐसा ही है, लोग अपनी बड़ाई खुद करने से हिचकते हैं। फिर कुछ वजह ये भी रही कि जैसे जैसे शिक्षा व्यवस्था का नाश हुआ, लोग अपनी जीत की कहानियां भूलने भी लगे। पुराने दौर में बिहार, बंगाल प्रान्त का ही एक हिस्सा होता था। इस वजह से भी कई बार बिहार के नायक-नायिका किताबों में बंगाल के दर्ज पाए जाते हैं। ऐसे ही कई नामों में से एक भूला बिसरा सा नाम कादम्बिनी गांगुली (बोस) का भी है। कुछ जातीय समीकरणों में वोट खीचने लायक नहीं होने के कारण, शायद इनका नाम दर्ज करना किसी को जरूरी नहीं लगा।

वो 1861 के बिहार में जन्मी थी जो ब्रिटिश काल का बंगाल ही था। भागलपुर में ब्रह्मो समाज के सुधारक ब्रज किशोर बासु का परिवार रहता था। वो असल में बांग्लादेश के बारीसल से आकर वहां बसे थे। भागलपुर स्कूल के इसी हेडमास्टर के घर 18 जुलाई, 1861 को कादम्बिनी का जन्म हुआ। उनके पिता और अभय चरण मल्लिक मिलकर भागलपुर में महिलाओं की शिक्षा का अभियान चलाते थे और इसी क्रम में उन लोगों ने 1863 में भागलपुर महिला समिति की स्थापना भी की थी। ये अपनी तरह का भारत का पहला संगठन था।

 

बंगा महिला विद्यालय में अपनी पढ़ाई शुरू करने के बाद बेथ्युन द्वारा स्थापित बेथ्युन स्कूल से कादम्बिनी ने शिक्षा ली और 1878 में वो कलकत्ता यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा पास करने वाली पहली महिला बन गई। कुछ हद तक उनकी पढ़ने की इक्छा से प्रेरित होकर बेथ्युन कॉलेज ने पहले तो फिने आर्ट्स और फिर 1883 में स्नातक के कार्यक्रम शुरू कर दिए। कादम्बनी और चंद्रमुखी बासु बेथ्युन कॉलेज से (और साथ साथ पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में भी) पास करने वाली प्रथम महिला ग्रेजुएट बनी। कादम्बिनी गांगुली ने आगे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई की और 1886 में उन्हें ग्रेजुएट ऑफ़ बंगाल मेडिकल कॉलेज की डिग्री मिली। इस तरह वो आनंदी गोपाल जोशी के साथ पास करने वाली महिला डॉक्टर थी जिन्हें एलोपैथिक चकित्सा में डिग्री मिली।

 

उनके दौर में ही एक अबला बोस ने भी 1881 में प्रवेश परीक्षा पास की थी मगर उन्हें कलकत्ता में प्रवेश नहीं दिया गया। बाद में अबला बोस, मेडिकल की पढ़ाई के लिए मद्रास गई, लेकिन उन्होंने पढ़ाई पूरी नहीं की। जाहिर है कि कुछ दकियानुस इसाई शिक्षकों को एक औरत का मेडिकल की पढ़ाई करना पसंद नहीं था, कुछ लोग जोन ऑफ़ आर्क की तरह ही इलाज में सक्षम महिलाओं को डायन मानते थे। मगर ऐसी मुश्किलों से कादम्बिनी ने हार नहीं मानी।

 

वो 1892 में यूनाइटेड किंगडम गई और एल.आर.सी.पी.(एडिन्बर्ग), एल.आर.सी.एस. (ग्लासगोव) और जी.ऍफ़.पी.एस. (डबलिन) कर के वापिस आई। उन्होंने 1883 में ब्रह्मो समाज के ही समाज सुधारक द्वारकानाथ गांगुली से शादी की थी। वो विधुर थे और उनके पांच बच्चे अपनी पहली पत्नी से थे। अपने तीन बच्चे मिलाकर, कुल आठ बच्चों की देखभाल करती कादम्बनी को हम भारत की पहली वर्किंग मदर भी कहते, लेकिन वो कोयला खान में काम करने वाली महिलाओं के लिए काम करती थी, तो कई मजदूर स्त्रियाँ वहां, उसी दौर में वोर्किंग मदर कहलाने लायक थीं। उनकी तारीफ में मशहूर इतिहासकार डेविड कोप्फ़ ने भी काफी अच्छा लिखा है।

 

ऐसा भी नहीं है कि उनका काम सिर्फ डॉक्टर होने और परिवार संभालने तक सिमित रहा। पूर्वी भारत में उनका और उनके पति का, कोयला खानों में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति सुधारने में भी काफी योगदान रहा। इंडियन नेशनल कांग्रेस के पांचवे अधिवेशन (1889) में मौजूद छह महिला प्रतिनिधियों में से वो भी एक थी। सन 1906 में जब ‘बंग-भंग’ के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था तो स्त्रियों के सम्मलेन शुरू करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 1908 में वो कलकत्ता में सत्याग्रहियों के समर्थन में मीटिंग कर रही थी। जमीनी कार्यकर्ताओं के सहयोग के लिए उन्होंने चंदा इकठ्ठा करने में भी काफी काम किया था। करीब 62 साल की उम्र में 3 अक्टूबर 1923 को कादम्बनी गांगुली का निधन हो गया था।

 

उन्होंने सैंतालिस की आजादी के बाद भाषण नहीं दिए होंगे, उन्होंने कई किताबें भी नहीं लिखी। लेकिन हाँ, महिलाओं की आजादी के लिए काम कर रही इस डॉक्टर का काम उनके जाने के बरसों बाद भी बोलता है।

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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