बांग्ला में योगेन्द्र को अक्सर जोगेंद्र कहा जाता है | बंगाल के दलित नेता थे जोगेंद्र नाथ मंडल | आपने उनका नाम नहीं सुना होगा | आम तौर पर दल हित चिन्तक उनका नाम लेने से कतराते नजर आयेंगे | आजकल जो जय भीम के साथ जय मीम जोड़ने की कवायद चल रही है ये नाम उसकी नींव ही खोद डालता है | इसलिए इनके बारे में जानने के लिए आपको खुद ही पढ़ना पड़ेगा |

उनका जन्म ब्रिटिश बंगाल में 29 जनवरी 1904 को हुआ था | पकिस्तान के जन्मदाताओं में से वो एक थे | सन 1940 में कलकत्ता म्युनिसिपल कारपोरेशन में चुने जाने के बाद से ही मुस्लिम समुदाय की उन्होंने खूब मदद की | उन्होंने बंगाल की ए.के. फज़लुल हक़ और ख्वाजा नज़ीमुद्दीन (1943-45) की सरकारों की खूब मदद की और 1946-47 के दौरान मुस्लिम लीग में भी उनका योगदान खूब था | इस वजह से जब कायदे आज़म जिन्ना को अंतरिम सरकार के लिए पांच मंत्रियों का नाम देना था तो एक नाम उनका भी रहा |

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे | जोगेंद्र नाथ मंडल के इस पद को स्वीकारने से कांग्रेस के उस निर्णय की बराबरी हो जाती थी जिसमें कांग्रेस ने अपनी तरफ से मौलाना अबुल कलाम आजाद को मनोनीत किया था |

जोगेंद्र नाथ मंडल


आप सोचेंगे कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने ऐसा क्या किया था कि जिन्ना ने उन्हें चुना ? 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट जिले को मतदान से ये तय करना था कि वो पकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का | उस इलाके में हिन्दुओं और मुस्लिमों की जनसँख्या लगभग बराबर थी | चुनाव में नतीजे बराबरी के आने की संभावना थी | जिन्ना ने मंडल को वहां भेजा | दलितों का मत, मंडल ने पकिस्तान के समर्थन में झुका दिया | मतों की गिनती हुई तो सयलहेट पकिस्तान में गया | आज वो बांग्लादेश में है |

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले श्रम मंत्री भी थे | सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी | इस 1947 से 1950 के बीच ही पकिस्तान में हिन्दुओं पर लौहमर्षक अत्याचार होने शुरू हो चुके थे | दरअसल हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं था | बलात्कार आम बात थी | हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था | वो बार बार इनपर कारवाई के लिए चिट्ठियां लिखते रहे |

इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी | हिन्दुओं की हत्याएं होती रही | जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रही | कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे | आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किसपर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है | जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आये | पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीते रहे | अपने किये पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उन्होंने गुमनामी में ही आखरी साँसे ली |

अब आपको शायद ये सोचकर थोड़ा आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे आपने कभी इस नेता का नाम तक नहीं सुना ? राजनीति में तो अच्छी खासी दिलचस्पी है ना आपकी ? अपने फायदे के लिए कैसे एक समुदाय विशेष ने एक दलित का इस्तेमाल किया था उसका ये इकलौता उदाहरण भी नहीं है | बस समस्या है कि ना अपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं ! वो क्यों पढ़ने देते भला ?

यही सिर्फ एक वोट बनकर रह जाने का अफ़सोस था जो आपने रोहित वेमुल्ला की चिट्ठी में लिखा पाया था | उनकी चिट्ठी में जो कुछ हिस्सा आप आज कटा हुआ देखते हैं वो कल कोई और लिखेगा | आप पढ़ने से इनकार करते रहेंगे उधर मासूम अपने खून से बार बार ऐसी चिट्ठियां लिखते रहेंगे | कभी सोचा है कि वो आपको जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम क्यों नहीं बताते ? कभी सोचा है कि वो आपको पढ़ने क्यों नहीं कहते ? कभी सोचा है कि उन्होंने आपको चार किताबों का नाम बताकर खुद पढ़कर आने को क्यों नहीं कहा ? वो खुद को आंबेडकर वादी कहते हैं ना ? आंबेडकर और फुले दम्पति तो जिन्दगी भर शिक्षा के लिए संघर्ष करते रहे ! फिर ये क्यों आपको किताबों से दूर करते हैं ?

ऐसा वो इसलिए करते हैं क्योंकि पढ़ने के बाद आप सिर्फ एक वोट नहीं रह जायेंगे | पढने के बाद आप दर्ज़नो तीखे सवाल हो जायेंगे | पढने पर आप पूछेंगे कि पूनम भारती की आत्महत्या के विषय में कोई बोलता क्यों नहीं ? पढ़ने पर आप पूछेंगे कि उसकी चिट्ठी में ये जहाँगीर के बारे में लिखा क्या है ? पढ़ने पर आप देखेंगे कि आंबेडकर खुद क्या कहते थे |

बाकी किसी विदेशी फण्ड पर पलने वाले की पूँछ पकड़ कर चलना है, या खुद से दलित चिंतन करना है, ये फैसला तो आपको खुद ही करना होगा |

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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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